March 6, 2026

लोरिक-चंदा की प्रेमगाथा से भी पुराना है रीवा का इतिहास

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छत्तीसगढ़ में लोरिक-चंदा की लोकगाथा लगभग हर किसी ने सुनी है। इस गाथा में गढ़गौरा यानी आज के आरंग की राजकुमारी चंदा और रीवा के वीर लोरिक की प्रेम कहानी का ज़िक्र आता है। माना जाता है कि इसी धरती पर उनके प्रेम की शुरुआत हुई थी। लेकिन रीवा सिर्फ़ एक प्रेम कथा से जुड़ा हुआ स्थान नहीं है, बल्कि यह उस वैभवशाली इतिहास से जुड़ा है जिसकी जड़ें मानव सभ्यता के आरंभिक दौर तक फैली हुई हैं।

आमतौर पर यह कहा जाता है कि बिलासपुर का मल्हार छत्तीसगढ़ का सबसे पुराना नगर है, लेकिन हाल के वर्षों में रीवा गांव से मिले पुरातात्विक प्रमाणों ने इस धारणा को चुनौती दी है। अमेरिका में हुई कार्बन डेटिंग के बाद सामने आया है कि रीवा में करीब तीन हजार साल पुराने पुरातात्विक साक्ष्य मौजूद हैं, जो मल्हार से भी पुराने हैं। इसका अर्थ यह है कि रीवा छत्तीसगढ़ के सबसे प्राचीन नगरों में से नहीं, बल्कि संभवतः सबसे पुराना नगर है।

रीवा गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि उनके बचपन में खेलते-खेलते उन्हें मिट्टी का एक पात्र, जिसे पोरा कहा जाता है, मिला था, जो सोने के सिक्कों से भरा हुआ था। यह कहानी मैंने पंचू बाबा से सुनी और उसका वीडियो भी साझा किया है। गांव में हर बरसात के बाद हरे रंग की आकृतियों के सैकड़ों नमूने जमीन की सतह पर बिखर जाते थे। लोग उन्हें देखते तो थे, लेकिन यह नहीं समझ पाते थे कि ये दरअसल पुराने जमाने के सिक्के हैं।

रीवा गांव से सैकड़ों की संख्या में तांबे के सिक्के मिले हैं, जो अलग-अलग कालखंडों के हैं। चांदी के सिक्के भी यहां से प्राप्त हुए हैं। इसके अलावा सोना, चांदी, तांबा, कांच और टेराकोटा से बनी मणिकाएं भी मिली हैं। दिलचस्प बात यह है कि यहां कच्चा माल भी मिला है और तैयार वस्तुएं भी, जिससे यह साफ होता है कि रीवा सिर्फ उपभोग का नहीं बल्कि उत्पादन और व्यापार का भी केंद्र रहा है।

साल 2019 में पुरातत्व विभाग ने रीवा में विधिवत खुदाई शुरू की। लेकिन जब खुदाई के लिए गांव के लोगों से संपर्क किया गया, तो शुरुआत में कोई भी इस जगह पर काम करने को तैयार नहीं था। गांव में यह मान्यता थी कि जब पहले यहां सोने-चांदी मिलने की खबर फैली थी, तब रात-रात भर तांत्रिक क्रियाएं होती थीं और सुबह गांववालों को बड़े-बड़े गड्ढे दिखाई देते थे। किसी के बीमार पड़ने या किसी की मृत्यु होने पर यह धारणा बन गई कि इस जगह पर गलत नीयत से खुदाई करने वालों की जान चली जाती है। इसी डर के कारण लोग लंबे समय तक इस स्थल से दूर रहे।

खुदाई के को-डायरेक्टर व्रिशोत्तम साहू बताते हैं कि बड़ी मुश्किल से 10-12 लोग काम करने के लिए तैयार हुए। उन्होंने कुछ समय तक काम किया और जब गांववालों ने देखा कि उन्हें कुछ नहीं हो रहा है, तब धीरे-धीरे बाकी लोगों का डर भी खत्म हुआ। इसके बाद लोग खुद जुड़ते गए और काम मांगने आने लगे। यह शायद अपने आप में एक अनोखा उदाहरण है कि रीवा की खुदाई उसी गांव की बहुओं, बेटियों और बेटों ने अपने हाथों से की और अपने ही इतिहास को जमीन के नीचे से बाहर निकाला।

