दैनिक नवप्रदेश में आज छपी मेरी व्यंग्य रचना “नई पीढी बिगड़ गई है”
व्यंग्य रचना : नई पीढ़ी बिगड़ गई है ।
डॉ किशोर अग्रवाल
किनकिनाती ठंड में कांपते गजोधर को बड़ी राहत हुई जो बसेसर सुबह-सुबह उससे मिलने आ पहुंचा । बसेसर गजोधर से उम्र में आधा पर भला लड़का था , इज्जत बहुत करता था । वह कांपता कांपता आया और बोला
“काका हो आज तो फिर बहुत ही ठंडा परत है हो ।”
“अरे बाप रे ,हे भगवान ! है तो ठंडा पर दोष हमारा ही है ।”
“काका वह कैसे ?”
“अरे यह जो कोहरा पाला पड़ा है ना जिसमें छपरा , दुमदुमा, छपास होते हुए शीत लहर दौड़ा है वह सब दोष मेरा ही है।”
“ठंड पड़ने में तुम्हारा दोष कैसे ?”
“अरे सुबह उठकर जैसा ही हम टीवी ऑन किया हूं तो देखा कि यह ठंडा हमारे दाउदपुर से चलकर दुमदुमा ,टेकन ,छपास होते हुए छपरा पहुंचकर चारों तरफ फैल गया । डोरीगंज दिधवारा होकर पटना तक जा पहुंचा रे बसेसर। फिर चारों स्टेट तक फैल गया । नैनीताल में बर्फ गिरने लगा, शिमला में रोड जाम हो गया ,वहां बर्फ पड़ने लगा।”
“तो इसमें तुंहरा दोष क्या कका , बर्फ तो शिमला में हर साल पड़ता ही है ।”
“सब दोष हमरा ही है रे बाबू । भोर में जब हम उठे तो पियास लगा हुआ था , हम फिरजवा खोल दिए ,पानी निकाल लिए और पानी पीकर दिशा मैदान तरफ चल दिए । फ्रिज बंद करना भूल गए । फिरजवा खुलल रह गोइल । उतने पर तो हमरा अंदाजै ना रहल कि हमरा फ्रिज इतना ठंडा करल बा ।”
“तुम्हारा फ्रिज से यह बर्फ गिर रहा है तुम्हारा यह मतलब है?”
“ हां रे यहीं से चालू हुआ दुमदुमा होते हुए छपरा फिर चारों तरफ बढ़ता ही गया । पटना पहुंचने पर फिर तो वह पूरा बिहार और आसपास के सभी स्टेट को चपेट में ले लिया रे ।”
“तो तुंहरा फ्रिज से इतना ठंडा पड़ा बता रहे हो कका ?”
“हां उहे हा, हमको पता ना चली , जरा भी पता होता तो फ्रिज का किवड़िया खुला न छोड़ते, बंद कर देते तो गरमें गरम रहता सब । तुम्हारे घर हीटर नई खे ? जाकर हीटर में सेंको गरमे-गरम ।”
“का हीटर सेंकें बुढ़ कका ? क्या आप जानते हो कि पिछले गर्मियों में का भइले कि हम हीटर की मरम्मत कराए कि ठंड आएगी तो हीटर से सेंकेंगे , बनवाकर ले आए और ऑन करके छोड़ दिए । रात भर हीटर जलता रहा सुबह हो गई ।”
“इससे तो घर में आग लग गई होगी रे ।”
“नहीं काका दिन भर भी हीटर खुला रह गईल शाम में जब घर पहुंचे ना तो न्यूज़ में देखें कि कश्मीर ,पंजाब , केरल सब तरफ बाढ़ आ गई असम में बाढ़, गंगाजी उफनाने लगी । “
“नदी में ऊपर से पूर आ गया होगा ?”
नहीं कका हीटर से ।”
“वह कैसे?”
“हीटर की गर्मी से हिमालय के ग्लेशियर पिघलने लगे कका हीटरवा गरमेंगरम रहे गोइल रात भर अऊर सारे दिन । अब आप बताओ हम क्या करें हीटर का ?”
“अच्छा तुम्हारे हीटर से हिमालय की बर्फ पिघलने लगी ?”
“न्यूज़ में आया था तुम भी सुने होंगे ?”
“हां सुना तो था , पर तुमको सुबह से और कोई नहीं मिला? सुबह-सुबह यहां आकर बैठे हो और हीटर से ग्लेशियर पिघला रहे हो लप्पड़ देखे हो नूं , मारेंगे एक लप्पड़ तो सुरतिया बिगड़ जाएगी बदमाश कहीं के!”
“इसमें लप्पड़ का क्या बात है काका जी , एक बात बताओ कका, तुम्हारा फ्रिज खुले रहेसे यदि शीतलहर चल सकती है तो क्या मेरे हीटर से ग्लेशियर नहीं पिघल सकता ?”
“तो तू मेरी बराबरी करेगा रे बसेसर ? जो मैं कहूंगा उसी की कटाई करेगा तू ? अपनी उम्र देख मुझसे आधा भी नहीं है रे कुछ तो लिहाज कर ।”
“तो मैं उम्र देखूं तू फेंकन लागल हो तो हम का करी ?”
“तो मैं फेंकूंगा तो तू भी फेंकेगा ,वह भी मेरे सामने । चल भाग यहां से फिर इधर दिखा तो जूता मार कर चूतड़ लाल कर देंगे ।”
“तो कका फेंकना तो तुम ही शुरू किए थे ।”
“तो बराबरी करेगा क्या रे ! हम बूढ़ बुजुर्गबानी अपना अनुभव बतावत ही । तुम्हरा अनुभव हमरा अनुभव क्या बराबर हो गया , बाप रे बाप कैसा जमाना आ गया बुजुर्गों की तो नई पीढ़ी में कोई इज्जत ही नहीं रह गई यह तो मेरा दिल मजबूत है कमजोर दिल तो बैठ जाता , देखो तो हीटर से ग्लेशियर पिघलाकर गंगा जी में बाढ़ ला रहा था कैसा जमाना आ गया है रे ।”
सचमुच नई पीढी बिगड़ तो गई है।
डॉ किशोर अग्रवाल