फ़िर नहीं आते……..
पतझड़ में शाख से पत्ते
जब टूट बिखर जाते हैं
मौसम बहार आने पर भी
फ़िर वापस शाख से जुड़ नहीं पाते
फूलों के गुलिस्तां में जब
फूल मुरझा गिर जाते
माली देखता रह जाता
फ़िर गिरे फूल वापस जुड़ नहीं पाते
सोये में जो देखते हैं सपने
जो सच्चा अपना सा था
नींद टूट जाने पर
फ़िर वे सपने वापस नहीं आते
जब पंख फड़ फड़ाना सीख लेते
ऊंचाइयों को नापना सीख लेते
उड़ जाते जब एक बार परिंदें
फ़िर वापस घोंसलों में नहीं आते
कुछ यूं ही तो है यह
सफ़र ज़िंदगी का यहां
राह में जो अपने बिछड़ जाते
फ़िर वापस मिल नहीं पाते
वक़्त का कारवां मौसम की तरह
दिन रात बदलता रहता
जिस वक़्त कभी मुस्कराए थे सब
फ़िर वो वक़्त वापस नहीं आते
यादों का मंज़र धुंआ धुंआ सा
एक आग सी लगी हो जैसे दिल में
उतर जाता जब कोई नजरों से
फ़िर वापस दिल को नहीं भाता
उनकी सीख याद रह जाती
गुमराह होने से बचाती
एक बार जो चले जाते मां बाप
फ़िर वापस घर को नहीं आते
सदियों से चल रहा यही सिलसिला
हम कैलेंडर के पन्ने पलटते रह जाते
यहां एक युग सा बदल जाता
फ़िर गुजरते साल वापस नहीं आते
©️✍🏻ज्योति वत्सल / 14.12.2025
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