स्मृति शेष : डॉ. शंभूदयाल गुरु
इतिहास, अभिलेख और स्मृति के सजग प्रहरी
राजेश गाबा। प्रिंस
9893443010
मप्र गजेटियर के पूर्व संचालक, राज्य अभिलेखागार के संस्थापक और प्रदेश के सबसे वरिष्ठ इतिहासकार
डॉ. शंभूदयाल गुरु अब हमारे बीच नहीं रहे।
उनका जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है यह मध्यप्रदेश की स्मृति, उसकी दस्तावेज़ी आत्मा और इतिहास-बोध के एक युग का मौन हो जाना है।
डॉ. गुरु उन विरले इतिहासकारों में थे जिनके लिए इतिहास किताबों में बंद अतीत नहीं, बल्कि सांस लेती हुई सामूहिक स्मृति था। अभिलेख उनके लिए काग़ज़ नहीं थे वे समय की शपथ-पत्र थे। यही कारण है कि उन्होंने बार-बार कहा: “यह सिर्फ़ दफ़्तर नहीं, मध्यप्रदेश की स्मृति है।”
आज, जब वे नहीं हैं, उनकी यह पंक्ति और भी अर्थवान हो उठती है।
राज्य अभिलेखागार की स्वर्ण जयंती पर दैनिक भास्कर से हुई उनकी बातचीत=जो ऊपर शब्दशः प्रस्तुत है असल में एक इंटरव्यू नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के नाम उनका वसीयतनामा है। उसमें दर्ज हर सवाल-जवाब इतिहास की रक्षा के लिए दी गई उनकी अंतिम सार्वजनिक पुकार है।
नागपुर से 90 हज़ार फाइलों की लड़ाई, टूटे कमरे से शुरू हुई अभिलेखागार की स्थापना, गजेटियर के लिए देशभर में भटकते शोध ये सब किसी पदाधिकारी की उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि एक साधक की तपस्या है।
उन्होंने सिखाया कि इतिहास तिथियों से नहीं, फैसलों और फाइलों से बनता है।
उन्होंने चेताया कि डिजिटल प्रतियाँ सहायक हो सकती हैं, विकल्प नहीं क्योंकि स्याही में ही गवाही रहती है।
और उन्होंने आग्रह किया हज़ारों मंदिर बन रहे हैं, एक ज्ञान का मंदिर भी बना दीजिए ताकि 1798 से 1949 तक की धड़कन सुरक्षित रहे।
आज इस स्मृति लेख के अंत में एक वाक्य मन में अटककर रह जाता है
“Uncle ji, आपसे अभी मध्यप्रदेश के इतिहास और गजेटियर पर बहुत बात करनी थी…”
बहुत से प्रश्न अधूरे रह गए, बहुत से दस्तावेज़ आपकी निगाह के इंतज़ार में रह गए।
पर आपने जो दिशा दे दी, वह हमारी जिम्मेदारी बन गई है।
ईश्वर आपकी आत्मा को शांति दे और आपको अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें।
आपकी विरासत0अभिलेख, गजेटियर और चेतावनियाँ0हम सबके लिए धरोहर हैं।
मध्यप्रदेश आपको हमेशा अपने इतिहास में जीवित रखेगा। 🙏
भास्कर खास
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राज्य अभिलेखागार की 50वीं सालगिरह पर मध्यप्रदेश गजेटियर का संपादन करने वाले शंभूदयाल गुरु से खास बातचीत
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भोपाल में बिखरे रिकॉर्ड एक जगह कीजिए वरना आने वाली पीढ़ियां अपने ही मध्यप्रदेश को कागज़ों में नहीं खोज पाएंगी…
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हजारों मंदिर बन रहे एक ज्ञान मंदिर भी बना दीजिए
राजेश कुमार गाबा
