छत्तीसगढ़ -परिचय (24 लोककथाएँ ) – डॉ बलदेव प्रसाद मिश्र
छत्तीसगढ़ के इतिहास और संस्कृति को समझने मे पूर्व के अध्येताओं का अध्ययन महत्वपूर्ण सीढ़ियां हैं जिनसे होकर हम वर्तमान जानकारियों तक पहुँचे हैं। प्रारम्भिक अध्ययनों मे यद्यपि साक्ष्यों की सीमितता होती है मगर अध्ययन सामग्री की ‘शुद्धता’ अधिक होती है जिससे घटनाओं की ‘वास्तविकता’ को समझने की संभावना अधिक होती है।लोक कथाएँ,जनश्रुतियाँ अपने प्रारम्भिक रूपों मे अधिक सार्थक हुआ करती हैं, समय के साथ उसमे ‘मिलावट’ बढ़ती जाती है।
डॉ बलदेव प्रसाद मिश्र[1898-1975] छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित विद्वानों मे हैं।साहित्य और संस्कृति पर उन्होंने महत्वपूर्ण लेखन किया है। खासकर तुलसी-दर्शन पर उनका लेखन चर्चित रहा है।
‘छत्तीसगढ़ -परिचय’ [1960 ई.]मुख्यतः लोक कथाओं और जनश्रुतियों का संग्रह है जिसमे उन्होंने छत्तीसगढ़ अंचल के चौबीस लोक कथाओं संग्रह किया है। साथ ही उन्होंने पुस्तक मे छत्तीसगढ़ -परिचय शीर्षक से एक आलेख लिखा है जिसमे छत्तीसगढ़ के इतिहास का संक्षिप्त विवेचन है।
छत्तीसगढ़ क्षेत्र के लिए एक नाम ‘महाकोसल’ भी प्रचलित है। कनिंघम ने ‘महा’ विशेषण को विशाल /बड़ा के अर्थ मे लिया है। इस नाम के संबंध मे मिश्र जी का मत है “जान पड़ता है कीर्तवीर्य सहस्त्रार्जुन के वंशज चेदि हैहयो ने जिनका कि इस ओर लगभग डेढ़ हजार वर्षों तक राज्य रहा, इसकी महत्ता बढ़ाने के लिए इसे महाकोसल कहना प्रारम्भ कर दिया हो -ठीक उसी तरह जैसे नदी का नाम महानदी हो गया, छोटे इलाके का नाम महासमुंद हो गया, आराध्य देवी का नाम महामाया हो गया और राजाओं का नाम महाशिवगुप्त आदि हो गया। “(पृ. 102)
एक अन्य जगह छत्तीसगढ़ नामकरण की एक और संभावना का उल्लेख करते हैं –
“छत्तीस में तीन और छः का उलटा क्रम देखकर शायद किसी ने यह अर्थ लगा दिया कि छत्तीस वह है जिसमें गणना का उलटा-सीधा सभी क्रम समा जाय ।”छत्तिसों राग” और “छत्तिसों जातियों” का लोग ऐसा ही अर्थ तो लिया करते हैं। नाई शायद अपनी सभी तरह की (उलटी-सीधी ) अक्लमन्दियों के लिये ही छत्तीसा कहाता है । क्या इसीलिये, उलटे सीधे सभी तरह के गढ़ों के पुञ्ज का नाम छत्तीसगढ़ पड़ गया।”(पृ. 52)
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ क्षेत्र मे प्राचीन शैलचित्र मिलते हैं। प्राचीन शैलचित्र विश्व मे बहुत से जगहों मे मिलते हैं। लंबी दूरी के बावजूद इन चित्रों मे अद्भुत समानता होती है। इससे आदि मानवों के नजदीकी सम्बन्ध अथवा समान परिस्थितियों मे समान रचनात्मक कल्पना का पता चलता है। मिश्र जी इस बात को रेखांकित करते हैं – “रायगढ़ की पहाड़ियों में शिकार और “लैड मैन ” आदि के जैसे चित्र मिलते हैं ठीक वैसे ही चित्र यूरोप के पश्चिमी कोने (स्पेन ) में और अमरीका के मध्यवर्ती भाग (मेक्सिको) में भी मिलते हैं। ये सब चित्र अनार्य सभ्यता के परिचायक हैं और उस समय के हैं जब धनुष बाण आदि अस्त्र -शस्त्रों की खोज ही नहीं हुई थी। कला और टेकनीक का यह अद्भुत मेल सिद्ध करता है कि तीनों महादेशों में या तो एक ही जाति के लोग रहते रहे या उनमे परस्पर मेल -जोल बराबर होता रहा है। “(पृ. 103)
