पुस्तकों के संसार में डॉ. परदेशी राम वर्मा
आलेख स्वराज करुण
समय -समय पर अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. परदेशीराम वर्मा के विगत 50 वर्षों से निरंतर जारी लेखन का परिचय उनकी अनेक कृतियों में मिलता है. उन प्रकाशनों में भी,जिनकी सौजन्य प्रतियाँ उन्हें विगत 31जनवरी 2026 को भिलाई नगर स्थित अपनी साधना स्थली ‘अगासदिया परिसर में भेंट की थी.वे छत्तीसगढ़ के धरती पुत्र हैं. छत्तीसगढ़ी और हिन्दी, दोनों ही भाषाओं में ख़ूब लिखते हैं. उनकी लिखी और छपी पुस्तकों का अपना एक समृद्ध संसार है. अगासदिया परिसर के भवन में उनका एक छोटा सभा कक्ष और समृद्ध पुस्तकालय भी है.
वहाँ उनके हाथों प्राप्त प्रकाशनों में (1)सबके अपने जगन्नाथ (2)छत्तीसगढ़ में कबीर (3)मासिक पत्रिका ‘नवआगमन’ और (4) उनकी आत्मकथा ‘सुरंग के उस पार ‘ पर केंद्रित एक आकर्षक ब्रोशर शामिल है.इस अवसर पर मेरे साथ आए अम्बिकापुर (सरगुजा) के वरिष्ठ लेखक श्रीश मिश्रा ने उन्हें अपनी पुस्तक ‘संदर्भ रामगढ़ ‘की सौजन्य प्रति भेंट की. डॉ. वर्मा ने भी उन्हें अपने कुछ प्रकाशनों की प्रतियाँ भेंट की.
डॉ. परदेशीराम वर्मा अपनी तिमाही साहित्यिक पत्रिका ‘अगासदिया ‘ के सम्पादक और प्रकाशक भी हैं. जून 2025 तक ‘अगासदिया’ के 104 अंक प्रकाशित हो चुके हैं. डॉ. वर्मा महाप्रभु जगन्नाथ जी के भी अनन्य भक्त हैं. अपने परिवारजनों सहित कई बार श्री जगन्नाथ पुरी की तीर्थ यात्रा कर चुके हैं. अभी कल 15 फरवरी को फिर वहाँ गए हैं. उनकी तीर्थ यात्रा के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ.
सबके अपने श्री जगन्नाथ
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अगासदिया परिसर में सौजन्य मुलाकात के दौरान उनके द्वारा भेंट किए गए अपने प्रकाशनों में ‘सबके अपने श्री जगन्नाथ ‘शीर्षक एक पुस्तिका भी है. वे इसके सम्पादक हैं. सम्पादन सहयोग डॉ. रविशंकर नायक का है.इसमें डॉ. परदेशी राम वर्मा की कलम से इस तीर्थ यात्रा के संस्मरण तो हैं ही, साथ ही छत्तीसगढ़ और श्री जगन्नाथपुरी के बीच भावनात्मक संबंधों को रेखांकित किया गया है.वे लिखते हैं कि स्वयं तीन वर्ष की उम्र में पहली बार 1950 में दुर्ग जिले के अपने गांव लिमतरा से दादी और माता -पिता के साथ पुरी गए थे.डॉ. वर्मा के शब्दों में -” मैं इस बीच प्रति वर्ष कुछ विशेष स्नेहियों के साथ पुरी की यात्रा करता हूँ. 1989 में मैं अपने गाँव के 25लोगों को बस से पुरी ले गया था.
