आज की हिन्दी कहानियाँ
डाॅ. परदेशीराम वर्मा
हिन्दी कहानी की सवा सौ साल की लंबी यात्रा और उपलब्द्धि हम सबको गर्वित और चकित करती है।
कमलेश्वर जी ने पंडित माधवराव सप्रे लिखित ‘‘एक टोकरी भर मिट्टी‘‘ को हिन्दी की पहली कहानी माना। उन्होंने चार वृहत खंडो में किताबघर के लिए हिन्दी की कालजयी कहानियाॅं शीर्षक से कहानियों को संपादित संकलित किया। जिसके चैथे खंड में मेरी कहानी दिन प्रतिदिन को भी उन्होंने स्थान दिया। उन्होंने संपादकीय में टोकरी भर मिट्टी को पहली कहानी मानते हुए लिखा है ‘‘हिन्दी की पहली कहानी टोकरी भर मिट्टी ही इस सत्य का प्रमाण है कि वह नितांत भारतीय कथा तत्व और मूल चेतना की कहानी है। हिन्दी कहानी अपनी बहुआयामी प्रयोगधर्मिता के बावजूद आज भी अपनी नितांत देसज भूमि और मूल्य चेतना पर केन्द्रित है। कहानी ने अपनी मुस्किल समय और बहुआगामी यथार्थ का परित्याग नहीं किया है, उसके सारे संदर्भ आज भी नितांत भारतीय और देशज हैं।’’ एक टोकरी भी मिट्टी छत्तीसगढ़ के पेड्रा जैसे कस्बे में 1901 में लिखी गई। यह छत्तीसगढ़ में प्रचलित लोक कथा पर आधारित है। प्रत्युत्पन्न बूढ़ी माता यानी डोकरी दाई के चरित्र के साथ कल्पना और कहानी कला की जादूगरी से हिन्दी की यह पहली कहानी इस रूप में आकर चर्चित हुई और इतिहास में पहली कहानी के रूप में समादृत हुई।
हिन्दी कहानी लेखन के शुरूवाती दौर में ही अन्य समृद्ध भाषाओं में लिखित कहानियों से टक्कर लेती हुई लगातार आगे बढ़ी है। हमारे हिन्दी के कथाकार पुरखों के द्वारा बनाई कथा की मीनारों की चमक और ऊंचाई का विस्तार आज भी लगातार जारी है। हम यह पाते हैं कि समय की पेचीदगी के अनुरूप हर युग का रचनाकार एक ही कथा सूत्र को लेखक कितनी अलग-अलग की कहानियाँ लिखकर महत्व पाता है।
प्रेमचंद की कहानी ‘‘रामलीला और संजीव की कहानी रामलीला में एकदम अलग कथानक है। प्रेमचंद भी कहानी में चंदे से राम लीला के आयोजन की सरल कथा है जिसमें कम चंदा मिलने के कारण कलाकारों को होने वाली तकलीफों का वर्णन है।
इस कहानी का कथाकार एक बालक है जो अपने जैसे बालकों को श्रीराम लक्ष्मण और हनुमान बनते देखकर अंतिम विदाई देने पहुंचता है। तीनों कलाकार निराश थे क्योंकि उन्हें विदाई नहीं मिली थी। अंततः दो आने पैसे उनका समवयस्क दर्शक यह बच्चा विदाई में देता है। प्रेमचंद जी लिखते हैं कि यही दो आने पैसे लेकर तीनों मूर्तियाँ विदा हुई। केवल मै ही उन्हें बाहर तक पहुंचाने गया। उन्हें विदा करके लौटा तो मेरी आंखे सजल थी, पर हृदय में आनंद उमड़ा हुआ था।
