तो फ़रवरी जा रहे हो तुम…
तो फ़रवरी जा रहे हो तुम…
कैलेंडर की दीवार से उतरते हुए
जैसे कोई महीना नहीं,
एक अनकहा संवाद विदा ले रहा हो।
अब अगले साल मिलोगे
बारह पन्नों की दूरी पर,
समय की लंबी सीढ़ियाँ उतरकर।
सच कहूँ?
मैं तुमसे फिर मिलना नहीं चाहती।
तुम जानते हो न,
मिलने की वजह नहीं
न मिलने की वजह।
वही कुछ दिन,
जो साल भर की चुप्पियों से भारी पड़ जाते हैं।
वही तारीख़ें,
जो अपनी जगह से हिलती नहीं,
बस दिल के किसी कोने में अटक जाती हैं।
फ़रवरी,
तुम्हारे साथ कुछ यादें भी आती हैं
हल्की धूप में चुभन जैसी,
मीठे शब्दों में छुपी हुई टीस जैसी।
तुम्हारी छोटी-सी उम्र
इतनी लंबी क्यों लगती है?
काश…
जनवरी के बाद सीधे मार्च आता।
बीच का यह ठहराव न होता।
न कोई हिसाब,
न कोई पुरानी आवाज़ लौटती।
साल बदलते रहें,
पर तुम भीतर ही रह गए
अनचाहे मेहमान बनकर।
फ़रवरी,
तुम्हें विदा करते हुए
मैं बस इतना चाहती हूँ
अगली बार जब आओ,
तो अपनी तारीख़ें हल्की लेकर आना।
या फिर…
कभी मत आना।
#नीनाअंदौत्रा