डॉ. वर्मा आगे लिखते हैं -“छत्तीसगढ़ भी श्री जगन्नाथ पुरी के सदृश्य है. छत्तीसगढ़ के रायगढ़, गरियाबंद, महासमुन्द जैसे जिलों के गाँवों में भी जगन्नाथ मंदिरों की श्रृंखला है, तो अन्य जिलों के प्रमुख गाँवों में भी उनके भव्य मंदिर हैं. पाटन तहसील के गांव अखरा में भव्य श्री जगन्नाथ मंदिर है, तो भिलाई, रायपुर से लेकर तमाम कस्बों और शहरों में एक से अधिक श्री जगन्नाथ मंदिर हैं.वहाँ स्थापित श्री जगन्नाथ जी की पूजा ठीक पुरी के मंदिर की परम्परा में ही की जाती है. भोग आदि भी उसी तरह लगाए जाते हैं.देश के कई प्रांतों के विभिन्न शहरों में भी श्री जगन्नाथ मंदिर हैं. विदेशों में भी वे विराजते हैं. मगर उनकी दिनचर्या पूरे विश्व में एक जैसी रहती है. वे आम आदमी के लिए अत्यंत निकटस्थ, रिश्तेदार की तरह लगने वाले देव हैं. ”
अपने इस आलेख में डॉ. वर्मा ने छत्तीसगढ़ के लोकप्रिय संत कवि पवन दीवान और अन्य तीर्थ यात्रियों के साथ अगस्त 2013 में की गई पुरी धाम की यात्रा का भी रोचक वर्णन किया है. उन्होंने ‘अगासदिया’ पत्रिका के माता कौशल्या अंक का विमोचन 21अगस्त 2013 को पुरी में शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद जी सरस्वती द्वारा किए जाने का भी उल्लेख किया है, जहाँ श्री पवन दीवान भी मौज़ूद थे.
जगन्नाथपुरी में छत्तीसगढ़ का ‘सारंगढ़ भवन ‘
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डॉ. परदेशी राम वर्मा के इस यात्रा संस्मरण में पुरी में भी छत्तीसगढ़ मिल जाने पर ख़ुशी जताई है और लिखा है -पुरी के पंडा श्री ज्योति प्रकाश का घर श्री जगन्नाथ मंदिर के मार्ग पर ही है . घर का नाम है ‘सारंगढ़ भवन ‘. ज्योति प्रकाश के पुरखे सारंगढ़िया थे. सारंगढ़ के एक उदार भक्त ने पिछले वर्ष यात्रियों के लिए उनके घर में चार कमरों का आधुनिक गेस्ट हाउस भी बना दिया है. सारंगढ़ भवन इसीलिए पुरी में विशिष्ट है.
छत्तीसगढ़ में कबीर
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भिलाई नगर के अपने ‘अगासदिया ‘परिसर में डॉ. वर्मा द्वारा मुझे दी गई पुस्तकों में उनकी प्रसिद्ध और चर्चित पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ में कबीर ‘ भी शामिल है. यह पुस्तक छत्तीसगढ़ के जन जीवन पर संत कबीर के जीवन -दर्शन की अमिट छाप को लेकर है. शोध ग्रंथ के रूप में यह पुस्तक संत कबीर के 600 वें जयंती वर्ष समारोह के उपलक्ष्य में तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार से किए गए अनुबंध के आधार पर लिखी गई थी.इस पुस्तक के सम्पादक डॉ. परदेशी राम वर्मा हैं. उनके सम्पादन में अगासदिया प्रकाशन से अब तक इसके तीन संस्करण क्रमशः वर्ष 2017,वर्ष 2020 और वर्ष 2023 में प्रकाशित हो चुके हैं.मुलाक़ात के दौरान पुस्तक का तीसरा संस्करण उन्होंने मुझे भेंट किया.पुस्तक 193 पेज की और 350 रूपए की है. इसमें दस अध्याय हैं.गंभीर चिंतन परक भूमिका भी डॉ. परदेशी राम वर्मा ने लिखी है. वे लिखते हैं -कबीर छत्तीसगढ़ में विचार बनकर अपने शिष्यों के माध्यम से पहुँचे. बिलासपुर-अमरकंटक मार्ग पर अमर कंटक से 6किलोमीटर दूर कबीरचौरा नामक स्थान है. यहीं कबीर -नानक के नाम से कुण्ड है. ऐसी मान्यता है कि सोलहवीं -सत्रहवीं शताब्दी में यह स्थान सिद्ध पुरुषों का मिलन स्थल था. मान्यता है कि यहाँ कबीर और नानक की भेंट हुई थी. इससे आगे छत्तीसगढ़ में कबीर -आगमन का कोई उल्लेख नहीं मिलता.”डॉ. परदेशी राम वर्मा भूमिका में आगे लिखते हैं -“समय -समय पर किये जाने वाले दावों के बावज़ूद यह प्रायः सभी मानते हैं कि संत कबीर छत्तीसगढ़ में विचार बनकर पहुँचे. कबीर ने ढाई आखर प्रेम का पढ़ लेने का आग्रह किया. जिन शिष्यों ने कबीर के इस गूढ़ संकेत को समझा, उनमें बांधव गढ़ निवासी संत धर्मदास अग्रणी माने जाते हैं. छत्तीसगढ़ यूँ भी सरल, सीधे, समदर्शी सत्कार प्रेमी लोगों का क्षेत्र है. संत कबीर को इसने अपने अनुकूल पाया. छत्तीसगढ़ ने कबीर के इस कथन को व्यवहार में उतारा है –
*सब काहू का लीजिए, साँचा शब्द निहार
पक्षपात न कीजिए, कहे कबीर विचार.
