विनोद कुमार शुक्ल के जीवन-मूल्य उनकी कला में प्रतिबिंबित होते थे…
एक
करीब बारह बरस पहले की शाम थी. रायपुर के भूले-भटके साहित्यिक आयोजनों से भी अमूमन अनुपस्थित रहने वाले विनोद कुमार शुक्ल उस दिन शामिल हो गए थे. सकुचाये-से बैठे थे. मैं और जया जादवानी उन्हें थोड़ा सहज करने के लिए उनसे बात करने लगे.
कुछ पल बाद वे जया जादवानी से बोले—‘आपकी ड्रेस बहुत सुंदर है.’
हम दोनों मुस्कुराने लगे. इससे पहले कि वे कुछ कह पातीं, वे फिर बोले—‘आप बदल-बदल कर ड्रेस पहनती हैं.’
अब वे लगभग खिलखिला उठीं. मैं बोला—‘विनोदजी कहना चाहते हैं कि आप बहुत सुंदर लग रही हैं.’
हम हिंदी की तीन पीढ़ियों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. मैं करीब दो बरस पहले उस शहर में रहने आ गया था, जो उन दोनों का स्थायी पता था. उन दिनों जया जादवानी के पड़ोस में रहता था. वे दोनों मेरे घर आकर भिन्न अवसरों पर फिल्में देख चुके थे.
मैं उस शाम और उसके बाद भी अक्सर सोचता था: क्या किसी स्त्री की इस कदर सादा-दिल तारीफ़ संभव है? आप उनके परिधान और सूरत पर टिप्पणी करें, लेकिन शब्दों से आकांक्षा नहीं अबोधपन झलके?
दो
उनके जाने के बाद अगर तमाम बिरादरियों के लेखक-पाठक उन पर लिख रहे हैं, उनके लेखन में ‘राजनीति के अभाव’ बावजूद उन्हें स्मरण कर रहे हैं, उसकी वजह सिर्फ़ उनका साहित्य नहीं, जीवन भी है—प्रांजल, सरल, ईमानदार. लगभग बेमिसाल.
लेखक मित्रों के साथ संवाद अक्सर विमर्श की ओर मुड़ जाता है. किसी किताब या कलाकृति पर, राजनीतिक प्रश्नों पर उनकी राय, जीवन के चुभते प्रश्नों पर उनकी सलाह. कभी आप ऐसे विषय लेकर जाते हैं, कभी ख़ुद ही उमड़ आते हैं. किसी बड़े रचनाकार के साथ ऐसी लंबी मुलाकात दुर्लभ है जब बातचीत से साहित्य अनुपस्थित रहा आए, लेकिन आप गहरे तक भीगकर, मद्धिम होकर लौटें, मानो राग मालकौंस सुनकर आए हों.
ऐसे इंसान कम हैं जिनसे मुलाकात आपको धीमा कर देती है, भीनी सुगंध से भर देती है. जो किसी की चुगली नहीं करते, तमाम किस्म के कारोबार में लिप्त दिखाई नहीं देते. कई नामी हस्तियों से मिलकर आपको लगेगा कि यह तो बहुत ही हलके निकले, छिछलेपन में डूबे हुए. जिन मूल्यों की वकालत वे अपनी कला में करते हैं, जीवन में उससे एकदम विपरीत हैं.
इसके उलट, विनोद कुमार शुक्ल के जीवन-मूल्य उनकी कला में प्रतिबिंबित होते थे. उनकी कला निर्मिति नहीं थी, उनके आंतरिक संसार की प्रतिलिपि थी. आप उनके साथ पूरा दिन बिताएं लेकिन आप साहित्य नहीं, जीवन का साक्षात् कर लौटते थे—इस उज्ज्वल जीवन के समक्ष कलाकृतियां कमतर प्रतीत होती थीं. मेरा अनुभव शायद उन सभी ने साझा किया होगा जो उनसे मिलते थे. ‘नौकर की कमीज़’ पर फिल्म बनाने के दौरान जब मणि कौल उनसे मिले, वे आश्वस्त थे—विनोद कुमार शुक्ल ही संतू बाबू हैं.