संजीव अपनी रामलीला में भूमिका अदा करने वाले मुस्लिम जमात के कलाकारों और हिन्दू समाज के बीच आकार ग्रहण कर रही साम्प्रदायिकता के रंगों को विस्तारित करते हैं। दोनों की कहानियाॅ रामलीला पर है मगर आजादी के पहले के भारत की जो भाई-चारे की तस्वीर प्रेमचंद ने खींचा वह तस्वीर संजीव तक आते आते साम्प्रदायिकता के कारण बदरंग और विरूपित होने लगी। आज की कहानी अपने समय के हर रंग को पकड़ने में कामयाबी के झंडे गाड़ती है।
ममता कालिया और श्रद्धाथवाईत दो अलग-अलग पीढ़ियों की लेखिकाएँ हैं, लेकिन दोनों की आज के दौर में लिखित कहानियाँ मोबाइल की पकड़ में रंगहीन हो रहे बचपन और हर वर्ग पर मोबाइल के गहरे प्रभाव की है।
ममता कालिया की कहानी दो गज की दूरी और श्रद्धा थवाईत की कहानी नीली गली, बारिश और आल्हा में कथानक अलग है मगर दोनों में समय की समस्याएॅ एक है। नई पीढ़ी के चर्चित रचनाकार कैलाश वनवासी, राजेन्द्र श्रीवास्तव, रमेश शर्मा गजेन्द्र, रावत, जया जादवानी, प्रज्ञा, वंदनाराग के साथ ही उनसे वरिष्ठ पीढी के रमाकांत श्रीवास्तव, सतीश जायसवाल, शंकर, मधुसूदन आनंद, जयप्रकाश कर्दम, चित्रामुद्गल शिवमूर्ति मैत्रेयी, पुष्पा, हरिभरनागर, शशांक मधुकांकरिया, जयनंदन जैसे कथाकारों ने पीढ़ी दर पीढ़ी कहानी को अपने समय और समाज से जोड़कर निरंतर सार्थक लेखन करते हुए हिन्दी कथासंसार को समृद्ध किया है।
गजानन माधव मुक्तिनाघ, विनोद कुमार शुक्ल शानी, मेहरून्निसा परवेज, विभु कुमार, विश्वेश्वर, परितोष चक्रवर्ती, उर्मिला शुक्ल आनंद हर्षुल, तेजिन्दर और लक्ष्मेन्द्र चोपड़ा छत्तीसगढ़ के ऐसे कथाकार हैं जिनके अवदान की चर्चा समय-समय पर प्रकाशित संग्रहों और विशिष्ट कथा चयनिकाओं में हम पाते हैं। इनके लेखन से छत्तीसगढ़ में कथा लेखन की परंपरा निरंतर मजबूत हुई। छत्तीसगढ़ की संस्कृति और परंपराएँ उनकी कहानियों में आती हैं। इससे छत्तीसगढ़ के बहुरंगे जीवन को हिन्दी पाठन संसार अधिक गइराई से जान पाता है।
कहानी के विस्तृत सागर मंे लगातार आन्दोलन की लहरें भी आती हंै। एक समय के बाद आन्दोलन की गति कमजोर पड़ जाती है और नया आन्दोलन खड़ा हो जाता है। उत्तर आधुनिकता के साथ ही आज आर्टीफीसियल इंटेलीजेंस को भी केन्द्र में ले आने की बातें हम पत्र पत्रिकाओं और कतिपय लेखकों के द्वारा लिखित गं्रथों में पाते हैं। आदिवासी जीवन की कहानियों ने भी इधर कथा साहित्य को आलोकित किया है। रमणिका गुप्ता ने आदिवासियों के लगातार शोषण के खिलाफ जमीनी काम किया है। उन्होंने आदिवासी जीवन पर केन्द्रित आदिवासी साहित्य यात्रा पुस्तक का लेखन भी किया है।
