जहाँ मुख्यमंत्री भी कंस के अधीन रहते हों
[ विश्व का सबसे बड़ा ‘ओपन एयर थिएटर’ ]
पश्चिम ओड़िशा के एक छोटे से क़स्बे बरगढ़ में हर साल जो घटित होता है, वह किसी भी आधुनिक ‘परफॉरमेंस आर्ट’ की परिभाषा को बौना कर देता है।
यथार्थ और फंतासी के बीच की दीवार गिर जाती है।
यहाँ ‘धनुयात्रा’ महज एक नाटक नहीं है; यह एक पूरा भूगोल है जो रंगमंच में तब्दील हो जाता है।
बरगढ़ ‘मथुरा’ बन जाता है, पास की जीरा नदी ‘यमुना’ का रूप ले लेती है और अंबापाली गाँव ‘गोपपुर’ में बदल जाता है।
11 दिनों के लिए यहाँ लोकतंत्र की फाइलें बंद हो जाती हैं और एक ‘क्रूर लेकिन न्यायप्रिय’ राजा कंस का हुक्म चलता है।
जी हाँ – यह सौ फ़ीसदी सत्य है ।
11 दिनों के लिए बरगढ़ का ज़िला प्रशासन भी प्रतीकात्मक रूप से राजा कंस के अधीन हो जाता है। यहाँ तक कि प्रदेश के मुख्यमंत्री या बड़े अधिकारियों को भी ‘महाराज कंस’ के दरबार में हाज़िर होना पड़ता है और दंड (जुर्माना) भरना पड़ता है। यह परंपरा दरअसल ‘जनता की सत्ता’ का उत्सव है।
यहाँ का ‘कंस’ केवल मंच का पात्र नहीं है। वह नगर की गलियों में हाथी पर सवार होकर निकलता है, सरकारी दफ़्तरों का निरीक्षण करता है और मंत्रियों अधिकारियों को उनके कर्तव्यों के प्रति फटकार लगाता है।
यह देखना विस्मयकारी है कि कैसे एक आधुनिक प्रशासनिक ढाँचा, लोक-कथा के एक पात्र के सामने नतमस्तक हो जाता है।
यह सत्ता और लोक-मानस के बीच का वह विलक्षण संवाद है, जिसे केवल भारत की मिट्टी ही पैदा कर सकती है।
धनुयात्रा में भी कंस का ‘आतंक’ दरअसल उस अन्याय का प्रतीक है, जिसके अंत की प्रतीक्षा में पूरी जनता एक सामूहिक स्वप्न देखती है।
जब मथुरा (बरगढ़) की सड़कों पर कंस दहाड़ता है, तो वह केवल एक पौराणिक पात्र नहीं होता, वह हर उस व्यवस्था का चेहरा होता है जो अहंकार में अंधी हो चुकी है। और जब अंत में कृष्ण के हाथों उसका वध होता है, तो वह केवल एक मृत्यु नहीं, बल्कि एक सामान्य मनुष्य की आदिम जीत का उत्सव होता है।
धनुयात्रा लोक-संवेदना की एक ऐसी खिड़की है जो हमें बताती है कि कला जब कमरों से निकलकर गलियों में आती है, तो वह ‘म्यूजियम’ की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन की धड़कन बन जाती है।
यह वह दौर था जब देश सदियों की गुलामी के बाद स्वतंत्र हुआ था। कहते हैं स्थानीय लोगों और श्रमिक वर्ग ने इस ऐतिहासिक मुक्ति का जश्न मनाने के लिए ‘धनुयात्रा’ को एक माध्यम बनाया।
यहाँ राजा कंस को उस क्रूर ‘ब्रिटिश राज’ का प्रतीक माना गया, जिसने जनता का दमन किया था।
श्रीकृष्ण को उस ‘स्वतंत्रता’ और ‘सत्य’ के रूप में देखा गया, जिसने अंततः अन्याय का अंत किया।
यही कारण है कि इस यात्रा में कंस केवल एक पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि एक तानाशाह सत्ता का वह चेहरा है जिसे जनता अंत में गिरते हुए देखना चाहती है।
विश्व का यह सबसे बड़ा ‘ओपन एयर थिएटर’ हमें याद दिलाता है कि कहानियाँ केवल किताबों में नहीं सोतीं, वे बरगढ़ की हवाओं में साँस लेती हैं।
•••जयप्रकाश मानस