आप उनके साथ ‘लेखक की शाम’ नहीं बिता सकते थे. रम-बीयर तो दूर, कॉफ़ी भी शायद नहीं थी. आप अदरक वाली चाय पीते थे, नमकीन-बिस्कुट के साथ. उनका घर किताबों से घटाटोप नहीं था. जो किताबें थीं भी, चुपचाप कांच के पल्ले वाली छोटी अलमारी से झांकती थीं. सादा कुर्सियां और मेज.
उनका मकान उनके स्वभाव को धारण करता था. इसकी खिड़कियों पर संकोच का पर्दा डोलता रहता था. मैंने एक बार उनसे उनके प्रिय लेखकों के बारे में पूछा, वे बोले: ‘आप जानते ही हैं, मैंने बहुत कम पढ़ा है. आप अपने लेखक बताइए. मैंने पढ़ा होगा, तो हां कह दूंगा.’
वे अन्य किताबों या लेखकों के बारे में तो दूर, अपने लिखे पर भी बोलने से कतराते थे. पिछले वर्षों में अपने युवा मुरीदों के आग्रह पर अपनी कविताएं कैमरे पर रिकॉर्ड करने लगे थे, लेकिन अपने बारे में कुछ भी कहने से बचते रहे. उनके पुत्र शास्वत गोपाल ने मुझसे कभी कहा था कि दादा ने आलोचना का जवाब नहीं दिया. वे कहते थे कि आलोचना को उत्तर देना रचनात्मक कार्य नहीं है. आप जोड़ सकते हैं कि विनोद कुमार शुक्ल के अनुसार अपने लिखे पर बोलना भी रचनात्मक कार्य नहीं था.
तीन
हिंदी के लेखकीय समुदाय में मान्यता है कि लेखक को एक ख़ास क़िस्म का ‘सेक्युलर’ होना चाहिए. उन्हें धार्मिक प्रतीकों की सार्वजनिक अभिव्यक्ति से बचना चाहिए. इन प्रतीकों का क्षणिक प्रयोग भी आपको सांप्रदायिक बना सकता है.
इस मान्यता के साथ जी रहा मैं चकित रह गया जब एक दिन उन्होंने अपनी चार वर्षीय पोती तारुष शाश्वती से कहा, ‘अंकल को हनुमान चालीसा सुनाओ’. जिन परिवारों से मैं गुज़रा था, वहां बच्चों को गणित के पहाड़े, सामान्य ज्ञान के प्रश्न या हिंदी-अंग्रेजी के पद्यांश इत्यादि सुनाने को कहा जाता था. एक बड़े लेखक के घर में किसी आरती को गाकर सुनाया जा रहा था—यह मेरे लिए धर्मनिरपेक्षता के पुनर्परीक्षण का अवसर था.
उनके साथ जब अपनापन बढ़ गया, मैं उन्हें कार में बैठा कर अपने घर लाने लगा. एक दिन मैंने उनके लिए रोटियां सेकीं. साथ में शायद आलू की गीली सब्जी थी, और मां का दिया अचार. उन्होंने कुर्सी पर बैठ कर स्टील की प्लेट में स्नेह से खाना खाया और टीवी पर अब्बास किरोस्तामी की ‘फाइव’ देखी.
मेरा तीन कमरों का घर था, बड़ा सा लॉन और पोर्च. अकेले रहते इंसान के मुताबिक बहुत बड़ा घर. फर्नीचर के नाम पर तीन कुर्सियां, एक कंप्यूटर डेस्क, कुछ बुक शेल्फ और एक गद्दा. वे मेरे घर पर निगाह डालते हुए बोले: ‘यह गृहस्थी रहने के लिए नहीं, छोड़कर चले जाने के लिए है.’