भोपाल में आज भी राज्य अभिलेखागार का बहुमूल्य रिकॉर्ड तीन तीन जगहों पर बिखरा पड़ा है। जब स्वतंत्रता आंदोलन के पहले से 1949 तक के दस्तावेजों पर आधुनिक मध्यप्रदेश का इतिहास टिका है तब क्या सरकार उन्हें एक ही छत के नीचे सुरक्षित रखने के लिए एक ज्ञान मंदिर नहीं बना सकती। 96 साल के शंभूदयाल गुरु जो राज्य अभिलेखागार की स्थापना और जिला गजेटियर के बनने के गवाह रहे, संपादक रहे। स्वर्ण जयंती समारोह में दैनिक भास्कर से बातचीत में बताते हैं कि किस तरह 20 साल तक फाइलें भटकती रहीं नागपुर से 90 हजार फाइलों की लड़ाई कैसे हुई और क्यों वे आज भी नए मध्यप्रदेश के सच्चे इतिहास की सुरक्षा को लेकर बेचैन हैं।
सवाल: 1 अभिलेखों को लेकर आप बार बार कहते हैं कि ये आधुनिक भारत की सांस हैं यह इतना बड़ा दावा क्यों
जवाब: जिस तरह प्राचीन इतिहास के लिए शिलालेख जरूरी हैं ठीक वैसा ही आधुनिक इतिहास के लिए अभिलेख जरूरी हैं।
अभिलेखों के जरिए हम अपनी विरासत को संभालते हैं
अपना इतिहास अगली पीढ़ी को सौपते हैं और शोध मूल्यांकन नीति निर्माण की रीढ़ तैयार करते हैं।
मैं तो इसे सिर्फ दफ्तर नहीं मानता यह मध्यप्रदेश की स्मृति है। मैं इसकी स्थापना से जुड़ा रहा हूं और आज इसकी स्वर्ण जयंती का साक्षी हूं। यह अपने आप में एक पूरा इतिहास है।
सवाल: 2 भोपाल में अभिलेखागार की शुरुआत की कहानी कहां से शुरू होती है?
जवाब: शुरुआत किसी चमकदार मीटिंग से नहीं एक टूटे कमरे से हुई। सदर मंजिल के सामने एक टूटा हुआ कमरा था। वहीं भोपाल रियासत का बचा खुचा रिकॉर्ड फेंका हुआ पड़ा था।
मैं उस समय जिलों का रिकॉर्ड देखता था। मुझे साफ दिख रहा था कि यह सब नष्ट हो जाएगा। तब मैंने सरकार को प्रस्ताव भेजा कि भोपाल में राज्य अभिलेखागार बनना चाहिए।
महाराज डॉ. रघुवीर सिंह जैसे बड़े इतिहासकार साथ थे। ग्वालियर के इतिहासकार त्रिवेदी के जरिए भी प्रस्ताव भेजा गया। फाइल चलती फिर ठंडी पड़ जाती। लगातार 9 साल तक मैं सरकार को प्रस्ताव भेजता रहा सिर्फ इसलिए कि फाइल बंद न हो जाए।
सवाल: 3 मध्यप्रदेश 1956 में बना लेकिन अभिलेखागार 1975 में यह 20 साल क्यों लगे?
जवाब: 1956 में मध्यप्रदेश बना लेकिन उसका इतिहास सहेजने की सोच प्रशासन में देर से आई।
तब मध्यप्रदेश जिला गजेटियर का काम शुरू हुआ। हर जिले का गजेटियर बनाना था।
दिक्कत क्या थी दस्तावेज बिखरे थे,हमें देशभर के अभिलेखागारों और पुस्तकालयों में भटकना पड़ता था।
हमने भोपाल में एक अच्छा लाइब्रेरी बनाया दुर्लभ पुस्तकें इकट्ठी कीं लेकिन असली ऐतिहासिक दस्तावेजों के लिए नेशनल आर्काइव और दूसरे राज्यों के अभिलेखागार के चक्कर लगाने पड़ते थे।
1960 से 61 के बीच पहली बार राज्य स्तरीय अभिलेखागार के लिए प्रस्ताव बना लेकिन फाइल ठंडे बस्ते में डाल दी गई। बीच बीच में मध्यप्रदेश इतिहास परिषद के मंच से इतिहासकारों के जरिए हम प्रस्ताव दोबारा भेजते रहे लेकिन निर्णय नहीं हो रहा था।
सवाल:4 फिर अचानक एक दिन में कैसे फैसला हो गया?
