अक्षरों से संवादरत विजय राठौर…..
डा.चित्तरंजन कर बुदबुदाते हैं ” कविता मनुष्य चेतना की शिखर यात्रा है।” जीवन भले ही तिमिरावृत हो । ” रात का जीवन निमिष भर है।” जीवन में “पीड़ाओं के पहरे हैं।” तथापि विजय राठौर जैसे यायावर आसमान से तारे तोड़ लाते हैं और दुनिया तालियां बजाती हुई देखती है कि “आसमान से टूटा तारा”।
विजय राठौर जाज्वल्य नगरी जांजगीर से आते हैं। वे अपने समय को निरंतर रच रहे हैं। अपने अनुभवों और कल्पनाओं को
पंख दे रहे हैं। 3 मार्च 2025 को 75 सीढियां चढ़ चुके विजय
राठौर हिंदी काव्य के इतिहास में जांजगीर को दर्ज़ कर रहे हैं।
ग़ज़ल विधा के समानांतर हिंदी में सजल विधा के शिल्पकारों
में शामिल विजय राठौर की अब तक 45 कृतियां सामने आ चुकी हैं। सद्य: प्रकाशित उनके तीन सजल संग्रह ” रात का जीवन निमिष भर “, पीड़ाओं के पहरे हैं ” अभी बिल्कुल अभी लब्ध हुए हैं।
हंडी के कुछ दाने छूकर उनके पकने का अंदाज लगाया जाता है। सचमुच विद्वता का परिचय विनयशीलता देती है। सिद्ध शब्द –
साधक विनम्र होते हैं। स्वयंभू युग प्रवर्तक, अपनी पीठ स्वयं थपथपाने वाले आत्म मुग्ध दंभी रचनाकार (तथाकथित) अधजल
गगरी छलकत जाय को चरितार्थ करते हैं –
फल से लदी डालियों से झुक नहीं सके ,
समझो शब्द -साधना अभी अधूरी है।
कवि अपने समय का प्रहरी होता है। व्यवस्था का मार्गदर्शक
होता है। सजग सतर्क करने का दायित्व भी वह निभाता है। तभी
तो वह दो टूक शब्दों में साफ़ – साफ़ इंगित करता है –
नून तेल लकड़ी के झंझट से उबरे ये झोपड़ियां,
अपनी सभी नीतियों में तुम परिवर्तन आमूल करो।
( पीड़ाओं के पहरे हैं)
ईमानदार मेहनतकश मजदूर वहीं का वहीं हैं। लेकिन अनीति
का सहारा लेने वाले संपन्न हो रहे हैं –
पैसेवाले बने हुए हैं,
चिंदी रोज चुराने वाले।
सजलकार दागदार चेहरों को बेनकाब ही नहीं करते। अपनी
इस यात्रा में नयी पीढ़ी को भी शामिल करते हैं। यह संतोष का विषय है कि विजय राठौर और ईश्वरी प्रसाद यादव से जुड़े जांजगीर अंचल के नवोदित रचनाकार शानदार लिख रहे हैं । विजय भाई
सचेत करते हैं-
उत्तम सजल मानकों पर ही लिखना है,
मित्र लेखनी पर फिर से कुछ धार करो।
( रात का जीवन निमिष भर )
सजलकार अपने सफर में अपनी जीवन संगिनी को याद करता है।
जीवन संगिनी का बिछुडना कितना पीड़ादायक होता है ,यह अकेलापन
भोगनेवाला ही जान सकता है –
देह से तुम तो हुए आजाद प्रियतम,
आ रही मुझको तुम्हारी याद प्रियतम
आगे सजलकार फरमाते हैं –
तुम नहीं तो दुख नहीं बंटता हमारा,
अक्षरों से हो रहा संवाद प्रियतम।
( आसमान से टूटा तारा)
विजय राठौर अक्षरों से सतत -अनवरत संवाद कर रहे हैं। करते रहें हमारी बहुत बहुत शुभकामनाएं।