March 5, 2026

कलकत्ता कॉस्मोपोलिटन : एक त्वरित प्रतिक्रिया

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मधु कांकरिया

अलका सरावगी अपने हर उपन्यास में मानवीय त्रासदी के किसी नए पहलू को उजागर कर हमें चकित कर देती हैं। कभी उनके कलम की आँख विकास की तेज आंधी में ध्वस्त होती मानवीय संवेदनाओं को पकड़ती हैं तो कभी पतृसत्ता की चक्की में पिसती स्त्री की पीड़ा तो कभी जाति ,धर्म ,भाषा ,लिंग और संस्कृति के आधार पर इंसान इंसान में होने वाला भेदभाव ,तो कभी अपने समय से पराजित दो हिस्सों में बंटा व्यक्ति अपनी पहचान की लड़ाई लड़ता दिखाई देता है ।
कलकत्ता कॉस्मोपोलिटन : दिल और दरारें में जो दरारे हैं उनसे समय और स्मृतियाँ झरती हैं।लेखिका के शब्दों में ,
“आदमी अपनी स्मृतियों का ग़ुलाम होता है। ख़ासकर जब वह स्मृति जब किसी सदमे का रूप लेकर आत्मा पर कभी न मिटने वाले गोदने (टैटू) की तरह छप जाए।”
जिंदगी के एन बीचोबीच खड़े होकर लिखा गया है यह उपन्यास जो कोलकाता की तंग ,अनजान , संकरी अँधेरी गलियों ,संकरे घरों, बहुमंजिला बासी हवा भरे कमरों, अस्पतालों, गुमटियों, भीड़ भरी सड़कों से होकर तलछट के जीवन की एक नयी और जटिल सच्चाइयों से भरी विश्वसनीय सूरत को सामने लाता है जहाँ लेखिका कहीं कहीं दीबा और सुनील की प्रेम कहानी रचती है तो कहीं उनकी तकलीफों और अंतर्दवंदो की कहानी कहती हैं तो कहीं मनुष्य के अस्तित्व के अर्थ को खोजती अपने समय के पतन की कहानी भी इसमें अनायास ही आ जाती है।
माँ की आत्महत्या ,बीस सालों के अंतराल के बाद माँ के मिलन से शुरू हुआ उपन्यास धीरे धीरे पंखुड़ियों सा जीवन की ओर खुलता चला जाता है। यह उपन्यास महानगर की चकाचौंध के पीछे निम्न मध्यवर्गीय जीवन
के अंधेरों,रोजमर्रा की चिकचिक ,घिसघिस ,स्वप्न ,संघर्ष ,विरूपताओं और माधुर्य की भी कहानी है जो कोलकाता के निम्न मध्वर्गीय इलाके मटियाबुर्ज से निकलकर मयूरभंज तक जाती है।
कहानी के केंद्र में सुनील बोस है जो मुस्लिम दीबा के प्रेम में इस्लाम कबुल कर मोहमद दानियाल बन जाते हैं।
फिर तो सुनील ऐसा मुस्लिम बनता है जो कुरान का गहन अध्ययन करता है उसे समझता है और पाँचों वक़्त नमाज पढ़ता है। शुरू में लगा था जैसे उपन्यास वामपंथ की जमीन और दर्शन पर खड़ा किया जाएगा क्योंकि सुनील के पिता वामपंथी हैं ऐसे वामपंथी जो अपनी पत्नी को पूजा करते देख तक परेशान हो जाते हैं पर बाबरी मस्जिद के टूटने के बाद बिना किसी तर्क या लोजिक के यू टर्न ले लेते हैं। ऐसे पिता अब पुत्र का इस्लाम कबूलना स्वीकार नहीं कर पाते हैं।
अबूझ मानव मन !
इसके साथ ही यह कहानी प्रेम ,धर्म और स्मृति के नाजुक धागों में भी उलझती सुलझती है। धर्मांतरण के घात प्रतिघात ,उहापोह के साथ इस्लाम और कुरान की बारीकियों में प्रवेश करती है और ढेरों ऐसी भ्रांतियों को खोलती है जो हमारे दिमागों में बसी हुई है। दो हिस्सों में बंटा सुनील का खंडित मन भी कई बार अपनी पहचान की लड़ाई में शामिल हो जाता है। कोलकाता यहाँ सिर्फ एक शहर ही नहीं बल्कि पात्र की तरह सांस लेता दिखाई पड़ता है।
दीबा के रूप में यह एक स्त्री की अपराजेय जीजिविषा ,स्वप्न ,संघर्ष और गरिमा की कहानी भी बन जाती है।
कहानी सिर्फ बहरी घटनाओं पर ही केंद्रित नहीं है वह सुनील और दीबा के अंत:मन को टटोलती मानवीय मन की जटिलताओं और दुर्बलताओं की भी पड़ताल करती है।
उपन्यास की सुंदरता यह है कि उपन्यास हिन्दू मुस्लिम लड़ाई से परे प्रेम ,मनुष्य और उसकी अपराजेय जिजीविषा को रचता है।
वात्सल्य की अव्यक्त अनुभूति भी पाठक को आनंद देती है।बोस के प्रति उनकी माँ का, दीबा के प्रति उनकी माँ का और रेहान के प्रति दीबा का प्रेम ..तीनों ही माएँ अनूठी हैं।
अलका सरावगी के लेखन की तासीर यह है कि हाशिये पर पड़े छोटे लोगों के जीवन में झांकते झांकते ही वे टकरा जाती हैं समय और समाज के बड़े बड़े सवालों से।इसीलिए उनके उपन्यास में समकालीन समय की आहट है। समय से संवाद है। समय के ज्वलंत सवाल हैं।
उपन्यास की पठनीयता गजब की है।
अपनी भाषा के प्रति वे खूब खूब सजग हैं। उनकी भाषा कहानी सुनाती नहीं है ,कहानी दिखाती है.
कुछ गहरी और सुन्दर पंक्तियाँ

“ज़िन्दगी के घाटे की लिस्ट लम्बी होती जाती है। दीबा ने लंबी साँस छोड़ते हुए सोचा। अब जाकर दाल-भात -सब्ज़ी बनाएगी और चार बजे तक खा-पीकर बिस्तर में घुसेगी तो रात साढ़े दस बजे खाना बनाने उठेगी। वही उसके सुकून का समय है चाहें नींद आए या ना आए। ज़िन्दगी से यह हक़ दीबा ने हासिल कर लिया है। आज वाह इन साढ़े छह घंटों में जीवन के घाटों की जगह फ़ायदों की लिस्ट बनाएगी।”

“सारे बंगाली सिर्फ़ क्लर्क बनने का ही सपना देख पाते हैं। तो वही सपना पूरा होगा न? कलमघिस्सू बनकर कलम घिसते रहने के लिए ही जैसे वो पैदा हुए हों। ज़्यादा से ज़्यादा दुर्गा-पूजा में नए कपड़े पहन लो, पंडालों में घूमकर दुर्गा देखो, चाऊमीन कहा लो। साल भर कटौती कर पैसे बचा कर बीवी को सोने
का कर्णफूल दिला दो। दीघा-पूरी का समंदर दिखा दो या दार्जिलिंग के पहाड़।”
उम्मीद है खूब पढ़ी जाएगी और हिंदी जगत में स्वागत होगा इस कृति का।

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