जवाब: यह एक तरह से फाइलों की किस्मत का मोड़ था।
आर्मी से एक अफसर राज्य सरकार में आए। मैंने उनसे निवेदन किया कि राज्य अभिलेखागार का प्रस्ताव दोबारा बनवाइए।
उन्होंने कहा चलो चीफ सेक्रेट्री के पास तुम खुद समझाओ कि आर्काइव क्यों जरूरी है।
मैं सीधे मुख्य सचिव के सामने पहुंचा। मैंने कहा हमारे रिकॉर्ड टूटे कमरों में नष्ट हो रहे हैं। गजेटियर बनाने के लिए हमें देशभर में भटकना पड़ता है। इतिहास की रीढ़ बिना अभिलेखागार के नहीं बन सकती।
फाइल उनके सामने रखी गई। उन्होंने वहीं साइन कर दिए। जो बात 20 साल लटकी रही वह एक दिन में तय हो गई।
1975 में मध्यप्रदेश राज्य अभिलेखागार अस्तित्व में आया। सदर मंजिल से रिकॉर्ड पुराने सचिवालय जो आज कमिश्नर ऑफिस है उसकी आधी बिल्डिंग में शिफ्ट करवाया गया। यही इसकी औपचारिक शुरुआत थी।
सवाल: 5 ग्वालियर, इंदौर , रीवा जैसी रियासतों के पास पहले से अपने अभिलेखागार थे उनका क्या हाल था?
जवाब: यह एक दिलचस्प और थोड़ा दुखद तथ्य है कि ग्वालियर, इंदौर और रीवा इन रियासतों के पास अपने अपने अभिलेखागार थे लेकिन रखरखाव नहीं था। न वैज्ञानिक संरक्षण था न नियमित देखभाल। नतीजा यह हुआ कि दस्तावेज धीरे धीरे नष्ट हो रहे थे।
1978 में जब मैं मध्यप्रदेश अभिलेखागार का डायरेक्टर बना तो मेरा पहला लक्ष्य था कि जहां जहां इतिहास बिखरा है उसे समेटो। इसलिए पहली शाखा इंदौर में शुरू की, दूसरी ग्वालियर में और तीसरी रीवा में।
ग्वालियर में मोती महल के भीतर दफ्तर बनाया वहां रिकॉर्ड सुरक्षित रखा। रीवा में अलग कार्यालय खोला। इंदौर में राजवाड़ा में रिकॉर्ड रखा। यह काम सिर्फ दफ्तर बढ़ाने के लिए नहीं था यह इतिहास को मौत से निकालकर सुरक्षित जगह रखने जैसा था।
सवाल: 6 नागपुर वाले 90 हजार दस्तावेजों की कहानी क्या है महाराष्ट्र क्यों तैयार नहीं था?
जवाब: यह नया मध्यप्रदेश और पुराना रिकॉर्ड के बीच की खींचतान थी।
1956 से पहले सीपी एंड बरार की राजधानी नागपुर थी। महाकौशल का हिस्सा भी वहीं से संचालित होता था।
राज्य पुनर्गठन के बाद महाकौशल के 17 जिले मध्यप्रदेश में आ गए, लेकिन इन जिलों से जुड़े दस्तावेज नागपुर अभिलेखागार में ही पड़े रहे।
नागपुर में हमारे करीब 90 हजार फाइलें थीं। रखरखाव का खर्च मध्यप्रदेश उठाता था। हमारे ही कर्मचारी और अधिकारी वहां तैनात रहते थे, लेकिन दस्तावेजों पर नियंत्रण महाराष्ट्र का था।
हमने बार बार दस्तावेज मांगे। महाराष्ट्र सरकार तैयार नहीं हुई। दो बार वहां के अभिलेखागार अधिकारियों से बात की उन्होंने भी हमारी मांग ठुकरा दी।
आखिरकार मामला केंद्र सरकार तक पहुंचा। सरकार ए हिंद को पत्र लिखा गया। काफी कागज़ी लड़ाई के बाद 1972 में महाकौशल से जुड़े करीब 20 हजार दस्तावेज मध्यप्रदेश को मिल पाए।
यह सिर्फ कागज़ों का ट्रांसफर नहीं था यह नए मध्यप्रदेश की अपने इतिहास पर पहली वैधानिक पकड़ थी।
सवाल: 7 आपने बैतूल गजेटियर में तात्या टोपे का एक खास गुप्त संदेश दर्ज किया है वह क्या था?