कबीर की इन पंक्तियों के साथ डॉ. वर्मा ने आगे लिखा है -“प्रकाश की ओर ले जाने वाले हर पथ पर छत्तीसगढ़ सहज ही कदम बढ़ा देता है. कबीर के आलोक में उसकी यात्रा सुगम हुई तो वह उन्हीं के साथ चल पड़ा. हिन्दू -मुस्लिम समाज का सौहार्द, पिछड़ी -उच्च जातियों के बीच सौमनस्य, समरसता, एकता यहाँ की विशेषता है और इस विशेषता को अर्जित करने में छत्तीसगढ़ ने कबीर से संबल प्राप्त किया. ”
पुस्तक के दस अध्यायों में से प्रथम अध्याय में से प्रथम अध्याय में कबीर पंथ और छत्तीसगढ़, कबीर और पंथ की स्थापना पर प्रकाश डाला गया है.विभिन्न मान्यताओं से जुड़े महंतों, संतों, विद्वानों और मठ प्रमुखों के विचार भी इस अध्याय में संकलित हैं दूसरे अध्याय में जातीय समरसता की धरती छत्तीसगढ़ और प्रमुख कबीर पंथी जाति मानिकपुरी के जातीय संगठन से संबंधित चिंतन और विधान में कबीर दर्शन पर विचार दिए गए हैं. तीसरा अध्याय ‘ छत्तीसगढ़ की पिछड़ी जातियों का कबीराना अंदाज ‘शीर्षक से है. इसमें ‘धनी धरम दास के जीवन में कबीर के प्रवेश का उल्लेख है. इसमें लिखा गया है कि छत्तीसगढ़ में कबीर पंथ के प्रवर्तक धर्मदास साहब माने जाते हैं. संवत 1452 की कार्तिक पूर्णिमा में रींवा संभाग के बांधवगढ़ में धर्मदास जी का जन्म हुआ. दस वर्ष की उम्र में स्वामी रूप दास जी से उन्होंने दीक्षा ग्रहण की. संवत 1507 में तीसरेपन में धर्मदास जी विभिन्न तीर्थ स्थलों के भ्रमण के लिए निकल पड़े. संवत 1519 में इसी भ्रमण काल में उनकी भेंट संत कबीर से हुई. इस संबंध में यह कथन प्रसिद्ध है -” जब मथुरा तीरथ को पाई, संगम होय दरस तब पाई.”इस अध्याय में यह भी बताया गया है कि दूसरी बार संत कबीर से धर्मदास जी की भेंट काशी में हुई थी. विनय पूर्वक वे कबीर साहब को बांधोगढ़ ले आए, जहाँ संवत 1520 में विराट संत सम्मेलन हुआ. धर्मदास जी ने विधि पूर्वक चौका आरती कर गुरु से शिष्यत्व ग्रहण किया. इन्हीं धर्मदास जी के वंशजों ने छत्तीसगढ़ की ओर प्रयाण किया और धीरे -धीरे गद्दी मठों की स्थापना की. छत्तीसगढ़ में इस तरह कबीर पंथ और कबीर दर्शन का प्रचार बढ़ा. पुस्तक के शेष सात अध्यायों में भी इस संबंध में कई ज्ञानवर्धक जानकारियाँ दी गई हैं.
