दीर्घा में ‘वृत्तान्त’
फोटो प्रदर्शनी में जीवन और जगत
■ राजेश गनोदवाले
इधर काफ़ी समय बाद एक फोटो प्रदर्शनी देखी।
देखा और लगा कि लिखना चाहिए। सक्रिय रिपोर्टिंग इन दिनों, खासकर राजधानी के आयोजनों की छूटने के बाद शहर की हलचलों को देखना भी कम हुआ है। यदि देखा तो लिखने का मन नहीं करता। एक वजह लिखकर उसे कहां दूं? यह सवाल आड़े आ जाता है। कारण है आज संस्कृति की जगह का “संपादकीय-विवेक” के चलते सिमटते रहना! इसीलिए बाहरी आयोजनों को देखकर लिखने का ढंग ज़रा बदला है। इसकी जगह कलाकारों से बातचीत के बाद कोई डिस्पैच बनाना , या अपना जीवनानुभव समेट कर विषय को विस्तार देना अधिक सुखदाई लगता है। बाहरी पत्र-पत्रिकाओं में दस्तक देने का क्रम अब कहना चाहिए मैंने अपने ढंग का बना रखा है।
आज लेकिन इस नुमाइश ~ वृत्तान्त गर्ग की फोटो प्रदर्शनी~ का न्योता आया तो जाने की गर्मजोशी उभर आई। अपनी पहली एकल प्रदर्शनी होने के बावजूद वृत्तान्त का बेहद संयमित होना उसकी गंभीरता का सूचक लगा। जब कामों में नज़रें घूमीं तो ‘परिपक्वता का नया वृत्तान्त’ दिखाई दिया।
वृत्तान्त संभवतः जेनज़ी वाली पीढ़ी के आगे-पीछे का नौजवान है। उसके भीतर घूमते हुए दृश्यों को दर्ज करने का हुनर है। पिछले 7 बरसों में देश के भीतर और बाहर की जो भी यात्राएं उसने की उसका ड्रॉफ्ट अब उसके पास ‘छवियों की शक्ल’ में है। अर्थात् वह कोई सिद्ध फोटोग्राफ़र नहीं है लेकिन यादगार प्रसंग या घटना न भी हो तो अपनी दृष्टि के दायरे में लाकर उसका कलात्मक रूपांतरण फोटोग्राफी की शक्ल में करना उसकी खूबी है। अब तक के सहेजे हुए उन्हीं दृश्यों की यह नुमाइश है। इसी खूबी को देखने का दो दिवसीय मौक़ा है महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय परिसर भीतर की “विचित्र दीर्घा” में! अचरज हुआ कि कोई उद्घाटन, मुख्य अतिथि आदि का प्रपंच नहीं। सीधे समय हुआ और देखिए। यानी, ‘तय समय ही एक अर्थों में मुख्य अतिथि था।’ कभी इस नवाचार को भी दर्ज करना होगा आतिथेय पर लिखना हुआ तो।
खैर!
वृत्तान्त के पास दृष्टि कौशल तो है समय को थाम लेने का हुनर भी। सौ से कुछ अधिक फोटोग्राफ चुनकर लगाना, जैसा कि उसके लिए भी कठिन इम्तिहान रहा होगा। और सभी बाकायदा फ्रेम के साथ। अभी जितने फोटो गैलरी में दर्शकों के समक्ष है कहीं उससे दस गुना उसकी हार्ड डिस्क में इस उहापोह में है कि किसी शाम शायद उनका भी कोई रसिक इस्तेमाल हो!
वृत्तान्त जिस उम्र से निकलकर आता है उसमें जीवन की रंगीनियों में उलझ जाने का खतरा अधिक होता है। यहां लेकिन उसकेखींचे ऐसे- ऐसे फोटोग्राफ्स देखे जा सकते हैं जिन्हें खींचने की समझ बढ़ी उम्र और जीवनानुभव मांगती है।
लैंडस्केप है, पोर्ट्रेट है, विसंगतियां हैं, दिनचर्या है, प्रकृति है, प्राणी है, समय पर घटित दृश्य हैं तो कुछ न्यूज़ वैल्यू वाली कम्पोजिशन्स भी है। हां, कुछ या अधिक फोटोग्राफ नहीं भी होते तो कोई बात न होती। चुनाव में लेकिन पहली नुमाइश के आकर्षण में ऐसी सरलता का उतर आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।
आज जब दृश्यों को नष्ट करना, भुला दिया जाना, देख कर अनदेखा करना, या जो असल में दृश्य है ही नहीं उसे सायास दृश्यता का दायरा देने का चलन है तब सीनियर गोडबोले – जूनियर गोडबोले, डिकॉस्टा, बसंत दीवान, एस.अहमद, साधना ढांड जैसी हुनरमंद फोटोग्राफरों की क्षमता वाले रायपुर शहर में छायाकारी की इस नई जनरेशन का स्वागत होना चाहिए।
~ दीर्घा का वृत्तान्त :
फोटोग्राफ की नुमाइश देख कर
निकलते हुए लगा कि
इस दीर्घा का ही एक वृत्तान्त लिखना चाहिए। पच्चीस बरस का राज्य हो गया।
लेकिन उसके पास एक ठिकाने की दीर्घा नहीं तब, जब यहां दिग्गज पेंटर मौजूद हैं।
पच्चीस वर्षों के अपने कलात्मक इतिहास में छत्तीसगढ़ क्या यह कहें कि
उसके पास राजधानी या
कहीं भी एक कला दीर्घा नहीं है!
——————————————————– राजेश गनौदवाले