छत्तीसगढ़ के नामकरण के लिए शिवनाथ नदी के उत्तर और दक्षिण में स्थित अठारह -अठारह गढों की भूमिका को प्रमुख मानी जाती है। इस संबंध में मिश्र जी लिखते हैं –
“लगभग सोलह सौ वर्ष पहिले महाकोसल के राजा
महेन्द्र से भारतीय नेपोलियन समुद्रगुप्त को युद्ध करना पड़ा
और महाकान्तार के राजा व्याघ्रदेव ( या बाघराय से
लोहा लेना पड़ा था। उस समय ‘अष्टादश अटवी राज्य’
(अर्थात अठारह जङ्गली राज या जङ्गली गढ़) का भी जिक
आता है । अठारह गढ़ की प्रथा; इस प्रकार बहुत पुरानी जान
पड़ती है। उस समय का अठारह गढ़ तो प्रधानतः मध्यभारत में
रहा होगा परन्तु उसके बाद का ‘अठारहगढ़’ उड़ीसा में भी दिखाई
पड़ने लगा । उनके दूने होने की लालसा से, जान पड़ता है, यह
प्रान्त छत्तीसगढ़ कहाने लगा। हो सकता है कि रतनपुर के हैहय
घराने के अठारहगढ़ और रायपुर के हैहय घराने के अठारहगढ़
मिलकर यह समूचा प्रान्त छत्तीसगढ़ बन गया हो ।”
मिश्र जी ‘अठारह गढ़’ को प्रचलित रूढ़ि की संभावना का जिक्र करते हैं।
सिरपुर [श्रीपुर ] अपने पुरातात्विक अवशेषों के लिए प्रसिद्ध है। ब्रिटिश अध्यताओं बेगलर और कनिंघम ने इसका उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है और ऐसा माना भी जाता रहा है कि राजिम क्षेत्र के मंदिरों में [ख़ासकर राजिम के रामचंद्र मंदिर के स्तम्भ ] सिरपुर पुरावशेषों का उपयोग हुआ है। मिश्र जी इस बात से भिज्ञ हैं –
“श्रीपुर के आसपास बिखरी हुई शिवमूर्तियों और वहाँ के खण्डहरों [ ध्वंसावशेषों ] को देखकर यह सहज अनुमान किया जा सकता है कि किसी समय वह निश्चय ही मध्यप्रदेश की काशी नगरी कहाने का दावा भर रहा होगा । वहाँ के नक्काशीदार पत्थरों और कला- पूर्ण मूर्तियों के ढेर के ढेर राजिम, रायपुर, धमतरी आदि आदि स्थानों में ले जाये और अनेक मठों मंदिरों आदि में लगा दिये गये हैं। कुछ तो नांदगाँव के राजा महन्त घासी-दास जी के बनवाये हुये रायपुर के अजायब घर में पड़े हुए हैं। फिर भी अभी वहाँ जो कुछ बाकी रह गया है, वह भी दर्शकों को चकाचौंध में डाल देने के लिये बहुत है।”(पृ. 107)
छत्तीसगढ़ के मैदानी क्षेत्रों के गाँवो में गौंटिया के बाद मंडल का पद महत्वपूर्ण होता है। व्यवहार में दोनों शब्द आज भी प्रचलित हैं। सोचने पर ‘मंडल’ शब्द की व्यूत्पत्ति आसान लग सकती हैं मगर मेरा ध्यान मिश्र जी को पढ़े बगैर इस ओर नहीं गया था –
“कहना न होगा कि छत्तीसगढ़ का सम्मान सूचक ‘मंडल’ शब्द इसी ‘मांडलिक’ शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है एक सूबे का गवर्नर।”(पृ. 108)
रतनपुर के ‘कन्हारजुनी’ तालाब का नामकरण –
“मोरध्वज कथा के प्रेमी ‘कृष्णार्जुनी’ बताते और आधुनिक इतिहास प्रेमी हैहय नरेश यश: कर्णदेव के नाम पर ‘कर्णार्जुनी’ कहते हैं।”(पृ. 108)
कवर्धा के फणि नागवंशियों के बारे में
“उन दिनों कवर्धा में नाग वंशी राजाओं का राज्य था
जिन्होंने कलचुरियों से विवाह सम्बन्ध स्थापित कर लिया था ।
भावुक लोग कहते हैं कि नागवंशी लोग साँपों की सन्तान
