कुछ हिन्दी के कवियों की काव्य पंक्तियां जो साल के आख़िरी दिनों में बरबस मेरी स्मृति में कौंध रही हैं –
1.”खुसरो दरिया प्रेम का,उल्टी वा की धार।
जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार।।”- अमीर खुसरो
2.”ऐसा कोई ना मिल्या,जा सों रहिए लाग।
सब जग जलता देख्या,अपनी-अपनी आग।।”- कबीर
3.”ऐसा कोई ना मिल्या, जासू कहूं निसंक।
जासो हिरदा की कहूं, सो फिर मारे डंक।।”-कबीर
4.”पानी बीच मीन प्यासी,मोहे सुनि-सुनि आवत हांसी।”-कबीर
5.”रहना नहिं देस बिराना है।
यह संसार कागद की पुड़िया बूंद पड़े घुल जाना है।”-कबीर
6.”संतो भाई आई ग्यान की आंधी रे।
भ्रम की टाटी सभै उड़ानी,माया रहै न बांधी रे।”-कबीर
7.”धरा को प्रमान यही तुलसी,जो फरा
सो झरा,जो बरा सो बुताना।”-तुलसी
8.”गुरु चिनगी लाई जो मेला,
जो सुलगाई लेई सोई चेला।”-जायसी
9.”खम ठोक ठेलता है जब नर,
पर्वत के जाते पांव उखड़।
मानव जब जोर लगाता है,
पत्थर पानी बन जाता है।”-दिनकर
10.”गहन है यह अंधकारा।
स्वार्थ के अवगुंठनों से हुआ है लुंठन हमारा।
घिरी है दीवार जड़ की घेरकर,
बोलते हैं लोग ज्यों मुंह फेरकर।
इस गगन में नहीं दिनकर, नहीं शशधर, नहीं तारा।
गहन है यह अंधकारा।”-निराला
11.”बहुत बहुत ज्यादा लिया, दिया बहुत कम
अरे,मर गया देश जीवित रह गए तुम।”-मुक्तिबोध
12.”अगर ज़िंदा रहने के पीछे सही तर्क नहीं है
तो रामनामी बेचकर या रंडियों की दलाली कर
रोज़ी कमाने में कोई फ़र्क़ नहीं है।”-धूमिल
13.” हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
मेरे सीने में न सही तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग , लेकिन आग जलनी चाहिए।”-दुष्यंत कुमार
14.” सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैं,
दिल पर रखकर हाथ कहिए,देश क्या आज़ाद है।”-अदम गोण्डवी
15.”हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे।”- विनोद कुमार शुक्ल