अपनी पत्रिका युद्धरत आम आदमी में उन्होंने आदिवासी लेखकों की कहानियों और आदिवासी जीवन की कथाओं को बहुत महत्व दिया। वे 2014 में छत्तीसगढ़ शासन द्वारा रायपुर में आयोजित साहित्य महोत्सव में अपनी शारीरिक रूग्णता के बावजूद आई थी। उन्होंने महोत्सव में अपना अविस्मर्णीय वक्तव्य दिया था जो आदिवासी साहित्य और जीवन पर केन्द्रित था। आदिवासी जीवन की कहानियों में आज का रंग हम चर्चित लेखिका इन्दिरा दांगी की कहानियों तथा निर्मल फतुल की रचनाओं में पाते हैं।
आज की कहानियों का गांव प्रेमचंद की कहानियों का गांव हो नहीं सकता। राजनीति, विज्ञान और ज्ञान के विस्फोट का असर स्वभाविक रूप से कथा साहित्य में दिखता है।
समयगत पेचीदगी और वर्तमान समय की हर विशेषता को रचनाकार कथा के माध्यम से पाठकों के सामने परोसता है। कहानी के शिल्प में भी लगातार धारा और अंर्तधाराऐं हम देखते हैं। लोग कविता की भाषा में कविता की तरह में कहानियाॅं लिखकर एक अलग ही स्कूल के अलबंदार बने।
कुछ कथाकारों ने केवल ग्रामीण जीवन को चुना तो कुछ गांवों से परहेज कर नगर और महानगरीय जीवन के चित्रकार बने। वृन्दावनलाल वर्मा की ‘शरणागत’ कहानी उच्च जाति के डाकू की वचनबद्धता और अपनी जातीय उच्चता के हास्यापद और थोथे अहसास की दुर्लभ कहानी है। दलित जीवन की कहानियाॅ आज मुख्य धारा की महत्वपूर्ण कहानियाँ कहलाती है।
प्रेमचंद की अमर कहानी कफन के पात्र घीसू और माधव निकम्में और नाकारा थे, लेकिन आज गांव से महानगरों और दलित समाज के लोगों की योग्यता और विशेषज्ञता का डंका बजता है। आज की महत्वपूर्ण दलित कहानियों के पात्रों की हथेलियों का रूपान्तरण मुट्ठियों में होने लगा है। समय के साथ समाज में जो बदलाव आया वह हिन्दी की कहानियों में भी आया। भाषा शिल्प और विषय चयन की दृष्टि से भी आज के कथाकार अधिक परिश्रम के साथ अपनी कहानियों पर काम करते हैं। छत्तीसगढ़ में हमारे बड़े कवि हुए हैं कोदूराम दलित, जिन्होंने कविता के लिए परिभाषा देते हुए कहा है कि
जैसे मुसुवा निकले बिल ले तइसे कविता निकले दिल ले।‘‘
कहानी भी उसी तरह दिल से लिखी जाती रही। हिन्दी के हमारे पुरखे कथाकारों की पीढ़ी में समग्र समाज को केन्द्र में रखकर कथा लेखन का सधाव था। प्रेमचंद की पीढ़ी के कथाकार दलित, नारी, आदिवासी सभी वर्ग पर लिखकर जनप्रिय हुए। आज का युग विशेषज्ञता का है। आज स्वनाकार अपने प्रिय विषय पर सृजन की विशेषज्ञता के कारण चर्चित भी हो जाते हैं। नई पीढ़ी कहानियों को पूरी तैयारी और जानकारी के साथ अपने अंदाज में लिख रही है। आज के कहानीकार के पास समृद्ध विरासत, कथा लेखन का गौरवशाली सवा सौ वर्ष का इतिहास और आज के सूचना तथा तकनीक के युग के संसाधन भी हंै। हर दौर की हिन्दी कहानियों में समय धड़कता है और समाज सासें लेता है जिसे पाठक गहराई से महसूस करता है। इसीलिए यह विधा सर्वाधिक लोकप्रिय, भी है।
डाॅ. परदेशीराम वर्मा
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