साहित्य, सत्ता और छत्तीसगढ़
डॉ. परदेशीराम वर्मा
हिन्दी के महान साहित्यकार कमलेश्वर ने लिखा है- सत्ता अपनी मृत्यु नहीं देख पाती। यह उन्होंने सत्ताधारी राजनीतिक दलों की आत्ममुग्धता और अति आत्मविश्वास के सन्दर्भ में लिखा था।
हम उनके इस कथन की सत्यता को 2000 से लेकर 2025 वषों के अपने छत्तीसगढ़ प्रदेश के इतिहास के परिप्रेक्ष्य में देख परख सकते हैं। छत्तीसगढ़ में जिस सत्ताधारी दल ने साहित्य को विशेष महत्व दिया उसने 15 वर्षों तक लगातार राज किया। डॉ. रमनसिंह पन्द्रह वर्ष दस दिन मुख्यमंत्री रहे। उन्हीं के कार्यकाल में छत्तीसगढ़ में राजकीय स्तर पर बड़ा तीन दिवसीय साहित्य महोत्सव हुआ जिसमें देश भर के नामी गिरामी साहित्यकारों की भागीदारी थी।
फिर वैसा महोत्सव किसी अन्य मुख्यमंत्री ने आयोजित नही करवाया। 2000 में अजीत जोगी जी मुख्यमंत्री बने। वे प्रखर राजनीतिज्ञ और चिंतक तथा साहित्य प्रेमी तो थे लेकिन उन्होंने छत्तीसगढ़ राजाभाषा आयोग नहीं बनाया बल्कि उनके बाद आए डॉ. रमनसिंह ने 2007 में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग बनाकर इतिहास रचा।
छत्तीसगढ़ राज्य प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी ने बनाया। वे स्वयं कवि थे। डॉ. रमनसिंह ने उनके पगचिन्हों का अनुशरण कर साहित्य की महत्ता को स्वीकार किया। डॉ. रमनसिंह ने जैसा सम्बन्ध साहित्य की दुनियां के लोगों के साथ बनाया वैसा दूसरे मुख्यमंत्रियों से सम्भव नहीं हुआ। अजीत जोगी भी अगर और अवसर पाते तो शायद ऐसा ही प्रतिमान गढ़ते। 2018 में कांग्रेस ने एकतरफा बड़ी जीत हासिल की। भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने। मगर उन्होंने महत्वपूर्ण छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग को अध्यक्ष विहीन कर दिया। यह छत्तीसगढ़ के साहित्य जगत के लिए अनपेक्षित और अपमानजनक निर्णय था। आज भी साहित्य जगत इस दुर्घटना को भूल नहीं पाता है।
2018 मंे 90 में से 68 सीटों पर प्रचंड जीत हासिल कर सत्तासीन हुए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की पार्टी कांग्रेस ठीक अगले चुनाव में 2023 में बुरी तरह हार गई। 68 सीटों पर जीतने वाली पार्टी 35 सीटों पर सिमट गई। जीत प्रचंड थी तो हार भी हाहाकारी रही। चौथे मुख्यमंत्री विष्णुदेवसाय ठीक डॉ.रमनसिंह की तरह पुनः छत्तीसगढ़ में अखिल भारतीय साहित्य महोत्सव के आयोजन की तैयारी कर रहे हैं। 21 से 23 जनवरी 2026 में यह विराट आयोजन होगा।
उनके पास अभी समय भी है। आशा है वे भी डॉ. रमनसिंह जी की तरह साहित्य को यथोचित महत्व देने में सफल होंगे। छत्तीसगढ़ लड़कर हक पाने के लिए प्रयत्न करने वालों का प्रदेश नहीं है। इसीलिए साहित्य के साथ दुराव और अपमान के शासकीय निर्णयों का प्रतिकार भी यहॉं नहीं होता। हारे को हरिनाम राष्ट्रकवि दिनकर के काव्य संग्रह का नाम है जिसमें छत्तीसगढ़ी स्वभाव की झलक है। लेकिन आवाज के बिना जो परिणाम आते हैं उससे कमलेश्वर जी का कथन याद हो आता है कि सत्ता अपनी मृत्यु नहीं देख पाती। सत्ताएं अच्छे दिनों में आसमान पर उड़ती हैं और बुरे दिनों में आत्मालोचन छोड़कर टांग खिंचाई में अपनी बर्बादी का इन्तजाम करती है।
