March 6, 2026

लोक-संवेदना, संघर्ष और सांस्कृतिक चेतना के कवि – डॉ. जीवन यदु

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– डुमन लाल ध्रुव
कविता जब केवल सौंदर्य का अनुशासन न रहकर समाज की चेतना का दस्तावेज बन जाती है तब वह अपने रचयिता को कालजयी बना देती है।छत्तीसगढ़ी कविता और गीत परंपरा में डॉ. जीवन यदु ऐसे ही कवि हैं जिनकी रचनाएं केवल साहित्यिक पाठ नहीं है लोक-जीवन का जीवंत इतिहास हैं। उन्हें देश और प्रदेश में “जब तक रोटी के प्रश्नों का” और “छत्तीसगढ़ ला कहिथे धान के कटोरा” जैसी चर्चित रचनाओं के कारण व्यापक पहचान मिली किंतु यह पहचान उनके विराट रचना-संसार की केवल एक झलक है। वस्तुतः धान के कटोरा उनकी सैकड़ों गीत-कविताओं में से एक प्रतिनिधि रचना मात्र है। उनकी काव्य-संपदा इतनी व्यापक, विविध और बहुस्तरीय है कि उसे केवल लोकप्रियता के पैमानों से नहीं आंका जा सकता। डॉ. जीवन यदु की कविता छत्तीसगढ़ी समाज के श्रम, संघर्ष, संस्कृति और स्वप्नों की सामूहिक अभिव्यक्ति है।
लोक और जनपक्षधरता की जड़ें
डॉ. जीवन यदु की कविता का मूल स्रोत लोक है। यह लोक न तो आदर्शीकृत है और न ही रोमानी। यह श्रमरत मनुष्य का लोक है किसान, मजदूर, स्त्री, चरवाहा, गायक और कलाकार का लोक। उनकी कविता खेतों की मेड़ से उठती है और खलिहान, हाट-बाजार, इप्टा के मंच तथा आकाशवाणी के प्रसारण कक्षों तक पहुंचती है।
इप्टा के मंचों पर उनके गीत गाए जाना इस बात का प्रमाण है कि उनकी कविता जनसंघर्ष और जनसंस्कृति की परंपरा से गहराई से जुड़ी है। वहीं आकाशवाणी से उनके गीतों का प्रसारण इस लोक-कविता को व्यापक सामाजिक स्वीकृति प्रदान करता है। यह द्वैत लोक और संस्थान डॉ. जीवन यदु की काव्य-यात्रा को विशिष्ट बनाता है।
जीवन यदु के गीतों में सुरों की बहुलता है। उनके यहां
ओज है जो शोषण और अन्याय के विरुद्ध खड़ा होता है,
माधुर्य है जो जीवन की कठोरता के बीच भी करुणा और सौंदर्य बचाए रखता है और कबीर जैसा फक्कड़ स्वर है जो किसी सत्ता, पाखंड या प्रतिष्ठान से भयभीत नहीं होता।
छत्तीसगढ़ी लोकध्वनियां और देशज शब्दावली उनकी कविता में सजावट नहीं संरचना का आधार है। यह कहा जाता है कि छत्तीसगढ़ में जहां-जहां जिस-जिस कोटि का स्वर जीवन यदु ने सुना उसे उन्होंने उपयुक्त शब्द-योजना और लय देकर गीत का रूप दिया। उन्होंने न केवल नए शब्द रचे वहीं नए तालों, मिश्र सुरों और लयों का सृजन भी किया।
“छत्तीसगढ़ ला कहिथे धान के कटोरा” केवल एक गीत नहीं है। यह छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। यह गीत न जाने कितने कंठों से फूटा है और आज भी फूट रहा है। कई पीढ़ियों के गायक-गायिकाओं ने इन गीतों के सहारे अपनी पहचान बनाई, लोक में सम्मान पाया और समाज को तृप्त किया।
छत्तीसगढ़िया जुग बदलिस फेर छोड़िन नहीं कछोरा।
भइया धान के कटोरा।
यह पंक्ति परिवर्तन और निरंतरता दोनों का प्रतीक है। आधुनिकता के बीच भी अपनी जड़ों से जुड़े रहने का आग्रह इसमें स्पष्ट दिखाई देता है।
संघर्ष, विश्वास और उजास
डॉ. जीवन यदु की कविता में संघर्ष की अभिव्यक्ति के साथ-साथ गहरा विश्वास भी है। उनकी कविता निराशा में नहीं डूबती वह संघर्ष को उजास में बदलने का प्रयत्न करती है। वे मानते हैं कि आज विज्ञान और तकनीक की तीव्र चुनौती को यदि कोई विधा स्वीकार कर सकती है तो वह कविता है क्योंकि कविता ही मनुष्य को संवेदनशील बनाए रखती है।
उनकी पंक्तियां छत्तीसगढ़ के जनजीवन को एक नई रोशनी देती है ।