खुदाई वाली जगह पर थोड़े-थोड़े अंतराल पर पत्थर और ईंटों से बनी गोलाकार संरचनाएं दिखाई देती हैं, जो स्तूप जैसी प्रतीत होती हैं। इसके अलावा एक अर्धवृत्ताकार पत्थर की संरचना भी मिली है, जिसे पुरातत्वविद बौद्ध धर्म से जुड़े स्तूप और चैत्यगृह मानते हैं। यह संकेत देता है कि रीवा किसी समय बौद्ध गतिविधियों का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा होगा।

खुदाई में व्यापार से जुड़े कई प्रमाण मिले हैं। अलग-अलग राजाओं की मुहरें यहां से प्राप्त हुई हैं। इनमें से एक मुहर ऐसी भी है, जिसे अफगानिस्तान के व्यापारियों से जुड़ा हुआ बताया गया है। इसका सीधा अर्थ है कि रीवागढ़ से विदेशों तक व्यापारिक संबंध रहे हैं। महज 100 से 200 मीटर की दूरी पर अलग-अलग स्थानों पर की गई खुदाई में हर बार नए ऐतिहासिक प्रमाण सामने आए हैं।

यहां धातु गलाने की एक फैक्ट्री के अवशेष भी मिले हैं, जिन्हें देखना बेहद रोचक है। खुदाई में तीन हजार साल पुराने स्तर भी मिले हैं और करीब ढाई हजार साल पुराने स्तर भी। नेचुरल सॉइल के नीचे दो से तीन फीट की खुदाई में पाषाणकालीन पत्थर के औजार भी प्राप्त हुए हैं। इसका मतलब यह है कि यह स्थान उस दौर का साक्षी है, जहां इंसान ने केवल जीवित रहने की जद्दोजहद ही नहीं की, बल्कि धीरे-धीरे सभ्यता विकसित की और व्यापारिक गतिविधियों को भी जन्म दिया।

खुदाई के दौरान बड़ी संख्या में जानवरों की हड्डियां भी मिली हैं। मैंने स्वयं दीवारों में फंसी हुई हड्डियां देखी हैं। सिर, जबड़े और दांत तक दिखाई देते हैं। जिन हिस्सों में ये हड्डियां मिली हैं, वहां की मिट्टी बेहद भुरभुरी और जली हुई है, मानो यहां कभी भट्ठी रही हो। यह अब भी शोध का विषय है कि यहां कितने जानवर रहे होंगे और उनकी हड्डियां इन संरचनाओं में कैसे फंसीं।

रीवा से हाथीदांत से बनी कंघी भी मिली है, साथ ही हड्डी से बनी चूड़ियां और मणिकाएं भी प्राप्त हुई हैं। ये सभी प्रमाण बताते हैं कि यहां रहने वाले लोग न सिर्फ तकनीकी रूप से दक्ष थे, बल्कि सौंदर्य और जीवन शैली को लेकर भी सजग थे।

मेरा मानना है कि छत्तीसगढ़ के लोगों को इस इतिहास से रूबरू होना चाहिए। रीवा की यात्रा केवल एक गांव देखने की यात्रा नहीं है, बल्कि यह हजारों साल पीछे जाकर मानव सभ्यता के विकास को महसूस करने का अवसर है। आप जरूर जाइए, लेकिन पुरातात्विक प्रमाणों से किसी भी तरह की छेड़छाड़ न करें। यहां अतिक्रमण की शिकायतें भी सामने आती हैं, इसलिए कुछ स्थानों को इतिहास के लिए सुरक्षित घोषित किया जाना बेहद जरूरी है। रीवा सिर्फ अतीत नहीं है, रीवा हमारी जड़ों की पहचान है।

– तृप्ति सोनी

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