जवाब : यह उन फाइलों में छुपी हुई एक रोमांचक कहानी थी।
जब हम बैतूल जिला गजेटियर तैयार कर रहे थे तो पुरानी फाइलों में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी एक रिपोर्ट मिली।
रिपोर्ट में लिखा था कि बैतूल और छिंदवाड़ा की सीमा पर एक थाने में सूचना आई है कि तात्या टोपे की तरफ से एक दूत आया है। वह केसरिया रंग का झंडा लिए हुए है। उसके पास पान सुपारी और नारियल है।
आज की नजर से ये सामान्य चीजें लगती हैं लेकिन उस समय यह एक कोड था। केसरिया झंडा विद्रोह का प्रतीक, पान सुपारी और नारियल, सम्मानपूर्वक आमंत्रण का संकेत संदेश साफ था। अंग्रेजों के खिलाफ आजादी का खड्ग उठाइए बगावत का समय आ गया है।
मैंने यह पूरा किस्सा बैतूल गजेटियर में दर्ज किया। सोचिए अगर यह फाइल न बची होती तो क्या हमें पता चलता कि तात्या टोपे ने विद्रोह का संदेश कैसे पहुंचाया था।
सवाल: 8 आप आज भी बार बार यही बात दोहरा रहे हैं कि एक बड़ा राज्य अभिलेखागार भवन बनाइए क्या स्थिति इतनी गंभीर है?
जवाब: हां और यह सिर्फ भावनात्मक मांग नहीं व्यावहारिक आवश्यकता है।
अभी स्थिति यह है कि भोपाल में राज्य अभिलेखागार का रिकॉर्ड तीन तीन जगहों पर बिखरा हुआ है।
मेरी सरकार से सीधी अपील है
बहुत सारी बिल्डिंग्स बन रही हैं एक स्टेट आर्काइव की बड़ी बिल्डिंग भी बना दीजिए जिसमें सारा रिकॉर्ड एक जगह रहे। अभी अलग अलग जगहों पर रखे दस्तावेज नमी लापरवाही और दुर्घटनाओं से नष्ट हो रहे हैं।
हमारे पास1798 से 1919 तक के रिकॉर्ड हैं। फिर मर्जर मूवमेंट से जुड़े 1949 तक के दस्तावेज हैं।
यह आधुनिक मध्यप्रदेश की धड़कन है। अगर यह खो गए तो आधुनिक भारत और मध्यप्रदेश का इतिहास अधूरा हो जाएगा।
इसलिए मैं कहता हूं कि आप हजारों मंदिर बना रहे हैं एक ज्ञान का मंदिर भी बना दीजिए।
सवाल: 8 आप अक्सर दिल्ली के नेशनल आर्काइव का उदाहरण देते हैं क्यों?
जवाब: क्योंकि वह दिखाता है कि एक राष्ट्र अपने इतिहास को कितना सम्मान देता है। दिल्ली में नेशनल आर्काइव की बिल्डिंग आजादी के बाद बनी। कोलकाता से आजादी के पहले का रिकॉर्ड वहां लाया गया। बहादुरशाह ज़फर के काल के दस्तावेज भी वहां सुरक्षित हैं
जब भारत सरकार अपने रिकॉर्ड के लिए इतना व्यवस्थित इंतजाम कर सकती है तो मध्यप्रदेश अपने राज्य अभिलेखों के लिए क्यों नहीं कर सकता। हमारा भी अपना ऐसा स्टेट आर्काइव होना चाहिए जहां सब कुछ एक जगह और वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित हो।
सवाल: 9 आप कहते हैं कि सरकार के सिर्फ 5 प्रतिशत दस्तावेज ही स्थायी इतिहास बनते हैं फिर भी समस्या क्या है?
