March 5, 2026

एक माड़िन का प्रेम

0
WhatsApp Image 2026-02-15 at 7.49.04 PM

वह सेमल के फूलों से करती है अपने प्रेमी का शृंगार
धीरे-धीरे पिलाती है उसे ज्वार का पेज
ताड़ कांदा खिलाते हुए
चुपके से उसकी बाँह पर बाँधती है मन्नत का ताबीज

चेरकन्टी नदी के बीचों-बीच
रेतीले टीले पर बैठ
दोनों ताकते हैं अपना गाँव

वह उसे दूर से दिखाती है इमली का वह पेड़
दूर, बहुत दूर से धुंधला दिखाई देता
उसके घर का दरवाजा
धुंधली होती जा रही है उसकी माँ की आँखों की कहानी
गाँव का पानी बहुत खारा हो चुका है
कहते हुए वह चूम लेती है प्रेमी का माथा

उसके हाथों में छाले उभर आए हैं
कंधे पर कावड़ का नहीं
विस्थापन का, रोजी-रोटी का
प्रेम के विछोह के घाव हैं

वह मौसम के बदलने की बात करते हुए
छालों का इलाज बताती है
कंधे के घाव पर गाँव की गीली मिट्टी का लेप लगाती है

वह अपने झोले में हाथ डालता है
पलाश के फूलों से चिपकी सूखी टहनी निकालता है
फीकी-सी हँसी के साथ
उसके हाथों में पकड़ाते हुए कहता है
“जब तुम्हारे लिए तोड़ा था, तब ताजा था”

वह उसे जानती है
जैसे जंगल जानता है
बारिश की पहली बूँद को
वह जानती है
उसका प्रेमी शिकारी नहीं

वह उसे बेर से भरी हुई एक थैली पकड़ाते हुए
उसके कान में फुसफुसाती है
बहुत मीठे बेर हैं
जहाँ तक जाओगे
वहाँ तक बिखेर देना इसके बीज
आज नहीं तो कल
नदी के दोनों किनारे
बेर की मीठी खुशबू से महक उठेंगे

वह देखता है गाँव के उस पेड़ को
जहाँ सांझ का सूरज
डूबने से पहले ठिठककर उन्हें देख रहा है

वह मुस्कुराता है
उसका हाथ अपने हाथ में लेता है
जाना ही नहीं, लौटना भी एक क्रिया है
और यह सिर्फ और सिर्फ प्रेम में ही संभव है।

पूनम वासम

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *