01 जनवरी शब्द, संवेदना और आशीर्वाद का पुण्य दिवस
– डुमन लाल ध्रुव
भारतीय साहित्य और विशेषकर छत्तीसगढ़ी काव्य-जगत के लिए 01 जनवरी केवल नववर्ष का आरंभ नहीं तीन तीन युगद्रष्टा रचनाकारों के जन्म का स्मरणीय उत्सव है। यह तिथि हमें उन कवियों से जोड़ती है जिन्होंने अपनी रचनाओं से भाषा को लोक, जीवन और दर्शन से समृद्ध किया। दादा नारायण लाल परमार (जन्म – 01 जनवरी 1927 अंजार (कच्छ) गुजरात) भारतीय , ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कवि विनोद कुमार शुक्ल (जन्म- 01 जनवरी 1937 राजनांदगांव, छत्तीसगढ़) तथा संत कवि पवन दीवान जी (जन्म – 01 जनवरी 1945 किरवई, राजिम ) ये तीनों नाम भारतीय कविता के आकाश में तीन ध्रुवताराओं की भांति प्रकाशमान हैं।
लोकभाव और जीवन संगीत के कवि दादा नारायण लाल परमार छत्तीसगढ़ी गीत संस्कृति के ऐसे साधक रहे जिनकी रचनाओं में माटी की महक, लोकजीवन की पीड़ा और उत्सव का संतुलन मिलता है। उनके गीतों में केवल शब्द नहीं पीढ़ियों का अनुभव बोलता है। वे मंचीय गीतों के माध्यम से जनमानस से जुड़े और लोकभाषा को गरिमा प्रदान की। मेरे लिए दादा परमार केवल एक वरिष्ठ कवि नहीं रहे आशीर्वाद देने वाले साहित्यिक अभिभावक रहे हैं। मेरे हर आमंत्रण पर साहित्यिक आयोजन में मुजगहन, ( धमतरी ) आकर मंच को गरिमा प्रदान करना मेरे जीवन की बड़ी उपलब्धि रही है। उनका स्नेह और मार्गदर्शन आज भी मेरे लेखन में नैतिक बल बनकर उपस्थित है।
मौन सरलता और गहनता के अप्रतिम कवि 01 जनवरी 1937 को जन्मे विनोद कुमार शुक्ल हिंदी साहित्य के उन विरल कवियों में हैं जिनकी कविता बिना शोर किए मनुष्य के भीतर उतर जाती है। उनकी भाषा जितनी सहज है अर्थ उतना ही गहरा। उन्हें प्राप्त भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार केवल उनका व्यक्तिगत सम्मान नहीं छत्तीसगढ़ की साहित्यिक चेतना का राष्ट्रीय गौरव है।
विनोद कुमार शुक्ल की कविता हमें यह सिखाती है कि छोटे से दृश्य में भी पूरा संसार समाया हो सकता है। उनकी रचनाओं में करुणा, मानवीय गरिमा और जीवन की नाजुक सच्चाइयां अद्भुत संयम के साथ प्रकट होती हैं। मेरे लिए यह सौभाग्य की बात रही है कि ऐसे महान कवि का स्नेह और आशीर्वाद मुझे प्राप्त हुआ। साहित्यिक आयोजनों में उनकी उपस्थिति शब्दों से अधिक मौन की शिक्षा देती है जो हर लेखक के लिए अमूल्य है।
जीवन-दर्शन को गीत में ढालने वाले साधक 01 जनवरी 1945 को जन्मे पवन दीवान जी छत्तीसगढ़ी साहित्य में संत कवि और गीतकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उनकी पंक्तियां –
“राखत भर ले राख, नइ राख सकत ते झन राख, आखिर सब होही राख, मंय जउन कहत हंव तेला धियान मा राख” यह केवल कविता नहीं जीवन का दार्शनिक सार हैं। उनकी प्रसिद्ध कृतियां ‘मेरा हर स्वर इसका पूजन है’ और ‘अंबर का आशीष’ साहित्यिक बिरादरी में गहरी पहचान रखती है। पवन दीवान जी का रचना-संसार वैराग्य, करुणा और सामाजिक चेतना से ओतप्रोत है। मुझे गर्व है कि उनके साथ साहित्यिक मंच साझा करने का अवसर मिला और उनका आशीर्वाद मेरे रचनात्मक जीवन की अमूल्य पूंजी है। इन तीनों महान कवियों से मुझे जो स्नेह, मार्गदर्शन और आशीर्वाद मिला वही मेरी सबसे बड़ी साहित्यिक उपलब्धि है। मेरे प्रत्येक आमंत्रण पर उनका सहज भाव से मुजगहन आना, युवा रचनाकारों के लिए प्रेरणा बनना और साहित्यिक आयोजनों को ऊंचाई देना यह मेरे लिए पुरस्कारों से भी बढ़कर है। जब वरिष्ठ कवि किसी आयोजन में आते हैं तो वे केवल मंच नहीं सजाते परंपरा को वर्तमान से जोड़ते हैं। यही सौभाग्य मुझे मिला है।
01 जनवरी का यह संयोग हमें सिखाता है कि नववर्ष केवल कैलेंडर नहीं बदलता विचार और चेतना को भी नया करता है। दादा परमार का लोकबोध, विनोद कुमार शुक्ल की मानवीय सादगी और पवन दीवान का संत-दर्शन तीनों मिलकर साहित्य को जीवन का पथप्रदर्शक बनाते हैं। इन तीनों यशस्वी कवियों को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं, नमन और कृतज्ञ स्मरण।
इनका आशीर्वाद, सान्निध्य और विश्वास मेरे लिए जीवनभर की प्रेरणा है।
यही मेरा सौभाग्य, यही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
– डुमन लाल ध्रुव
अध्यक्ष – धमतरी जिला हिन्दी साहित्य समिति
मोबाइल – 9424210208