October 22, 2026

नवगीत / इस हवा में बर्फ…

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इस हवा में लग रहा है,
बर्फ मिश्रित है।

कल तलक बरसात झेली,
शीत की अब मार है।
खेल मौसम के निराले,
झेलता संसार है।
हर नदी विचलित है उसकी,
लहर कम्पित है।।

काँपते हैं गात कितने,
जिंदगी दूभर लगे।
धूप है बिटिया सलोनी,
अब वही सुंदर लगे।
किंतु इक मजदूर की माँ,
खूब चिंतित है।

क्या पता कब शीत रानी,
लौट के घर जाएगी।
और फिर मधुमास की,
मादक घड़ी वो आएगी।
काँपते लब पे वही छब,
आज चित्रित है।

कॉपीराइट @ गिरीश पंकज

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