’लौटता हूं मैं तुम्हारे पास’ : रमेश अनुपम
डॉ . नीलम वर्मा
आज मैंने ’लौटता हूँ मैं तुम्हारे पास’ जो कि रमेश अनुपम सर का काव्य संग्रह है पढ़ा। यह संग्रह मेधा बुक्स प्रकाशन नई दिल्ली से वर्ष 2009 में प्रकाशित हुआ है और इस काव्य संग्रह में पचास कविताएं संगृहीत हैं। इसका ब्लर्ब केदारनाथ सिंह जैसे प्रतिष्ठित कवि द्वारा लिखा गया है।
अब तक हम सबने रमेश अनुपम सर को मुख्यतः एक गंभीर और महत्वपूर्ण आलोचक के रूप में ही जाना है, लेकिन इस काव्य संग्रह को पढ़ते हुए मैंने उनके भीतर के एक समर्थ और संवेदनशील कवि को भी ढूंढ निकाला है। इस काव्य संग्रह में संगृहीत सभी कविताओं से गुजरते हुए मुझे लगा कि उनके आलोचकीय रूप के पीछे उनकी ये संवेदनशील और महत्वपूर्ण कविताएँ किस तरह अब तक अदृश्य रह आई हैं ।
’लौटता हूं मैं तुम्हारे पास’ में संगृहीत इन कविताओं में अनुभवों और संवेदनाओं की एक विस्तृत दुनिया है। कहीं छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की मिट्टी और जीवन की गंध है, तो कहीं किसी लड़की के प्रेम पत्र की कोमलता।
कहीं एक स्त्री के दुःख और उसकी पीड़ा का मार्मिक चित्रण है, तो कहीं दूर तक फैली हुई बच्चों और वंचितों का जीवन संसार ।
इस काव्य संग्रह में बैलाडीला से लेकर दक्षिण अफ्रीका तक की अनुभव यात्रा दिखाई देती है।
काव्य संग्रह की अंतिम कविता “लौटता हूँ मैं तुम्हारे पास” आदिवासी नेता कॉमरेड लक्ष्मण झाड़ी को समर्पित है, जो इस संग्रह को एक विशेष अर्थ और गहराई प्रदान करती है। इस कविता को पढ़कर जाना की इस लंबी कविता को पढ़े बिना बस्तर को समझ पाना भी मुश्किल है।
कुल मिलाकर यह काव्य संग्रह अपने आप में एक अनोखा और उल्लेखनीय काव्य संग्रह है।
सच कहूँ तो ऐसा लगता है कि रमेश अनुपम सर ने अब तक हमें अपनी इन सुंदर और बेहद महत्वपूर्ण कविताओं से कुछ हद तक वंचित ही रखा था। हम चाहेंगे कि वे आगे भी इसी तरह लिखते रहें ताकि हमें उनकी ऐसी ही संवेदनशील और सुंदर कविताएँ पढ़ने को मिलती रहें।
उनकी कविताओं से वंचित रहना मतलब एक बेहतरीन रचना से वंचित रहना होगा।
अंत में इस काव्य संग्रह से मेरी पसंदीदा दो कविताएं यहां प्रस्तुत हैं :
“प्रेम पत्र”
जिस वक्त
पेड़
पत्तियों पर
हरि स्याही से
बादलों को
प्रेमपत्र लिख रहा होता है
ठीक
उसी वक्त
मुझे लगता है
कि मुझे भी
एक प्रेम पत्र
तुम्हें लिखना चाहिए
बहुत दिनों बाद
इस पेड़ के बहाने
अपने उदास समय के
सबसे उदास क्षण में
मैं याद करता हूं तुम्हें
मैं तुम्हारी गर्म हथेलियों को महसूस करता हूं
अपने आसपास
जिस तरह
पेड़
महसूस करता है
पृथ्वी को
अपनी जड़ों के सबसे निकट
तुम मेरे लिए
समूची पृथ्वी हो
मुझे धारण करने वाली
अजस्त्र संभावनाओं से
भरी हुई पृथ्वी
इस वक्त
मैं सचमुच
तुम्हें लिखना चाहता हूं
एक प्रेम पत्र
जिस तरह पेड़
बादलों को लिखता है
जिस तरह
हवाएं
मौसम को लिखती हैं
“कृतज्ञता”
मुझे
अनेक लोगों का
कृतज्ञ होना चाहिए
जाने – अनजाने
समय – असमय
जिन्होंने उबारा
मुझे दुख से
मेरी चिंता में
जो बिन बुलाए
दौड़े चले आए
परीक्षित – अपरिचित
ऐसे अनेक लोगों का
मुझे कृतज्ञ होना चाहिए
मुझे जिनका
कृतज्ञ होना चाहिए
उनमें से
बहुत सारे लोग
अब नहीं है
पृथ्वी पर
उनमें से
बहुतों के नाम
और चेहरे तक
मुझे याद नहीं
मेरी स्मृति के
पन्नों में
जिनका ठीक-ठीक
हुलिया तक
दर्ज नहीं
केवल धुंधले – से
कुछ प्रसंग भर
रह गए हैं याद
कि वे अच्छे लोग थे
भले और आत्मीय जन
जैसे वह हो हमारे स्वजन
जो हर किसी के
दुख में
बिना किसी प्रत्याशा के
बिन – बुलाए
दौड़े चले आते थे
ऐसे ही
भले और अच्छे
लोगों के कारण ही
बची हुई है पृथ्वी
बची हुई है
मनुष्य की प्रजाति