आदिवासी नेता कंगला मांझी पर केंद्रित ‘नवआगमन’
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सौजन्य मुलाकात में डॉ. वर्मा ने अपनी एक मासिक पत्रिका ‘नव आगमन ‘ के संयुक्त अंक (माह नवम्बर -दिसम्बर 2025 )की प्रति भेंट की. यह अंक छत्तीसगढ़ के लोकप्रिय आदिवासी नेता स्वर्गीय कंगला मांझी की जीवन यात्रा से जुड़े विभिन्न प्रसंगों पर विशेष रूप से केंद्रित है. कंगला मांझी का मूल नाम हीरा सिंह देव था. उनके कर्म क्षेत्र बालोद जिले के ग्राम बघमार में 6 दिसम्बर 2025 को आयोजित कंगला मांझी वार्षिक महोत्सव 2025 का भी उल्लेख है. सार्वजनिक -जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य कर चुके अनेक दिग्गजों को विभिन्न विभूतियों के नाम पर अगासदिया सम्मान से नवाजा गया था.उनकी जानकारी भी इसमें दी गई है.
कुल दस लोगों को सम्मानित किया गया. इनमें से दूरदर्शन केन्द्र रायपुर के कृषि दर्शन कार्यक्रम के सूत्रधार महेश कुमार वर्मा को अगासदिया दुलार सिंह मंदरा जी सम्मान, पूर्व आई. ए. एस. अधिकारी सरगुजा के पूर्व आयुक्त जी.आर. चुरेंद्र को क्रांतिवीर हीरा सिंह देव कंगला मांझी स्मृति सम्मान, पूर्व आई. ए. एस. अधिकारी, सरगुजा के पूर्व आयुक्त एम. एस. पैकरा को हिडमा मांझी स्मृति सम्मान, व्यंग्य लेखक डोंगरगांव के महेन्द्र बघेल को अगासदिया लतीफ घोंघी सम्मान और लोकगीत गायक और अभिनेता, आरंग के गंगा प्रसाद साहू को अगास दिया नारायण चंद्राकर सम्मान प्रदान किया गया. इसी कड़ी में अगासदिया देवदास बंजारे सम्मान दुर्ग जिले के ग्राम कंडरका निवासी मंचीय और फ़िल्मी कलाकार तथा दूरदर्शन रायपुर के कृषि दर्शन कार्यक्रम के प्रस्तुतकर्ता राजेन्द्र साहू को प्रदान किया गया, जबकि अगासदिया संत पवन दीवान सम्मान से नवापारा राजिम के चित्रकार स्वर्गीय स्वामी चित्रानंद (मूल नाम -झुमुक लाल कन्नौजे ) को मरणोपरांत सम्मानित किया गया. नवापारा (राजिम )निवासी साहित्यकार दिनेश चौहान को अगासदिया डॉ. नरेन्द्र देव स्मृति सम्मान से नवाजा गया. इसी तरह दल्ली राजहरा की डॉ. शिरोमणि माथुर को आगासदिया दुर्वासा लाल निषाद अगासदिया सम्मान से नवाजा गया. डॉ. शिरोमणि ग्यारह श्रेष्ठ ग्रंथों की लेखिका, शिक्षाविद और समाज सेविका हैं. अगासदिया क्रांतिवीर कंगला मांझी जागृति सम्मान से मांझी सैनिक के रूप में बेहतर समाज सेवा के लिए गोंदिया (महाराष्ट्र )के सतीश भाऊ पारधी को सम्मानित किया गया.
मुलाकात के दौरान एक छोटा -सा कलात्मक ब्रोशर भी डॉ. परदेशी राम वर्मा के हाथों प्राप्त हुआ, जो उनकी आत्मकथा ‘सुरंग के उस पार ‘ के बारे में है. इसमें भिलाई नगर के प्रसिद्ध शायर अब्दुल कलाम द्वारा लिखित अभिनंदनीय रचना भी प्रकाशित की गई है.