April 6, 2025

पतझड़ में सन्नाटे

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निर्मला सिंह

लिख रही हूँ आज फिर मैं
एक नया इतिहास!
भीड़ लगी है बीते पलों की
जीवन के पन्नों के आसपास!
सुख के सपने कुछ भूली मैं
दुख सारे पर याद रह गए
अचरज होता है
पर अब तो —
कैसे वो आबाद रह गए?

कुछ रंग बह गए पानी पर
कुछ हवा ले गई ..
ऋतुएँ मन की बोली सी आईं
जो ग्रीष्म में भी
वसंत की दस्तक दे गईं!
मैंने फिर कूची थामी
रंग दिया..
टेसू के रंगों से आकाश,
रंग रही हूँ आज फिर मैं
एक नया इतिहास!!

गिरते पड़ते भटकते
दिशाहीन विचारों की
शृंखला में बंधे से
क्षितिज भ्रम है
आँखें नम हैं
शब्द भी हैं कुछ रुँधे से
सहमते सिसकते से
क्षुब्ध से एहसास
बाँच रही हूँ आज फिर
एक नया इतिहास !!!

कुछ मतलब जीवन के
फिर और समझ आये,
जब भटके पथिक सा
सघन वन में मन
अनायास ही
वांछित पगडंडी पाये,
कभी-कभी सन्नाटे भी
कितना सुख दे जाते हैं
हुए कुछ अनोखे आभास
भूले बिसरे सपने
फिर से आए पास!
रच रही हूँ आज फिर मैं
एक नया इतिहास !!!
©निर्मला सिंह

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