जवाब : सिद्धांत यह है कि किसी भी सरकार के कुल दस्तावेजों में से लगभग 5 प्रतिशत ऐसे होते हैं जो स्थायी ऐतिहासिक महत्व के होते हैं।
जैसे किसी जिले के गठन से जुड़े मूल दस्तावेज। बड़े प्रशासनिक फैसलों की मूल फाइलें, मर्जर मूवमेंट के रिकॉर्ड , प्रशासनिक ढांचे के गठन से जुड़े कागज़।
लेकिन दुर्भाग्य यह है कि सालों से ऐसे दस्तावेज अभिलेखागार तक पहुंच ही नहीं रहे हैं। फाइलें दफ्तरों में दम तोड़ देती हैं या कूड़ेदान में चली जाती हैं।
सरकार को एक मजबूत रिकॉर्ड मैनेजमेंट सिस्टम बनाना होगा जिसमें साफ हो कि कौन सी फाइल कब अभिलेखागार को भेजनी है और कौन सी फाइल कब नष्ट की जा सकती है।
इतिहास सिर्फ तारीखों से नहीं फाइलों के फैसलों से बनता है।
सवाल: 9 डिजिटलाइजेशन को आप कितना बड़ा समाधान मानते हैं क्या यह कागज़ की जगह ले सकता है?
जवाब : डिजिटलाइजेशन एक बहुत ही स्वागत योग्य कदम है लेकिन यह पूरा समाधान नहीं सुरक्षा की एक परत है।
इसके फायदे हैं शोधार्थियों को दस्तावेज आसानी से मिल सकते हैं, मूल कागज़ बार बार हाथ में नहीं आएंगे इसलिए कम घिसेंगे, आपात स्थिति में डिजिटल कॉपी बैकअप की तरह काम कर सकती है।
लेकिन मैं हमेशा कहता हूं डिजिटल प्रति सुरक्षित रखिए पर मूल दस्तावेज को भी वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित रखिए। कागज़ की स्याही में ही असली गवाही छुपी है।
इतिहास की असली गंध उसकी उम्र उसकी प्रामाणिकता यह सब मूल दस्तावेज में होती है सिर्फ स्क्रीन पर नहीं।
सवाल: 10 गजेटियर के काम में आपका योगदान बहुत बड़ा माना जाता है आप खुद इसे कैसे देखते हैं?
जवाब: मुझे तो लगता है कि असली नायक मैं नहीं दस्तावेज हैं।
अगर ये फाइलें बची न होतीं तो मैं भी अपना काम नहीं कर पाता। मैंने तो बस जो था उसे इकट्ठा करने पढ़ने और व्यवस्थित करने की कोशिश की।
स्वर्ण जयंती समारोह में मुझे सम्मान मिला यह भावनात्मक क्षण था लेकिन असली संतोष तब होगा जब मुझे यह खबर मिले कि भोपाल में एक भव्य केन्द्रीय राज्य अभिलेखागार भवन बन रहा है जहां तीनों जगह बिखरा रिकॉर्ड एक साथ आ जाएगा।
सवाल: 11 अंत में अगर आप सरकार और समाज दोनों से एक अंतिम अपील करना चाहें तो क्या कहेंगे?
जवाब: मेरी अपील सरल है लेकिन सवाल कड़ा है। जब 1798 से 1949 तक का रिकॉर्ड हमारे पास है। जब मर्जर मूवमेंट तक की पूरी कहानी कागज़ों में दर्ज है। जब मध्यप्रदेश की प्रशासनिक सामाजिक राजनीतिक स्मृति इन दस्तावेजों में सांस ले रही है
तो क्या यह उचित है कि ये रिकॉर्ड तीन तीन जगह बिखरे रहें, नमी लापरवाही और अनदेखी में धीरे धीरे खत्म होते रहें।
मैं सरकार से कहता हूं
भोपाल में एक बड़ा केन्द्रीय राज्य अभिलेखागार भवन बनाइए। सब रिकॉर्ड एक जगह लाईए। इसे सचमुच ज्ञान का मंदिर बनाइए।
अगर आज हमने अपने अभिलेखों को गंभीरता से नहीं लिया तो कल इतिहास हमें गंभीरता से नहीं लेगा।
इतिहास को कागज़ पर जिंदा रहने दीजिए ताकि आने वाली पीढ़ियां अपने मध्यप्रदेश को अंदाज़ों से नहीं प्रमाणों से जान सकें।