March 5, 2026

एक ताज़ा तरीन गीत….

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#राम_होना_चाहता_हूँ

तुम मुझे बनवास दे दो
मैं राम होना चाहता हूँ

स्वर्ण महलों का ये वैभव
अब नहीं भाता मुझे
मन के भीतर दूर तक
जंगल नज़र आता मुझे
वासनाएं डोलती हैं
स्वर्ण– मृग के भेष में
साँस घुटती है मेरी
इस राजसी परिवेश में

तोड़कर सब बंधनों को
निष्काम होना चाहता हूँ
तुम मुझे बनवास दे दो
मैं राम होना चाहता हूँ

एक अधूरी प्यास लेकर
राह अपनी जा रहा हूँ
कंठ है अवरुद्ध किन्तु
गीत अंतिम गा रहा हूँ
पाषाण की कोई अहिल्या
निस्तब्ध सी उर में पड़ी है
झोलियों में बेर भरकर
राह में शबरी खड़ी है

उनकी मुक्ति के लिए
उद्दाम होना चाहता हूँ
तुम मुझे बनवास दे दो
मैं राम होना चाहता हूँ

––विक्रमादित्य सिंह पथिक

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