डॉ. विजय कुमार गुप्ता ’मुन्ना’ द्वारा रचित लेख
सुनना भी जरूरी है
विधि का विधान है, जैसे ही नया मानव जन्म दुनिया में होता है, सर्वप्रथम सारे नाते रिश्तेदार और हॉस्पिटल के डॉक्टर स्टाफ शिशु रुदन सुनने को बेताब रहते हैं।
रोते हुए इस जग में आते तो हैं, ईश्वर ने ऐसी ही व्यवस्था बनाई है, उसी व्यवस्था से संसार चल रहा है।
जीवन की अंतिम घड़ी भी बीत जाने के बाद सभी को रोते हुए छोड़ जाते हैं। जिसे अब मृत व्यक्ति सुन भी नहीं पाता है।
जन्म से लेकर मृत्यु के मध्य हरेक व्यक्ति द्वारा किए हुए कार्य एक सूत्र पर आधारित होते है। या तो व्यक्ति सुनता बहुत है, अथवा सुनाता बहुत है। इस सुनने और सुनाने के बीच व्यक्तित्व पनपता रहता है।
बात बहुत स्पष्ट है, सीधी भी है कि या तो मनुष्य अपने व्यक्तित्व को महिमा मंडित करेगा। लोग प्रतीक्षारत उत्सुक रहेंगे कि अमुक संत, नेता,मित्र, बुजुर्ग, बॉस,अधीनस्थ कोई बात बोलेंगे और हमें सुनने का सुअवसर मिलेगा। कोई बहुत साधारण मनुष्य की श्रेणी में जीवन यापन करेगा। जहां सुनने सुनाने के लिए यदा_कदा अवसर मिल पाते होंगे। कुछ लोग ऐसे भी बन जाएंगे, जिनके बोलने से सन्नाटा, भय, विषाद, विरोध के स्वर सुनने मिले, जिसे पसंद कैसे किया जा सकता है। तात्पर्य है, जिसे सुनना कर्णप्रिय लगे, लोग प्रतीक्षारत भी हों, सुनने से जीवन दिशा दशा में बदलाव के संकेत मिलें, तब सुनने के ऐसे अवसरों को लोग गंवाना नहीं चाहते। जीवन में संदेश उपदेश रीति_नीति, रहन_सहन, लोक_व्यवहार के मामले में हो, संबंध, रिश्ते को निभाने और खुशियों के साथ जीने की शैली में हो, तो सारा परिवार, समाज देश ऐसे वक्ताओं, वरिष्ठों, प्रशिक्षकों, महानुभावों को सुनना पसंद क्यों ना करेगा? अतएव ये विषय आलेख का सकारात्मक पहलू बन जाता है।
जीवन में वार्ता रूपी ऊंची कूद, ऊंची छलांग लगाकर एवं सुनाकर महारथ हासिल नहीं कर सकते। लोग बेवकूफी से एक बार मूर्ख बन जाते हैं, फिर चौकस भी रहते हैं। काठ की हांडी एक ही बार तो जलेगी, दुबारा किसी काम की नहीं रह जाती। उपदेश देने की पहली शर्त यही होती है, कि वैसे कार्य स्वयं न करें, जिसे अन्य को समझाने में लगे रहते हैं। गुरु गुड़ खाता रहे और शिष्यों को गुड़ से परहेज करना सिखाए! सुधार का प्रभाव न केवल शून्य ही रहेगा, वरन मान सम्मान भी कमतर होगा।