परन्तु बिचारक लोग कह सकते हैं कि नाग का अर्थ है पहाड़ी
लोग — वे लोग जो नग अर्थात् अचल या पर्वत पर रहा करते
। अतः या तो यहाँ के आदिवासी पहाड़ी लोग ही नाग कहाते
रहे होंगे या जैसा कि कई अन्य विद्वानों का मत हैं,”(पृ. 109)
मिश्र जी एक महत्वपूर्ण बात की ओर ध्यान दिलाते हैं कि ‘नाग’ शब्द बहू अर्थी है, इसलिए सर्वत्र इसका अर्थ सर्प हो यह आवश्यक नहीं।
मिश्र जी भोरमदेव के बारे में और लिखते हैं –
“संवत 840 में कवर्धा के नागवंशी नरेश ने भौरमदेव का जो मंदिर बनवाया था और जो टूटी फूटी हालत में अब भी वहाँ खड़ा हुआ है, वह अपनी स्थापत्य कला में अद्वितीय है। इस इलाके का नाम कवरधा या कबीरधाम उस समय पड़ा जब कबीर के पट्टशिष्य धर्मदास के वंशजो ने वहाँ अपनी गद्दी कायम की।”(पृ. 109)
मिश्र जी ने जिस संवत 840 का जिक्र किया है वह राणक गोपाल देव का आलेख है जिसे ‘योगी मूर्ति आलेख’भी कहा जाता है। इसे कलचुरी संवत माना गया है तदनुरूप यह 1088-89 ई. ठहरता है। भोरमदेव के लिए उन्होंने ‘भौरमदेव’ प्रयोग किया है। दरअसल तत्कालीन समय तक भोरमदेव के लिए “भैरम देव /बोरम देव /बोड़म” देव शब्द का प्रचलन था।
कवर्धा का नाम कबीरधाम से अपभ्रंषित माना जाता है, जो कि कवर्धा में कबीरपंथ के आठवे गुरू हक्कनाम साहेब के गद्दी स्थापित करने (लगभग 1806 ई.)के बाद का जान पड़ता है। फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि इससे पूर्व भी इसका कुछ नाम रहा होगा। दस्तावेजों में कमरदा /कँवरधा /कमरधा /कँवरदा आदि नामों के मिलने से भी इस बात के संकेत मिलते हैं।
कवर्धा रियासत को ‘फ्यूडेटरी चीफ’ की पदवी मिलने के बारे में लिखते हैं –
“कवर्धा और पंडरिया का घराना एक ही था और उन दोनों में पड़रिया का घराना बड़ा माना जाता था। परन्तु सर रिचार्ड टेम्पल के दरबार में उपस्थित होनेवाले दोनों जमींदारों में से बेचारा पंडरिया का जमींदार उस समय नाबालिग था ।इसलिये वह जमींदार ही रह गया और कवर्धा के जमींदार केवल
इसलिये “फ्यूडेटरी चीफ” के “पावर” से विभूषित कर दिये गये
क्योंकि वे उस समय बालिग थे।”
मध्यप्रान्त और छत्तीसगढ़ के बहुत बड़े क्षेत्र में 13-14वीं शताब्दी के बाद गोंड़ शासकों का उभार दिखाई देता है इस संबंध में मिश्र जी का मानना है –
“जान पड़ता है कि गोड़ लोग भी दक्षिण की ओर से आकर इस एक हजार साल के भीतर ही छत्तीसगढ़ में सर्वव्यापी हो गये। गोड़ लोग स्वावलम्बी थे, वीर थे, कष्ट सहने की पूरी शक्ति रखते थे। उनमे परस्पर अच्छा संगठन था। जिस समय उत्तर भारत विदेशी मुगलों और पठानों के मुकाबिले में उलझा हुआ था और इस दक्षिण कोसल की ओर ध्यान देने की क्षमता खो चूका था, उस समय इस वीर गोड़ जाति को इस ओर बढ़ चलने का अच्छा अवसर मिल गया। वे बढ़ते गये और इस प्रान्त को गोड़वाना बना कर ही रहे।”(पृ. 115)
मिश्र जी उपरोक्त मत विचारणीय है। गोड़ जनजाति इस क्षेत्र के एक बड़े भाग में आदिम काल से निवासरत है। इस समूह के जो. लोग सत्ता में आये क्या वे स्थानीय उभार थे या इस क्षेत्र के निकट दक्षिण से उनका प्रवास हुआ था।
