प्यारी कथाओं/ लोक कथाओं को गूंथकर रची गई ’देवनगरी’
अनेकों साहित्यिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले किशन श्रीमान जी द्वारा ढेरों छोटी छोटी प्यारी कथाओं/ लोक कथाओं को गूंथकर रची गई ’देवनगरी’ आंचलिकता पढ़ने वालों के लिए एक उत्तम विकल्प हो है। पुस्तक का ठेठ गंवई बोली के शब्दों द्वारा सुसज्जित होना संभवतः लेखक का कुल्लवी ग्रामीण पृष्ठभूमि से होना ही है। जिस लेखन में भाव सच्चे व अत्यधिक प्रबल हों वहां शिल्प मायने नहीं रखता। या कहिए भाव पक्ष सच्चा हो तो पाठक वर्ग को ऐसे सम्मोहित करता है कि जल्द से जल्द आख़िरी पृष्ठ पर पहुंचना चाहता है। देव नगरी के पन्ने पलटते पलटते जाने कितनी ही कथाएं पढ़ने को मिली। नहीं जानती सभी लोक कथाएं हैं या कहीं कहीं लेखक की कल्पनाशीलता है, मगर बेहद खूबसूरती से एक के बाद एक कथा इस बड़ी कहानी को आगे बढ़ाने में जो कहानियां उपयुक्त की गई है, वह बेहद सफ़ल व सराहनीय प्रयास है। सफ़ल प्रयोग कहा जाएगा यह लेखक का। प्रकृति प्रेमी हर पहाड़ी की ही तरह लेखक ने पहाड़, नदी नाले, ढांक, डांगरे बाच्छु, छल्ली, कोदरा, जौ, काठू, जाटू चावल, चीणी, अनाज की सूर, लुगड़ी आदि शब्दों को इतनी खूबसूरती से सजाया है कि अनायास ही अपना बाल्यकाल सजीव वो उठता है।
हिमालय की किसी घाटी में बसे एक गांव में बारह लोगों के परिवार की यह कहानी जब शुरू करते हैं पढ़ना तो लगता है मानो सत्तर अस्सी के दशक के किसी गांव में विचर रही हूं। हालांकि इतने बड़े परिवार का साथ रहना आज की पीढ़ी को आश्चर्य से भर सकता है। और उसपर मेहमानों का कभी भी चले आना उन्हें और भी रोमांच से भर सकता है।
परिवार के मुखिया शुक्र ने अपनी मेहनत के बलबूते कई जगहों पर जमीनें बना ली थी। जबकि उसका इकलौता बेटा बुद्धू जीवन भर आरामपरस्ती में जीता रहा। अय्याश प्रवृति के बुद्धू ने पांच पत्नियां रखी थीं। जिनमें से कुछ जगह जमीनों वाली भी थी। बुद्धू के दो बेटे, दो बेटियां थीं। सबसे बड़ा बेटा सूआरू अपने दादा शुक्र की सोहबत में रहकर उनसे अच्छी शिक्षा लेता। गांव के सरकारी स्कूल से पांचवीं कक्षा की पढ़ाई पूरी करने पश्चात शरीर से हट्टे कट्टे होने कारण उसे जंगलात महकमे में चौकीदार व फ़ौज में भर्ती होने का प्रस्ताव आया परंतु उसकी दादी नहीं चाहती थी कि उनका पोतरू फौज में जाए। ’नैईं नैईं, फ़ौजी ता मूँ आपणा पौत्तू कतई नीं बनाना, तौखे मूँयां ता कौखे न तोपणा तैवे आपणा पोतरू मूँ। ’
पुस्तक में एकाएक स्थानीय शब्दों का आ जाना पाठक की रौ को तोड़ता नहीं बल्कि लोक को और भी अधिक करीब से समझने का अवसर देता है।
नौकरी न कर पाने का एक कारण उसका स्वयं का पिता बुद्धू भी था। उसने एक दिन फरमान सुनाया कि सूआरू को लोगों की भेड़ बकरियां लेकर दूर पहाड़ी पर स्थित ’देव नगरी’ जाना होगा। बचपन से ही सिद्धांतवादी और कर्तव्यनिष्ठ सूआरू पिता की आज्ञा पालन करने हेतु अपनी पत्नी तुआरी को लेकर एक दिन देव नगरी के लिए प्रस्थान कर गया।
ख़ैर दिन तो वे दोनों भेड़ बकरियां चराने में निकाल देते। रात्रि में जंगली जानवरों के डर के मारे जब सो नहीं पाते तो वक्त गुजारने के लिए सूआरू अपने दादा शुक्रू से बचपन में सुनी हुई छोटी छोटी कथाएं तुआरी को सुनाता। इसी श्रृंखला में सबसे पहले आती है पिद्दू चिड़ू की कथा। उसके बाद आग मांगने का किस्सा आता है। इसी आग मांगने के किस्से में टुंडी रागस भी आया।
