’तारा’ : संजीव बख्शी का नवीनतम उपन्यास
सेतु प्रकाशन दिल्ली
’तारा’ संजीव बख्शी का नवीनतम उपन्यास है। पिछले वर्ष ही उनके दो उपन्यास ’ढाल चंद हाजिर हो’ तथा ’गांव खेड़ा मौहाभाटा’ प्रकाशित हुए थे ।
संजीव बख्शी उन लेखकों में से हैं जो बिना शोर शराबे के चुपचाप लिखने में यकीन रखते हैं। यही नहीं बल्कि इस घोर आत्मश्लाघा से भरे हुए इस विकट समय में नगरों और महानगरों की चकाचौंध से दूर आदिवासी गांवों की सुधि लेते हैं , जहां आज भी मनुष्यता बरकरार है । जहां आज भी पहाड़ों ,नदियों और जंगलों के बीच आदिवासी जन जीवन की तरलता और सरलता को महसूस किया जा सकता है।
इस तरह संजीव बख्शी अपनी तरह के अकेले लेखक हैं जो जिद की तरह आदिवासी ग्राम्य जीवन को चित्रित करना अपना आपद धर्म समझते हैं।
’तारा’ ऐसे ही कांकेर के नरहरपुर विकासखंड का एक आदिवासी गांव मासूलपानी के किशोर मिठाई की कहानी है, जो यथार्थ और कल्पना की धूप छांव में जिंदगी को समझने की कोशिश करता हुआ बड़ा हो रहा है। अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति और संवेदनशीलता के चलते वह अपने गांव के आदिवासियों को आत्मनिर्भर बनाने का सपना ही नहीं देखता है अपितु अपने सामर्थ्य भर उसे बदलने की कोशिश भी करता है ।
आकाश के तारे को वह जब भी पुकारता है तारा उससे मिलने उसके समीप चला आता है। तारा एक जादुई फैंटसी भर नहीं है किशोर मिठाई के प्रकृति के प्रति प्रेम और आकर्षण का भी परिचायक है।
प्रकृति संजीव बख्शी के हर उपन्यास या कथा के केंद्र में ठीक उसी तरह विन्यस्त होकर आता है जिस तरह आदिवासी गांवों का जन जीवन अपनी संपूर्ण समग्रता में एक अनिवार्यता की तरह उद्घाटित होता हुआ दिखाई देता है।
तारा की कथा दिलचस्प भी है और एक अलग तरह की भाव संवेदना के फलस्वरूप इस भयावह समय में एक दिन सब कुछ बेहतर होगा इसकी आस भी जगाता है । आकाश के तारे का मानवीकरण संजीव बख्शी ही संभव कर सकते थे ।
संजीव बख्शी को इस नवीनतम उपन्यास ’तारा’ के लिए बधाई ।