बस इतनी सी अर्जी
2026
सुना है, तुम अपने साथ
उड़ने वाली गाड़ियाँ और
आदमियों से ज़्यादा समझदार मशीनें लानेवाले हो।
पर सुनो
एक साधारण आदमी की ज़ेब में
आज भी वही पुराने सिक्कों की खनक है।
उसकी अर्जी चाँद पर घर बनाने की नहीं है।
वह बस इतना चाहता है
कि जब वह शाम को थका-हारा घर लौटे
तो उसकी थाली में परोसी गई दाल
महंगाई के डर से पतली न हो गई हो।
वह चाहता है
कि उसके बच्चे जब स्कूल की बस में चढ़ें
तो शाम को सलामत उसी हँसी के साथ वापस आएँ
न कि किसी ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ का हिस्सा बनकर।
2026
तुम्हें कोई चमत्कार नहीं करना है।
न ही आसमान का रंग बदलना है।
बस, जो नल की टोंटी पिछले साल से टपक रही है
उससे पानी के बजाय उम्मीद न बह जाए
इसका ख्याल रखना।
वह चाहता है कि
अस्पताल की पर्ची और दवाई की दुकान के बीच
जो लंबा फासला है
वह थोड़ा कम हो जाए।
और, शहर के शोरगुल में
किसी चिड़िया की आवाज़
इंजन की आवाज़ से दबकर न मर जाए।
हम नहीं माँगते तुमसे कोई सुनहरा भविष्य
बस इतना कर देना
कि आदमी का आदमी पर से भरोसा
बचा रहे।
2026
तुम भले ही रफ़्तार लेकर आना
पर थोड़ी सी ‘ठहरने की जगह’ भी लेते आना
जहाँ बैठकर एक आदमी
दूसरे आदमी से पूछ सके—
“कहो भाई, सब ठीक तो है?”
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@Jayprakash Manas