आपके दिमाग से निकलने वाले प्रत्येक विचार की दिशाएं अलग होती हैं। आपके घर से निकलने वाले अनेक मार्गों की मंजिल अलग रहती है। एक ही प्रकार का रास्ता एक ही गंतव्य को जाता है। रास्तों में से रास्ते और विकल्पों में विकल्प मिलते रहते हैं। Gps सिस्टम और गूगल हमें हमारा रास्ता चुनने का अवसर प्रदान करता है। उन्हीं उन्हीं मार्गों पे चलकर हम अभ्यस्त भी हो जाते हैं, फिर बगैर गूगल देखे विकल्प का ज्ञान मन मस्तिष्क पे अपनी पैठ बना लेता है।
हमारी आदतें, हमारा स्वभाव, हमारे प्रयास, हमारे विचार भी तो कोई दिशा, मंजिल, लक्ष्य प्राप्ति के अवसर ढूंढते हैं। किसी भी सुन सकने के सामर्थ्य की सबसे मुश्किल की घड़ी तब आती है, जब कोई अपनी बात को ही सर्वोचित ठहराए, उसमें परिवर्तन की गुंजाइश ने देख सके। तब अच्छे से अच्छे व्यक्तित्व के वक्तव्य उसे अर्थहीन लगते है। अतएव माइंड सेट अप बना लेता है, कि सुनने से कोई फायदा नहीं, केवल समय की बर्बादी है। सामनेवाला मूर्खतापूर्ण हरकत कर रहा है,अतएव उसे सुनने की बजाय कुछ सुना भी दिया जाए। यहीं से सुनना और सुनाना दो विपरीत स्वभाव की कश्मकश, किसी व्यक्तित्व को प्रभावित करना प्रारंभ कर देता है।
भगवान ने हाथ दिए तो कर्म होगा ही। पैर मिले तो कदम कदम की दौड़ करेगा ही। आँखें जरूर देखेगी। कान मिले हैं तो जरूर सुनेगा ही। परंतु नहीं इस बिंदु से ही गलती अपना अभ्यास करना शुरू कर देती है। जो अज्ञान, असहमति, अपमान, अहंकार से लोगों के ज्ञान, संस्कार संस्कृति अपनत्व की सहमति, सम्मान प्रतिष्ठा के कवच गर्व को सुनने के बजाय सुनाने का बोझ अपने ही सिर मढ़ता है।
होमवर्क पूरा न होने पर कौन शिक्षक कुछ नहीं कहेगा! घर से निकलते ही कौन माँ बाप नहीं कहेंगे कि रास्ते में ध्यान से चलना! सम्माननीय, वरिष्ठों, बुजुर्गों का चरण स्पर्श करते ही अकस्मात आपको आशीष आशीर्वाद के मार्मिक बोल सुनने मिलेंगे ही!
एक साथ, एक घर, एक ही स्थल पर अनेक लोग कार्य करते हैं। कार्यों के निष्पादन के तरीके भी अलग होते हैं। फिर लोगों के दिल दिमाग भी तो एक जैसे कहां रहते हैं। कहीं चूक होना, गलती होना, नुकसान होना भी सहज संभाव्य है। वैज्ञानिकों तथा महान व्यक्तित्व के धनी लोगों ने सैकड़ों हजारों बार गलतियां करते हुए सुधार कार्य किए। उनके लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में क्या अवरोधों के स्वर, कार्य का बोझ, असफल होने का भय नहीं रहा होगा। आर्कमिडीज, न्यूटन, एडिसन, सर हेनरी फोर्ड, गैलीलियो जैसे लोग सिर्फ एक बार में ही सफल बगैर किसी को सुने अपने पथ पर चले होंगे!
