मुहूर्त्त जिज्ञासा
( भयानक भुगते हुए साल के आखिरी में )
दुःख का कोई मुहूर्त्त नहीं होता
सुख का !
घृणा का कोई मुहूर्त्त नहीं होता
प्रेम का !
दुश्मनी का कोई मुहूर्त्त नहीं होता
दोस्ती का !
काँटों का कोई मुहूर्त्त नहीं होता
फूल का !
भूख का कोई मुहूर्त्त नहीं होता
तृप्ति का !
अन्याय का कोई मुहूर्त्त नहीं होता
न्याय का !
रेगिस्तानी धूप का कोई मुहूर्त्त नहीं होता
छाँव का !
सौन्दर्य का कोई मुहूर्त्त नहीं होता
सौहार्द का!
अज्ञान का कोई मुहूर्त्त नहीं होता
ज्ञान का !
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–शीलकांत पाठक