नवा बिहाती कस दिखथे रे इंहा के डोली धनहा ।
गाय असन सिधवख होथंय रे जम्मो हमर किसनहा ।।
माता देवाला के धज्जा अस उज्जर होथय मन हा।
भेलई के लोहा-कस दिखथय रे छत्तीसगढ़िया तन हा।।
यहां किसान केवल उत्पादनकर्ता नहीं संस्कृति का वाहक है।
जीवन यदु की कविता स्थिर नहीं है। वह समय के साथ आगे बढ़ती है और मनुष्य को नए समाज की ओर ले जाती है। “बादर करय साहूकारी” जैसी कविताएं सामाजिक अन्याय और शोषण की तीखी प्रतीकात्मक व्याख्या प्रस्तुत करती है –
बादर करय साहूकारी ऊपर ले गुर्राय।
वोकर डर म सुरुज चंदा मुंहु ला लुकाय।।
यहां बादल शोषक व्यवस्था का प्रतीक है जो उजास को ढक लेता है। उनके बिंब इतने सशक्त हैं कि अमूर्त भाव मूर्त हो उठते हैं। काव्यशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो डॉ. जीवन यदु की कविता में बिंब-विधान अत्यंत सशक्त है। बिंब उनके यहां केवल दृश्य नहीं अनुभूति के वाहक हैं। भाषा इस प्रक्रिया की अनिवार्य शर्त है। एक बिंब सृष्टा की अनुभूति को रूपाकार देता है और उसमें व्याप्त संवेदना व विचार का सामान्यीकरण करता है।
“रहिबे हुसियार भइया” कविता में यह स्पष्ट दिखाई देता है – रखवारी राखे बने रहिये गया रखवार भइया।
देखत हस दिन बादर ला, रहिबे हुसियार भइया।।
यह चेतावनी भी है लोक-बुद्धि भी और समय का संकेत भी।
मेरे लिए डॉ. जीवन यदु केवल एक कवि या साहित्यिक व्यक्तित्व नहीं हैं। खैरागढ़ से जुड़े मेरे आत्मीय संबंधों के कारण उनकी रचनाएं मेरे लिए स्मृतियों का हिस्सा भी है। खैरागढ़ जहां संगीत, साहित्य और लोक-संस्कृति की समृद्ध परंपरा है वहां जीवन यदु की कविता एक परिचित स्वर की तरह लगती है। उनकी रचनाएं वहां केवल सुनी नहीं जाती अपनायी जाती हैं।
खैरागढ़ की सांस्कृतिक चेतना और जीवन यदु की लोकधर्मी कविता के बीच एक स्वाभाविक संवाद है। शायद इसी कारण उनकी कविताएं मुझे आलोचक से अधिक सहभागी बनाती है।
डॉ. जीवन यदु की काव्य-यात्रा का आरंभ 1973 में आकाशवाणी से प्रसारण के साथ होता है और आज भी उनकी रचनाएं उतनी ही प्रासंगिक हैं। उनकी कविता छत्तीसगढ़ी साहित्य की धरोहर है और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा-पुंज। वे उन कवियों में हैं जिन्होंने कविता को जीवन से अलग नहीं किया जीवन को कविता बना दिया।
आज डॉ. जीवन यदु का जन्मदिन है। यह दिन केवल एक कवि के जन्म का नहीं छत्तीसगढ़ की लोक-संवेदना,
संघर्ष और सांस्कृतिक चेतना के उत्सव का दिन है। आपकी लेखनी ने लोक को स्वर दिया
संघर्ष को शब्द और भविष्य को उजास। खैरागढ़ की आत्मीय स्मृतियों के साथ आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं। आप दीर्घायु हों, स्वस्थ रहें और आपकी कविता यूं ही छत्तीसगढ़ की आत्मा बनकर गूंजती रहे।
– डुमन लाल ध्रुव
मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)
पिन – 493773
मोबाइल – 9424210208

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