अंगारों की रोशनी में स्वप्न
मिट्टी की देहरी पर सिमटी-सी भोर है,
अंगारों की लौ में जीवन की डोर है।
नन्हीं हथेलियों में दिन का विस्तार,
आँखों में उजले कल का संसार है।
चूल्हे की तपन से तपते हैं सपने,
धुएँ की लकीरों में लिखे अपने।
एक ओर किताबें खुली पड़ी हैं,
दूजी ओर जिम्मेदारियाँ खड़ी हैं।
वह बालिका नहीं, संकल्प की ज्योति है,
परिस्थिति से जूझती अडिग प्रेरणा होती है।
रोटी की आँच और अक्षर का संग,
दोनों से गढ़ती जीवन का रंग।
काग़ज़ पर झुकी हुई पंक्तियाँ कहती हैं—
“मेहनत ही भाग्य की रेखा गढ़ती है।”
अंगारों के पास बैठी यह छोटी-सी आस,
सींच रही है भविष्य का विश्वास।
धुआँ भले आँखों को क्षण भर भर दे,
पर दृष्टि में स्वप्नों का आकाश ठहर दे।
धरती से उठती यह उजली उड़ान,
कल के गगन पर लिखेगी अपनी पहचान।
जहाँ साधन सीमित, पर हौसला असीम,
वहीं जन्म लेते हैं इतिहास नवीन।
अंगारों की रोशनी में जो पढ़ ले जीवन,
वही रचता है अपना स्वर्णिम सावन।
यह दृश्य नहीं, एक उद्घोष है—
संघर्ष ही सफलता का बीजरोप है।
नन्हीं सी काया, पर साहस महान,
यही है भविष्य का सच्चा विधान।
-जीतेन्द्र गिरि गोस्वामी “जीत”, छत्तीसगढ़