कला कौशल क्षेत्र के सारे मार्ग सुनने की कला से पारंगत होते हैं। “करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।” प्रत्येक अभ्यास आपको सुनना सिखाता है। सुनाना कदापि नहीं सिखाता। विद्वान, चतुर संत ज्ञानी गुरुजन, बुजुर्ग जन, वरिष्ठ अनुभवी जब भी अपना मुंह खोलेंगे तो कुछ अच्छी बात बोलने, बताने, सिखाने के उद्देश्य से ही बात करेंगे। निर्भर करता है, आप उस समय को, उस मनुष्य को, उस संदर्भ को किस अंदाज में लेते हैं। विवेक से ही ज्ञानार्जन हो सकता है। विनयशीलता का भाव ही व्यक्ति को शिखर पर लाता है, जहां उस मनुष्य के बिताया हुआ वक्त ही वक्तव्य की परिभाषा बता देता है।
दुनिया के सारे रिश्तों की नींव यदि टिकी है तो सिर्फ सुनने की क्रिया की बदौलत। रिश्तों के प्रकार कितने हैं, ये जानकारी देना जरूरी नहीं समझता हूं। पर ये जरूर कहूंगा कि विचार मंथन रूपी कोलंबस से संसार के सभी संबंधों नातों को याद करने की कोशिश जरूर कीजियेगा, जो ये बता सके, सुनने के बजाय सुना देने पर कोई रिश्ता सुख शांति खुशियों के साथ चल रहा हो। आपके स्वभाव से मेल नहीं रखनेवाली वार्ता, कृत्य, विचार को आप सुनाने वाला आईना दिखला देते हैं। और संबंधों रिश्तों में किसी न किसी प्रकार रोग पैदा कर देते हैं। जीवन के क्षमता, ममता,समता के तारों की टूटन और चुभन से रिश्तों की स्थायित्व गुणधर्मिता स्वाद को कटुता आवरण में बदलती है। ’सुनाना’ सिर्फ सुना देने से ताल्लुक नहीं रखता। ये अहम, अहंकार, फिजूल जिद, श्रेष्ठता की अवहेलना, रिश्तों की अवमानना जैसे अनेक शब्दों को जीवंत बनाकर व्यक्तित्व में बट्टा लगाता है। हो सकता है आपका कथन सही हो, पर तरीका सही न रखने से शब्दभाव और प्रस्तुति शैली आपा खो बैठती है, और रिश्तों में दरार बढ़ाती है।
हम इस लेख की दिशा इसी पड़ाव तक लाना चाहते थे, कि सुनाने वाला अपना काम कर देता है। कुछ सुन लेने में कुछ हर्ज भी तो नहीं है। थोड़ा सा सुन लेने से किसी का अहंकार मर्दन भी होगा और रिश्तों की मर्यादा भी बनी रहेगी। सुन लेने में मजा आनंद भले न हो पर सुना देने वाले को खामोश तो कर ही सकता है। ताली तो दोनों हाथ से बजती है। सुनाने वाले हाथ को सुन लेने वाले से ताली नहीं मिलेगी तो ताली नहीं बजेगी। मर्यादा ताक पर नहीं चढ़ेगी। रिश्ते तार_ तार नहीं होंगे। खुशिया खंड_ खंड नहीं होंगी। मन में कचोट, कशिश, कटुता का आभास तो होगा परंतु रिश्ते बने रहने की सच्चाई और सार्थकता के समक्ष वो कटुता गौण ही कहलाएगी। एक दिन के नायक बनने से बेहतर है, सुन लेने के नव प्रकाश मार्ग से नित्य_ नित्य के नायक बनें।
