March 6, 2026

अशोक वाजपेयी की ससुरी जनता

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अजय तिवारी, दिल्ली
हमारे प्रियवर संजीव चन्दन ने दो दिन पहले लिखा था कि अशोक वाजपेयी ने कोलकाता पुस्तक मेले में कुछ विचित्र बयान दिया।

संजीव चन्दन उन हिम्मती और तार्किक टिप्पणीकारों में हैं जो निर्भीकता से अपनी बात कहते हैं। अशोक वाजपेयी हिंदी के साहित्य संसार में एक प्रभावशाली हस्ती हैं। नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव, अशोक वाजपेयी को लक्ष्य करके एक समय ‘साहित्य में माफिया’ पर बहस चली थी। इनमें अशोक जी का महत्व यह है कि अब अनेक ‘माफियाओं’ में वे अकेले या सर्वप्रमुख बचे हैं। नामवर जी नहीं रहे, राजेंद्र यादव नहीं रहे, कमलेश्वर भी गये, मैनेजर पांडेय भी चले गये, विभूति नारायण राय अवकाश पाकर उस क्षमता के नहीं रहे जो अशोक जी में बनी हुई है।
पहले भारत भवन, फिर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय और अब रज़ा फाउंडेशन–अशोक जी सदा से ताकतवर रहे हैं और आज भी हैं। उनके कार्यों और बयानों की आलोचना करने का साहस मुश्किल से ही कोई-कोई करता है।

उनके द्वारा प्रचारित सांस्कृतिक विचारधारा को जब 1983-84 में मैंने ‘कुलीनतावादी संस्कृति’ की संज्ञा दी थी तब कितने विरोध, बहिष्कार और उपेक्षा का सामना करना पड़ा, इसकी बात कभी बतानी चाहिए। आज तो हिंदी के श्रेष्ठ और सुपठित कवि कृष्ण कल्पित ज़रूरत होने पर निर्भीकता के साथ अशोक वाजपेयी के कुलीनतावादी विचारों और कृतियों की आलोचना करते हैं। इधर कुछ दिनों से संजीव चन्दन ने सच के लिए लड़ने के अपने दायित्व में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय और उसके पिछले पदाधिकारियों की, विशेषतः अशोक वाजपेयी टीम की आलोचना का साहस दिखाया है।

अभी जिस बात की चर्चा कर रहा हूँ वह कोलकाता पुस्तक मेले में उनका बयान है। वाजपेयी जी ने कहा कि “यह ससुरी जनता चाहती है कि हम उसके लिए लड़ें। क्यों लड़ें?”

एक निवेदन है। यह मुगालता अपने दिमाग से निकाल दीजिए कि ‘ससुरी जनता’ आपसे आशा करती है! आप जनता को निरंतर बुरा-भला कहा करते हैं और जनता आपकी निरंतर उपेक्षा करती है। आयोजक तो बहुत-सा गणित बिठाकर अतिथियों को आमंत्रित करते हैं। लेकिन जूस कोलकाता में आपने ‘ससुरी जनता’ पर ये अनमोल वचन कहे थे, उस मेले में मुख्य अतिथि होते हुए भी आपकी एक पुस्तक तक नहीं बिकी। आप भारतेंदु हरिश्चंद्र की भर्त्सना करते रहे हैं लेकिन भारतेंदु की पुस्तकें आज भी बिकती हैं। प्रेमचंद आपको पसंद नहीं हैं लेकिन प्रेमचंद आज भी जैनेन्द्र, अज्ञेय से बहुत ज़्यादा जनप्रिय हैं।

इस ‘ससुरी जनता’ के पास एक विवेक है। उसके प्रयोग से वह जानती है कि निराला बहुत बड़े कवि हैं। उनके बाद नागार्जुन और केदारनाथ अग्रवाल हैं। लेकिन इस ‘ससुरी जनता’ ने आपको कवि मानने से इंकार कर दिया है। यह आपकी कुंठा है।

आलोचक आप हैं नहीं, नौकरशाह अब रहे नहीं, कवि होने की महत्वाकांक्षा प्रबल है लेकिन ‘ससुरी जनता’ और आम साहित्य समाज आपको कवि मानता नहीं।

जनता जिनसे उम्मीद करती है कि वे उसके लिए लड़ें, वे कवि हैं, लेखक हैं, संस्कृतिकर्मी हैं। आपसे उपकृत लोग शायद आपको अनुपातहीन बड़ा कवि बताते होंगे। लेकिन ‘ससुरी जनता’ उपकृत होने की जगह उपकार करती है। आपको इस सूची में कहीं नहीं रखती।

भारतेंदु हरिश्चंद्र की चर्चा हुई। भारतेंदु ने कहा था कि जो बात जनसाधारण में पहुँच जाती है वह सार्वजनीन, सार्वकालिक हो जाती है! अब देखिए इस ‘आ ससुरी जनता’ का कमाल। सिर चढ़कर बोलता है। जिसने यह पहचाना वह कालजयी हो गया, जिसने हिकारत दिखायी वह कुंठित हो गया।

कबीर इस ‘ससुरी जनता’ के जितने प्रिय हैं उतने ही महान कलाकार भी हैं, तुलसीदास जितने लोकप्रिय हैं उतने ही बड़े कलाकार हैं इसमें किसी को सन्देह नहीं हो सकता, जायसी, सूर, मीराँ, रहीम सबके बारे में यह बात लागू होती है। बस इतना जरूर है कि ये महान कलाकार जनता के प्रति वैसी हिकारत नहीं रखते थे बल्कि ‘ससुरी जनता’ से अभिन्न होकर रहते थे। सत्ता के चाटुकार तो वे हो ही नहीं सकते थे, सत्ता के प्रतिनिधि या किसी तरह का सत्ताकेंद्र भी वे नहीं थे। यही कारण है कि वे सबके सब जनता के हृदय में वास करते हैं। उन्हें ‘ससुरी जनता’ से इतनी शिकायत नहीं रही है।

मेरी समझ से इस प्रसंग के माध्यम से हमें साहित्य में जनता की भूमिका पर, जनता और साहित्य के अन्तःसम्बन्धों पर बातचीत करनी चाहिए। मेरा उद्देश्य अशोक वाजपेयी की निंदा करना नहीं है। यह संकेत करना है कि जनता के प्रति यदि आप हिकारत का भाव रखते हैं तो जनता आपकी उपेक्षा कर सकती है। आपकी हिकारत से जनता का कुछ नहीं बिगड़ता लेकिन जनता की उपेक्षा से आपका बहुत कुछ बिगड़ सकता है। समस्या यह है कि जैसे-जैसे अशोक वाजपेयी को जनता महान प्रशासक और महत्वपूर्ण कवि मानने से इंकार करती गयी है वे उतना ही जनता के प्रति अधिकाधिक हिकारत से काम लेते गये हैं।

यह बात याद रखने की है कि जिनपर उपकार करके हम अपना मठ खड़ा करते हैं वे खुद अपना मठ बनाने लगते हैं। इसलिए वे सब ‘मतलब के यार’ होते हैं। आखिरकार काम आती है यही ‘ससुरी जनता’!!

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