ग़ज़ल
भरोसा था जिसपे दग़ा दे रहा है
ये रहज़न नहीं रहनुमा दे रहा है
जिसे देखो वो मशवरा दे रहा है
कोई ज़ह्र कोई दवा दे रहा है
वो इंसान है कि फ़रिश्ता है कोई
जो दुश्मन को अपने दुआ दे रहा है
उसे दोस्त समझूं के दुश्मन कहूं मैं
ग़रीबी को मेरा पता दे रहा है
मरीज़े मोहब्बत को राहत मिलेगी
वो दामन की अपने हवा दे रहा है
वो दुश्मन है उसको न हमदर्द जानो
जो इस दुश्मनी को हवा दे रहा है
हमें ग़ैर से क्या ग़रज़, क्या है मतलब
वो क्या ले रहा है ,वो क्या दे रहा है
ज़माने की खुशियां तुम्हें हो मुबारक
मुझे मेरा ग़म हौसला दे रहा है
तरस आ रहा है जेहालत पे उसकी
वो अंधों को क्यों आईना दे रहा है
तिजारत की बातें सियासत की बातें
ज़माना नया फ़लसफ़ा दे रहा है
खड़ा है जो दरिया को चुल्लू में लेकर
वही प्यासा दर्से वफ़ा दे रहा है
सुख़नवर हूं शहरे ख़मोशां में बैठा
“मुझे जैसे कोई सदा दे रहा है”
सुख़नवर हुसैन रायपुरी