चार
वे अपने बारे में बहुत कम बोलते थे, लेकिन जब थोड़ा सहज हो जाते तो प्रायः यह जोड़ते थे कि जिस दिन उनका जन्म हुआ था, राजनांदगांव में कृष्णा टॉकीज़ की शुरूआत हुई थी. वे अपना जन्म और बचपन इस सिनेमा हॉल से जोड़कर देखते थे, इस संयोग में किसी बड़े सत्य को देखते थे. उनकी यह उक्ति कि मैं शब्दों की जगह दृश्य में सोचता हूं, बचपन के सिनेमा हॉल को चरितार्थ करती थी. वे दशकों पहले रायपुर रहने आ गए थे, लेकिन आजीवन राजनांदगांव के लेखक बने रहे, जिसे आज भी छत्तीसगढ़ में कई लोग नांदगांव बुलाते हैं.
अगर किसी लेखक के रचना-संसार को आप उसके भूगोल में देख सकते हैं, तो यह दिलचस्प प्रश्न हो सकता है कि क्या विनोद कुमार शुक्ल पूर्वी उत्तर प्रदेश या बिहार या बंगाल के लेखक हो सकते थे? छत्तीसगढ़ आत्मीय, अनगढ़, सुखमय और शांत भूगोल रहा है. जब आंध्र प्रदेश से आए नक्सलियों ने दक्षिण छत्तीसगढ़ यानी बस्तर को अपनी राजधानी बनाया, बाकी राज्य इस क्रांतिकारी विचार से प्रायः अछूता रहा आया. इस आंदोलन के साथ वैचारिक संवाद इस भूगोल पर नहीं हुआ.
जब छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश का अंग था, भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, उज्जैन जैसे शहरों के समक्ष इसका कोई प्रतिनिधि नहीं था. तमिलनाडु, बिहार और पश्चिम बंगाल से अधिक क्षेत्रफल वाले इस प्रदेश की साहित्यिक-सांस्कृतिक हस्तियों को आप आज भी उंगली पर गिन सकते हैं. मुक्तिबोध का जन्म ग्वालियर के करीब श्योपुर में हुआ था, जीवन कई शहरों और प्रदेशों में बीता था. उनका छत्तीसगढ़ से संबंध इतना ही था कि वे अपने अंतिम दशक में राजनांदगांव के एक कॉलेज प्राध्यापक नियुक्त हुए थे.
छत्तीसगढ़ के रचनात्मक संसार का अनुमान इससे लगाएं कि साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित इस राज्य के एकमात्र लेखक विनोद कुमार शुक्ल थे (श्रीकांत वर्मा का जन्म बिलासपुर और अशोक वाजपेयी का जन्म दुर्ग में हुआ था, लेकिन वे छत्तीसगढ़िया नहीं थे. न उनकी कृतियां इस भूगोल से जन्मी थीं). लेकिन फिर इस राज्य ने उनके किरदारों में अपने सत्य को इस तरह हासिल कर लिया कि किसी अन्य स्वर की दरकार नहीं रही. अकादमी, ज्ञानपीठ से लेकर तमाम अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार उस घर पर आकर ठहर गए थे जिसका पता जब मैं पहली बार उनसे मिलने आ रहा था, उन्होंने मुझे कुछ इस तरह बताया था—‘सफ़ेद चम्पे के फूल वाला घर’.
कोई अकेला लेखक अपने गृह-राज्य को इतना बड़ा मुकाम दे गया, यह आधुनिक भारत का शायद विरला उदाहरण होगा. आप रबिन्द्रनाथ टैगोर या शिवराम कारंथ का नाम ले सकते हैं. इन विभूतियों की पद-ध्वनि कहीं विराट फ़लक पर गूंजती थी. लेकिन गौर करें, इन हस्तियों ने एक विशिष्ट अर्थ-तंत्र में जन्म लिया था. बंगाल और कन्नड़ के अत्यंत समृद्ध समाज ने उन्हें पोषित किया था. उनके घर की खिड़कियां दुनिया भर के ज्ञान और विज्ञान की ओर खुलती थीं. इसके विपरीत जिस भूमि पर विनोद कुमार शुक्ल पल्लवित हुए, उसकी पगडंडियां कस्बे की चारदीवारी पर आकर धुंधलाने लगती थीं. मैंने ‘द हिंदू’ में प्रकाशित एक लेख में विनोद कुमार शुक्ल की तुलना महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन से की थी. यह बीज नैसर्गिक था. इसे किसी पोषण या सरंक्षण की दरकार न थी.
पाँच
एक बार उन्होंने मुझे ‘नौकर की कमीज़’ का दिलचस्प इतिहास सुनाया था. मैं इसे अंग्रेजी में अन्यत्र लिख चुका हूं, लेकिन यहां भी दर्ज किया जा सकता है. यह उपन्यास मध्य प्रदेश सरकार की मुक्तिबोध फ़ेलोशिप (1976-77) के दौरान लिखा गया था. उन्होंने अपने अध्यापन कर्म से एक वर्ष की छुट्टी ले ली. उन दिनों वे अक्सर सुनते थे कि बड़े लेखक टाइपराइटर का प्रयोग करते हैं.
चालीस वर्षीय विनोद कुमार शुक्ल को लगा कि अवसर आ गया है. उन्होंने रायपुर के गोल बाज़ार में दुर्गा टाइपिंग इंस्टिट्यूट में दाखिला ले लिया. छह महीने तक टाइपराइटर पर उंगलियाँ टकटकाते रहे, लेकिन टाइपिंग नहीं सीख पाये. ज़ाहिर है, इस दौरान उन्होंने उस कृति का एक शब्द नहीं लिख पाये जिसके लिये फ़ेलोशिप मिली थी. हालांकि, इसकी एक वजह और थी. इस दौरान अपना एक और पुराना सपना पूरा करने के लिये वे एक अन्य कक्षा में बैठने लगे थे—रेडियो कैसे ठीक किया जाये. फिर ज़ाहिर है कि रेडियो बनाना भी नहीं सीख पाये.
परास्त भाव से उन्होंने अशोक वाजपेयी को पत्र लिखा जो उन दिनों फ़ेलोशिप देने वाले सरकारी विभाग में कार्यरत थे. पत्र कहता था—मैंने पिछले छह महीनों में कुछ नहीं लिखा है, कृपया इस अध्येतावृत्ति को रद्द कर दें. अशोक वाजपेयी ने उत्तर में लिखा—हमें आपको यह अध्येतावृत्ति आपको देनी थी. आप जो चाहें, स्वतंत्र हैं.
‘मुझे लगा जब अशोक जी मुझ पर इतना भरोसा कर रहे हैं, मैं क्यों नहीं लिख सकता,’ उन्होंने मुझसे कहा.
अगले छह महीनों में उपन्यास तैयार था.
छह
यह प्रचलित मान्यता भी ठीक नहीं थी कि वे गैर-राजनीतिक थे. वे राजनीतिक मनुष्य थे, लेकिन उन अर्थों में नहीं जिनकी आप उनसे अपेक्षा करते थे. वे अख़बारी लेख नहीं लिखते थे, वक्तव्य नहीं देते थे लेकिन अगर आप उनका मौन सुनना चाहते थे, वे ख़ुद को आहिस्ते से उघाड़ने लगते थे.
दिसंबर 2019 में उन्होंने मुझे लंबे साक्षात्कार दिए थे जिसके अंशों को मैंने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में उद्धृत किया था. संघ परिवार की सरकार को साढ़े पांच बरस हो चुके थे. उन्होंने आगाह करते हुए कहा था, ‘लोकतंत्र भी तानाशाही की ओर ले जा सकता है. एक बहुमत वाली सरकार तानाशाही में बदल सकती है.’ वे आगे बोले थे, ‘आज नागरिक जितना अकेला महसूस कर रहा है, उतना आज़ादी के बाद उसने कभी नहीं किया…’
वे नौ दशक तक निर्दोष और निष्कलंक जीवन जीते रहे. अपने रचनात्मक संसार को छल और प्रपंच और बाज़ार से परे रखा. यह भी राजनीति थी—एक ईमानदार रचनाकार की राजनीति. आशुतोष भारद्वाज