उसके स्वप्नों का रहस्यवाद
उसके स्वप्नों को जानना आसान नहीं !
उसकी इच्छाओं द्वारा निर्देशित,
इन स्वप्नों में कथा पात्र जुड़ जाते हैं नए।
लुप्त हो जाते हैं कई मंझे हुए किरदार !
हर पात्र की एक नई माँग
कुछ अनसुनी, अटपटी फरमाइशें,
कुछ अनजान चेहरे
जो ख़ुद को बताते हैं अपना !
जताते हैं अधिकार अपना !
उसके स्वप्नों में स्थान मिलता है सबको।
पर उतर नहीं पाता कोई भीतर तक ।
पता नहीं कैसे इतने विस्तृत स्वप्न
समा जाते हैं उसके मानस पटल में ।
स्वप्नों की भीड़ के बीचों बीच बसे हैं,
अतुल्य सौंदर्य लिए पुष्प उपवन,
उसकी शिराओं सी बहती नदियाँ,
चेतावनी देते कंटक वन,
कलरव करते हंसों के झुंड,
सहस्त्र भाषाओं, भंगिमाओं की व्याख्याएं,
शास्त्रों और ऋचाओं के उपाख्यान !
उसके आंचल में जड़े हैं
जाने कितने तारक पुंज,
जहाँ जाने कितने सूर्य उगते ढलते हैं रोज़ !
उसके चन्द्र की बढ़ती घटती कलाएँ,
अंधेरों को दे जाती हैं रोज़ एक नई पहली !
द्वारपाल से घूमते ये अनेक सूर्य, चन्द्र, तारे
अपने प्रकाश से उसके स्वप्न लोक तक
पहुंचने का करते हैं नित प्रयास !
और फिर… वो लेती है करवट,
और फिर बदल जाता है
उसके स्वप्न लोक का मानचित्र !
कि अनुमान न लगा पाए कोई,
कि बूझ न सके कोई आगंतुक,
इन गूढ़ स्वप्नों के शहर तक
पहुंचने का रास्ता !
वो जब विलीन हो जाती है,
निद्रा के आलिंगन में,
अगड़ाई लेता हुआ जागता है
ब्रह्माण्ड का एक अणु अंश !
– दीपा स्वामिनाथन