दो लोकगीत
हर स्त्री के पास होते हैं कम से कम दो लोकगीत
एक चौखट के पास बैठकर गुनगुनाया जाता है
दिन कुछ छोटे हो जाते हैं
उस गीत में।
दूसरा गीत प्रार्थना के बाद बचा हुआ क्षण है
बेटे बेटियों को गाया जाता है
खुशी की साँसों में।
ये गीत उसकी सबसे बड़ी संपदा हैं
हथियार भी हैं
जिन्हें वह दिन में रखती है मुँह में
रात में तकिये के नीचे।
जब कोई गीत खो जाता है
वह एक लोक कम हो जाता है
जब कोई स्त्री गीत भूल जाती है
वह अपना एक हथियार खो देती है
और उसकी चौखट थोड़ी उदास हो जाती है।
ये गीत पानी की तरह हैं
जो खेत में नहीं – स्त्री के भीतर उगते हैं
और बिना बारिश के हरा रहता है
उसका खेत।
••• जयप्रकाश मानस