इस वेलेंटाइन डे पर
मैं चुपचाप खडा रहा
दरवाज़े पर सिर टिकाए
रोशनी, धूल और धुएं की तरह;
मैं भी आना चाहता था
घर के भीतर
एक हल्की-सी दस्तक के बाद।
मैं जानता था
दूसरी ओर खड़ी होकर
तुम सुन रही हो मेरी साँसों को,
चाहती हो – मैं एकबार
फिर से खटखटाऊँ दरवाज़ा।
पर मैं चुपचाप खड़ा रहा
मौसम, चिड़िया और तितली की तरह;
जो घर में आना ज़रूर चाहते हैं
पर दरवाज़ा खटखटा कर नहीं।
मौन रिस रहा था दरवाज़े की दरारों से
और मुरझाते जा रहे थे गुलाब के फूल;
जो मैं तुम्हारे लिए लेकर आया था।
ज़रूर तुम भी थक गई होगी
अपने हठ और प्रेम के उद्वेग में
दरवाज़े से सट कर खड़े हुए।
सुनेत्रा,
कोई बात नहीं
फिर भी हम दोनों साथ-साथ थे
इस वेलेंटाइन डे पर।
हम साथ साथ रहेंगे
हर वेलेंटाइन डे पर……
—— राजेश्वर वशिष्ठ
चित्र: गूगल सर्च से साभार।