छत्तीसगढ़ वह प्रदेश है जहॉं हिन्दी की पहली कहानी लिखी गई। पेंड्रा में रहकर पंडित माधवराव सप्रे ने 1900 में हिन्दी की कहानी लिखी-
‘एक टोकरी भर मिट्टी।‘
इसे कमलेश्वर जी ने हिन्दी की पहली कहानी मानकर साहित्य संसार को कहानी के इतिहास में छत्तीसगढ़ की महत्ता के सम्बन्ध में बताया। कालान्तर में यह सर्वमान्य हो गया कि पंडित माधवराव सप्रे लिखित कहानी ‘‘एक टोकरी भर मिट्टी‘‘ ही हिन्दी की पहली कहानी है।
कमलेश्वर जी ने साहित्य अकादमी के लिए पिछली सदी की कालजयी कहानियों के चार खंडों का संपादन किया। उसमें छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण कथाकारों की कहानियों को स्थान मिला। मेरे द्वारा लिखित कहानी दिन-प्रतिदिन को भी उन्होंने कालजयी कहानी संकलन में स्थान दिया।
छत्तीसगढ़ में हिन्दी और छत्तीसगढ़ी के देश और दुनियॉं भर में प्रसिध्द साहित्यकारों ने अपनी साधना के बल पर इतिहास रचा। अमरत्व को प्राप्त किया। कुछ रचनाकार विश्वभर में पहचाने गए। लेकिन टोकरी भर मिट्टी को लिखने वाले पंडित माधवराव सप्रे ने छत्तीसगढ़ी लोककथा से कथानक और कथातत्व लेकर जिस ढंग से कहानी को सजाया उससे हम सबको अपने प्रदेश की लोकथाओं के सम्मोहक संसार की अहमियत ने गर्वित किया।
नए सिरे से लोक कथाओं का संकलन शुरू हुआ। मेरे संपादन में भी प्रभात प्रकाशन से एक किताब छत्तीसगढ़ की लोककथाएं प्रकाशित है। एक टोकरी भर मिट्टी कहानी में मुख्य पात्र एक वृध्दा है जिसकी सहृदयता और चातुर्य के आगे जमींदार परास्त हो जाता है। विस्तारवादी जमींदार को परास्त करने वाली बुढ़ी माता छत्तीसगढ़ की बीसों लोक कथाओं में विराजती हैं। लेकिन उनसे उचित प्रेरणा लेकर कथा सृजन कर इतिहास बनाया महाराष्ट्र से छत्तीसगढ़ आए पंडित माधवराव सप्रे ने। यह दृष्टि और प्रस्तुति कौशल के साथ ही विषय चयन की समझ के कारण ही सम्भव हो सका।
छत्तीसगढ़ ही नहीं देश-विदेश में भी सत्ताओं की चूलें हिलती है। पार्टियां सत्ता में आती जाती हैं। लेकिन कुछ मूल अपेक्षाएं विभिन्न अंचलों की अलग-अलग होती है। छत्तीसगढ़ भोले-भाले शांति प्रेमी, अपने काम से काम रखने वालों का प्रदेश हैं। यहॉं देश के अन्य प्रान्तों से लोग अपने प्रान्तों की विशेषता लेकर आते हैं और कालान्तर में वे छत्तीसगढ़ी बनकर रह जाते हैं। धीरे-धीरे अपने प्रान्त की विशेषताएं भी वे भूल जाते हैं, स्वभावगत खासियत भी उनकी विलुप्त हो जाती है। छत्तीसगढ़िया सरदार, मियां जी, समर्थ व्यापारी वर्ग के वे लोग जिनके पुरखे सैकड़ों वर्ष पूर्व छत्तीसगढ़ आए वे सब स्वभाव और संस्कार से छत्तीसगढ़ी होते गए। भाषा और संस्कृति के साथ साहित्य क्षेत्र में भी उनकी साधना के प्रतिफल को हम सबने देखा और सराहा। छत्तीसगढ़ महतारी की वंदना के गीत सबने लिखकर यश प्राप्त किया। संत पवन दीवान की अमर पंक्तियॉं याद हो आती हैं –
जय जय छत्तीसगढ़ महतारी,
भारत मांॅं की प्यारी बेटी
सबकी बनी दुलारी
जय जय छत्तीसगढ़ महतारी।
डॉ. परदेशीराम वर्मा
एल.आई.जी.18,आमदी नगर,हुडको
मोः 9827993494