गर्मियों के नौ महीने इसी देव नगरी में काटने के बाद घर लौटकर आना तुआरी को मन ही मन रोमांचित किए जाता है। वनवासी जीवन से भले ही कुछ महीनों के लिए राहत मिलने वाली थी मग़र मन ही मन वह घर के घीऊ सिडू खाने के सपने बुन रही थी। मग़र ये क्या… घर पहुंचते ही ससुर द्वारा नमक के लिए गुम्मा जाने का आदेश हो गया। मरता क्या न करता! एक दिन का विश्राम और चल दिया सूआरू गांव के लोगों के साथ गुम्मा की यात्रा पर। यात्रा से लौटते हुए फिर सहयात्रियों द्वारा एक और कहानी का वाचन। इसी तरह कितनी ही मनमोहक कहानियां सुनते सुनाते कहानी में थोड़ा ठहराव आता है।
अबकी बार पौष महीना खत्म होते होते फ़िर से सूआरू तुआरी युगल भेड़ बकरियां और ढोर डंगर लेकर देव नगरी की ओर जाते हैं तो मार्ग में लिखनू जोत बारे बातचीत से हमें यह जानकारी मिलती है कि हिमालय में किसी समय एक विस्तृत सभ्यता में थी। बाहरी लोगों के आक्रमण करने कारण वे अपना धन और अनाज किन्ही कंदराओं में छिपाकर दूसरी जगह बस गए। उन जगहों की शिनाख्त के तौर पर उन ऊंची पहाड़ी जगहों की चट्टानों पर कुछ लिखा गया है। इन्हीं अभिलेखों कारण इसे लिखणु जोत कहा गया है। कालांतर में तूआरू सुआरी की मेहनतकश जोड़ी ने उसी देव नगरी में अपनी पक्की रिहाइश बनाई। स्थानों पर जब छः छः महीनों के लिए जिंदगियां घरों के भीतर क़ैद हो जाती हैं तो सुखाकर रखे गए मीट खाने की प्रथा बारे भी बड़े ही सुंदर ढंग से पारस्परिक संवाद द्वारा पाठकों को जानने को मिला।
देव नगरी से चंद्रखणी की ओर जाने पर रूमटू सौह और देवधाणा नामक पवित्र स्थानों का उल्लेख लेखक के घाटी की भौगोलिक परिस्थिति के ज्ञान बारे बताता है। रूमटू सौह संसद का अपर हाउस यानि राज्यसभा और देऊधाणा को लोकसभा समान समझा जाता है। जबकि जनपद की राजधानी रही नगर स्थित ’जगती पौट’ को सुप्रीम कोर्ट का दर्ज़ा प्राप्त है। घाटी में किसी भी प्रकार की विपदा, अथवा लोक से संबंधित कोई अनसुलझा मामला यहीं सुलझाया जाता है। इसी प्रकार चंद्रखणी, गिरूआ कोठी से ठीक आगे इन्द्रकील पर्वत एवं देव टिब्बा भी देवताओं के ही स्थान माने जाते हैं। पांडू रोपा,देव रोपा आदि स्थानों में पांडवों द्वारा धन की रोपाई की जाती थी, ऐसी मान्यता है।
एक बड़ी कहानी में कैसे छोटी छोटी अनगिनत कहानियों को लेखक के कुशल हाथों द्वारा गूंथा गया है इसका आनंद लेने के लिए आपको किशन जी द्वारा रचित यह खूबसूरत आंचलिक उपहार अवश्य पढ़ना चाहिए।
पत्रकारिता एवं जन संचार में स्नातकोत्तर किशन जी मासिक पत्रिका ’हिमतरु’ के संपादन कार्य में लंबे समय तक जुड़े रहे हैं। संपादन कार्य के लिए गुरुकुल राज्य सम्मान प्राप्त किशन जी वर्तमान में मुद्रण एवं लेखन सामग्री विभाग की वाचन शाखा में कार्यरत हैं। इस खूबसूरत कृति के लिए लेखक को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
पुस्तक का आवरण बेहद मनमोहक बन पड़ा है। हंस प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक का मूल्य 559 रुपए है।