कितनी बदल चुकी है
कितनी बदल चुकी है
दुनिया
भावना, संवेदना,
सम्मान,,
सबको कुचलती हुई
बेलगाम राजनीति ,
और इसके
कुचक्रों में फंसे लोग,,
झरोखों से झांकती हज़ारों आंखें,
न्याय की गुहार लगातीं
स्त्रियाँ,
दरांतियों के दातों तले
जैसे काट देना चाहतीं हैं
दुश्मनों के गुरूर
के साथ उनके धड़,,
लोग फूस की भांति
अग्नि के हवाले
कर देना चाहते हैं
स्वाहा, स्वाहा!
ढपली के शोर के साथ
बेरोजगारी के ख़िलाफ़
आवाज़ बुलंद करती
युवा पीढ़ियों की क्रांति,
जंगलों को जान से भी
ज्यादा प्यार करने वाले
आदिवासी लोग
लड़ रहे हैं
अपने- अपने हिस्से की
लड़ाइयाँ ,,,,
विचारणीय है
आखिर क्यों,
दुनिया की आधी से
ज्यादा आबादी
हो चुकी है इंकलाबी,,,
✍️श्रद्धा