छत्तीसगढ़िया के बारे मिश्र जी का दृष्टिकोण उदात्त है
“कोई पाँच साल पहिले आया, कोई पचास साल पहिले, कोई पाँच सौ साल पहिले और कोई सम्भवत : पाँच हजार साल पहिले, परन्तु आये सब बाहर ही से। वे यहाँ बस गये इसलिए अब छत्तीसगढ़िया कहलाने लगे।”(पृ. 115)
★★★
जैसा कि पुस्तक के शीर्षक में चौबीस लोक कथाओं का जिक्र है, पुस्तक मुख्यतः इसी पर केंद्रित है। ये लोक कथाएँ व्यापक रूप से इस अंचल में प्रचलित रही हैं और सामन्यत: ग्राम /नगर नाम से जुड़ी हुई हैं। यह भी कह सकते हैं कि इन जगहों की विशिष्ट पहचान इन कथाओं से रही है। इन चौबीस लोक कथाओं से संबंधित जगहों की सूची इस प्रकार है –
१ – सिंहनपुर (रायगढ़)२- सिहावा ३- रतनपुर (१) ४ – रामगिरि (सुरगुजा) ५- विमलामाता (डोंगरगढ़) ६ — रतनपुर (२) ७-शिवरीनारायण ८- राजिम ९- दुर्ग १०- बनबरद ११- देव बलौदा
१२- पाटन १३ – दन्तेवाड़ा १४ – खलारी १५ – माली घोड़ी १६ – गुंडरदेही १७- विंद्रा नवागढ़ १८ – उपरौड़ा १९- सोरर २०- सक्ती
२१ – शिवनाथ नदी २२ – अम्बागढ़ चौकी २३- ओड़ार बाँध
२४ – भंडार २५ – परिचय (इतिहास)
हम यहाँ प्रत्येक जनश्रुति /लोक कथा का विश्लेषण नहीं करेंगे, केवल कुछ बिंदुओं का उल्लेख करेंगे –
‘सिंहनपुर'(सिंघनपुर)रायगढ़ जिले में स्थित है जो अपने प्राचीन शैल चित्रों के लिए प्रसिद्ध है। ‘सिहावा'(कांकेर जिला ) में श्रृंगी ऋषि का आश्रम माना जाता है और महानदी का उद्गम है। रतनपुर का संबंध मोरध्वज की कथा से जोड़ा जाता है। ‘रामगिरी’ (पर्वत , रायगढ़) सीताबेंगा और जोगीमारा गुफा के लिए चर्चित है तथा जिसका संबंध सुतनुका और देवदीन की कथा से है। ‘विमला माता’ (बमलाई देवी, डोंगरगढ़ ), रतनपुर (2) में रत्नदेव द्वारा रतनपुर को राजधानी बनाने तथा महामाया मंदिर के निर्माण करने की कथा है।
‘शिवरीनारायण’ का नामकरण एक मत के अनुसार शबर/सँवर से जोड़ा जाता है तो दूसरे मत के अनुसार रामकथा के सबरी से। ‘राजिम’ का संबंध जहाँ राजीवा तेलिन कथा से है वहीं राजीव लोचन मंदिर निर्माण/जीर्णोद्धार नलवंशी जयपाल (जगतपाल ) से जुड़ता है। ‘दुर्ग’ ( पुराना नाम शिव दुर्ग/जगपाल दुर्ग ) का संबंध भी इसी जंगपाल /जगपाल (जगतपाल)से है। ‘बानबरद’ का की व्यूत्पत्ति मिश्र जी ‘बन बरदा’ से बताते हैं जहाँ बन तो वन है बरदा बरधा या सांड़ है।
‘देवबलौदा’ की प्रचलित कथा जिसमे छमासी रात में मंदिर निर्माण और भाई -बहन की कथा आती का जिक्र है। ‘पाटन’ का पुराना नाम ‘भंगपुर पाटन’ बताया है तथा पाटन ‘पत्तन’ का बिगड़ा रूप है।
‘दंतेवाड़ा’ के बारे में लिखते हैं –
“संस्कृत में काक(कौवे )को द्रोण भी कहते हैं । इस नाम-सादृश्य के कारण द्रोणीय परम्परा हुई काकीय अथवा काकतीय परम्परा । संस्कृत में हस्ती को दन्ती भी कहते हैं। इस तरह हस्तिनापुरी की अधिष्ठात्री देवी हस्तेश्वरी आदि कहाने की जगह दन्तेश्वरी कही गई
नामों का पर्याय इसलिये गढ़ा गया कि दक्षिण वाले आश्रयदाता
गण शरणार्थियों के प्रति व्यर्थ की शंकाएँ न करते रहें।”(पृ. 56)
एक अन्य लोकमत के अनुसार देवी सती का दाँत गिरने के कारण यह स्थान दंतेवाड़ा कहलाया बताया जाता है। इस संबंध में श्री ओम सोनी अपनी पुस्तक ‘बस्तर साम्राज्ञी माँ दंतेश्वरी’ में लिखते हैं –