आदि शंकराचार्य, भक्ति कालीन रीतिकालीन कवि साहित्यकार, पथ प्रदर्शकों, महापुरुषों को हम पढ़ते आ रहे हैं। सुनते भी आ रहे हैं। सुनने पढ़ने से मार्गदर्शन होता है। तुलसीदास, बाल्मीकि, मीरा, कबीर, प्रेमचंद, को तत्कालीन समय ने सुना और इतिहास में क्रांति लाई, जो युग_ युग को सुनाती आ रही है। सुनाने के योग्य बनकर ही सुनाना यथेष्ठ है। परंतु उमर लिहाज से सुनाना, अहंकार प्रदर्शन हेतु सुनाना, मानमर्दन के लिए सुनाने वाला ज्ञान कदापि उचित नहीं होता। कलयुग में बाजार मूल्य से चलते हैं। कीमत भी ज्यादा चाहिए, सामान भी असली न हो, मिलावट की गंध आए। परंतु सुनाने से माल बिक रहा है, खरीददार मिल रहे हैं, फिर अमुक तो अपना सामान अवश्य बेचेगा। आप नहीं सुनेंगे तो बचे रहेंगे। झूठ बिक जाता है और ईमानदारी धरी रह जाती है। तब इस ग्लोबल युग में मिले हुए वक्त से रुपए पैसे कमा लीजिए, अथवा उसी वक्त में क्षणिक आवेश तंज अहम को सुन लेने की योग्यता से जीवन में मान सम्मान, सेवा संस्कार, सामाजिक प्रतिष्ठा, कुटुंब एकता बल का संदेश शिरोधार्य कर लीजिए।
मनुष्य को अपनी आत्म रक्षा का स्वतंत्र अधिकार है। बचपन में मुझे मेरे पिता ने सिखाया था, कोई बिच्छू अपने रास्ते जा रहा है, तो उसे जाने दो, भगा दो। परंतु आपको काटने के लिए दौड़े तो उस पर अपना जूता पटक कर खत्म कर दो। सुरक्षा मामले में स्वदेश राष्ट्र नीति कहती है कि पहली गोली हम नहीं चलाएंगे। परंतु विरोधी आक्रमण की गोली का जवाब गोला से देंगे। इतनी परिपक्वता तो मनुष्य स्वभाव में है, कि किस सीमा तक उसे सुनना चाहिए। स्वाभिमान और सम्मान के अहित की पराकाष्ठा छोड़कर कोई सुना लेने पर ही आमादा रहे, फिर रिश्तों नाते संबंध का पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है।
फूलों से महक छीनकर पुष्प तो कागज का ही अच्छा होगा। फलों से स्वाद मिटाना तो मिट्टी के बने फलों जैसा ही सिद्ध होगा। मनुष्य से सम्मान और स्वाभिमान छीनकर रिश्ता भी पुतला सरीखा हो जाएगा। स्वाभिमान गिराकर जीवन जीने में सिर्फ सुना देने वाले मामले एक हद के बाद उचित नहीं हो सकते। इसलिए कभी कभी अपने मन की भी जरूर सुनते रहिए। जितनी कीमत तक स्वाभिमान की बोली न लगे खरीददार को खरीदने मत दीजिए। अपना मूल्य बचाकर रखिए। आपके लेखन, चिंतन, मनन शक्ति को लोग आज नहीं तो कल सुनेंगे। भविष्य में आपके जीवित न रहने पर पुस्तकों के माध्यम से सुनेंगे। जैसे हम आज इतिहासकारों को नमन भाव से सुनते पढ़ते हैं।
जीवन पतंग का एक सिरा यदि सुनने का छोर बनता है, तब पतंग का दूसरा सिर सुनाने वाला ही बनेगा। पतंग लूटी जाए, काटी जाए, गिराई जाए, इसे बचाने उड़ाने की पेशकश स्वविवेक से ही करना श्रेयस्कर है। कहते हैं जब तक सांस है, तब तक आस है। जीवन के अच्छे कार्य इसी जीवन में करने चाहिए। जिसमें मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का का ज्ञान ध्यान और म्यान तीनों का उल्लेख त्रेता युग के श्री राम चरित्र का सच्चा सनातनी संदेश है।
जो जितना अच्छा सुनेगा, उतना अच्छा वक्ता बन सकेगा। ये वक्त भी उसी व्यक्ति की कदर करता है, जिसके वक्तव्य में व्यवहार शिक्षा हो। संयम स्वाभिमान संकल्प का ज्वार उठता हो।
मेरे आलेख का अंतिम संदेश यही है, ताल्लुक सुनने से रखिए, न कि सुनाने से मोह रखिए। परंतु निज स्वाभिमान की डोर भी थामे रहिए।
(प्रस्तुति :कवि डॉ विजय कुमार गुप्ता ’मुन्ना’)