आप भी हुज़ूर औघड़ हो और मामूली औघड़ नहीं…
आप भी हुज़ूर औघड़ हो और मामूली औघड़ नहीं, पूरे सिद्ध औघड़। हम लोग गोरखपुर गए थे फिर वहाँ से गुरु दर्शन के बाद शिव की नगरी पहुँचे। आप पर शिवजी की बड़ी कृपा है। आपका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता। शिव के धाम में बहुत से जोगी-वैरागी, साधु-संत आपको जानते हैं। एक बाबा विचित्रनाथ औघड़ थे। मुर्दाघाट में रहते थे। बहुत सिद्ध थे। वह आपके बड़े गुन गाते थे। आपकी शायरी उन्हें बहुत पसन्द थी और बहुत-सी शायरी उन्हें याद थी। ऋषिकेश के जंगलों में घूमा करते थे। शेर-बाघ उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकते थे। आप भी अघोरी हो। अगर आप अघोरी न होते, वैरागी न होते तो हम यहाँ पर ठहर ही न पाते। गुरु गोरखनाथ हमको मार डालते। जब-जब आपके यहाँ आता हूँ गुरु गोरखनाथ बाबा के दर्शन होते हैं-सपने में। अब हमें छुट्टी दीजिए हुज़ूर, हमें मोह में न फँसाइए, मेरा वैराग्य मत तोड़िए। हमसे फिर आने का वादा मत लीजिए। अब शायद भेंट न हो। बद्रीनाथ जा रहा हूँ। वहीं गुरु ने जाने का हुक्म दिया है। कल रात सपने में आए थे-ब्रदीनाथ जाने को कह गए हैं। जोगी फिर नाच-नाच कर गाने लगा :
अबकी गवनवाँ बहुरि नहिं अवनाँ
जोगी रो रहा था। फ़िराक़ की आँखों से वैराग्य के आँसू टपक रहे थे। हर बार जब जोगी जाता था, पैसों की कुछ-न-कुछ फ़रमाइश ज़रूर करता था। इस बार चुप मौन साधे, हाथ जोड़े फ़िराक़ को प्रणाम कर रहा था। फ़िराक़ ने उसे दो खद्दर की गरम शेरवानियाँ दीं, पाँच सौ रुपए दिए और गेट तक पहुँचाने आए। जोगी पैर छूने के लिए झुका तो फ़िराक़ के चरणों पर जोगी की आँखों से जलधारा फूट पड़ी और फ़िराक़ के आशीर्वादात्मक आँसू उसके सर पर थे । गेट पर खड़ा हुआ फूलों से लदा हुआ पारिजात ( यह वही हरसिंगार है जिसका ज़िक्र फ़िराक़ ने अपनी नज़्म – आधी रात में किया है) फूलों की हल्की-हल्की रिमझिम फुहार से जोगी को विदा कर उसकी यात्रा की मंगल कामना कर रहा था और फ़िराक़ के सिर पर कविता का छाँव पसार रहा था। चलते-चलते जोगी ने कहा, बाबू अपना एक-दो शेर लिखवा दो यात्रा में काम आएँगे। फ़िराक़ रुँधे हुए गले से शेर सुना रहे थे और अपने आँसुओं को रोक पाने में अशक्त जोगी अपनी कापी में पेंसिल से शेर लिख रहा था-सफ़र में काम आएँगे :
इश्क़ तो दुनिया का राजा है,
किस कारन वैराग लिया है।
रमता जोगी बहता पानी
इश्क़ भी मंज़िल छोड़ रहा है।
जोगी मगन हो गया जैसे उसे परमार्थ मिल गया हो। जोगी चला गया। अन्तर्धान हो गया और दूसरा जोगी अपनी कुटिया में लौट आया।
~ रमेशचंद द्विवेदी