“इस स्थान का नाम हजार वर्ष पूर्व से दत्तवाड़ा ही था । इसका अभिलेखीयप्रमाण दंतेवाड़ा में भैरव मंदिर में रखा प्राचीन शिलालेख है | यह अभिलेख 1061 ईसवी का है। इसी दत्तवाड़ा नाम से यहाँ की स्थानीय समुदाय ने नाग राजाओं स्थापित माणिक्येश्वरी देवी को दत्तवाड़ीन देवी एवं दंतेसरी कहकर पुकारा । यह नाम आज विगत सौ वर्षों में दंतेश्वरी के नाम से प्रचलन में आया। धीरे धीरे लोक व्यवहार में दंतेश्वरी नाम पुरी तरह से प्रचलित हुआ और स्थापित हो गया ।”(पृ. 83)
‘खलारी'(खल्लारी )में देवपाल मोची द्वारा बनवाये नारायण मंदिर को मिश्र जी हैहयवंशी शासको की सदाशयता का उदाहरण मानते हैं। ‘माली घोड़ी’ गाँव में बंजारे और उसके प्रिय कुत्ते की कथा से बने ‘कुकर्रामढ़ी’ का जिक्र है।’गुंडरदेही’ बहादुर माखन सिंह की कथा, ‘बिंद्रानवागढ़’ में कचरा घुरवा की कथा है।बिंद्रानवागढ़ का नाम मिश्र जी ‘बेंदरा या बिन्दा और नवागढ़’ से मानते हैं।
‘उपरोड़ा’ में हिम्मतराय तथा उसके स्वामीभक्त गाड़ा जाति के नौकर की कहानी है। इसी अध्याय में वे लिखते हैं –
“उसी इलाके का नाम पड़ा पेण्ड्रा जमीन्दारी जिसका भाग पहिले कोमोमण्डल कहाता था । शअमर कंटक इसी जमीन्दारी का अंग बना । यह तो पीछे की बात है जब अंग्रेजों ने रीवा दरबार को प्रसन्न करने के लिये तीर्थ रूप नर्मदा का उद्गमस्थ पेण्ड्रा से हटाकर बघेलखण्ड में शामिल कर दिया।”(पृ. 73)
‘सोरर’ में छछानछाड़ और उसकी माँ की कथा है जिसे आज ‘बहादुर कलारिन’ के नाम से जानते हैं। ‘सक्ती’ में हरि और गुजर नामक दो भाइयों की कथा,’शिवनाथ नदी’ में शिवा उसके प्रेमी की कथा है।’अम्बागढ़ चौकी में अम्बागढ़ ‘आमागढ़’ का बदला रूप है, ‘ओड़ार बाँध’ सती ओड़िन की कथा है जिसे आज दशमत कैना के नाम से जानते हैं।’भंडार’ में घासीदास जी के जीवन की एक झलक हैं।
★★★
‘दो शब्द’ में मिश्र जी ने लिखा है-
“इस ‘परिचय’ का उद्देश्य है छत्तीसगढ़ के विद्यार्थियों को अपने अतीत की उज्वलता के प्रति उत्साहित बनाना और अपने
वर्तमान् के प्रति व्यापक राष्ट्रीयतायुक्त देखना । इसकी कहानियाँ विविध जिलों के हिन्दी तथा अंग्रेजी ‘गजेटियरों’ और सुनी सुनाई किम्वदन्तियों के आधार पर पल्लवित की गई हैं। मनोरंजन के साथ ही उपयुक्त उद्देश्य को ध्यान में रख कर ही ये लिखी गई हैं। इनके शीर्षक प्रायः स्थानपरक ही हैं और इन कहानियों में छत्तीसगढ़ जिलों का समावेश हो जाता है। आशा है छत्तीसगढ़ के बाहर भी इन रचनाओं का स्वागत
होगा।”
इससे उनकी विनम्रता का पता चलता है। पुस्तक का प्रथम प्रकाशन 1960 ई. में हिन्द प्रकाशन से हुआ था जिसे वैभव प्रकाशन रायपुर ने 2024 में पुनर्प्रकाशित कर महती कार्य किया है।
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पुस्तक – छत्तीसगढ़ -परिचय (24 लोककथाएँ )
लेखक – डॉ बलदेव प्रसाद मिश्र
प्रकाशन – वैभव प्रकाशन, रायपुर
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★अजय चंद्रवंशी, कवर्धा (छत्तीसगढ़)
मो. 9893728320