April 23, 2026

तस्लीमा नसरीन के साथ एक दोपहर : एयरपोर्ट से इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर तक

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2008-09 के आसपास का समय मेरे जीवन की स्मृतियों में किसी हल्का हिलता सा लेकिन गहरे जलाशय की तरह ठहरा हुआ है ऊपर से साधारण, अंदर र से असाधारण। मैं उन दिनों वाणी प्रकाशन में काम कर रहा था। कार्यालय में एक साथ कई महत्वपूर्ण परियोजनाएँ चल रही थीं, जिनमें तसलीमा नसरीन की पुस्तकों का संपादन, अनुवाद और पुनर्प्रकाशन शामिल था। उनके नाम से ही एक हल्की-सी बेचैनी, एक उत्सुकता और एक तरह का वैचारिक कंपन पूरे दफ्तर में महसूस किया जा सकता था। वे केवल एक लेखिका नहीं थीं; वे एक विवाद, एक साहस, एक निर्वासन और धर्म एवं राजनीति के सामने एक बड़ा प्रश्न बन चुकी थीं।
उनके नाम से ही एक उत्सुकता और एक तरह का वैचारिक कम्पन महसूस किया जा सकता था। तस्लीमा केवल एक लेखिका नहीं थीं; वे एक विवाद, एक साहस, अपने निर्वासन के साथ धर्म और राजनीति पर एक प्रश्न थीं।
तारीख याद नहीं इसलिए रोज की तरह साढ़े दस बजे ऑफिस पहुंचते हीं अरुण जी ने मुझे अपने केबिन में बुलाया। उनका स्वर सामान्य था, पर वाक्य असामान्य—“तसलीमा जी आ रही हैं, तुम्हें एयरपोर्ट जाना है। वहाँ से सीधे इंडिया इंटरनेशनल सेंटर पहुँचना है। उन्हें जो भी लगे, उसका ध्यान रखना।”
उन्होंने समय का हिसाब भी बताया—कितने बजे पहुँचना है, रास्ते में कितना समय लगेगा, और लगभग एक- डेढ़ बजे तक आई.आई.सी. पहुँचना होगा।
यह सुनते ही मेरे भीतर एक रोमांच दौड़ गया। मैंने उनकी किताबें पढ़ी थीं विशेषकर विवाद में रहीं थी – लज्जा…उन्हें लेकर अनेक धारणाएँ बना रखी थीं। पर किताबों में पढ़ी हुई आवाज़ से सामने बैठी हुई मनुष्य देह और उसकी आवाज़ अलग होती है। मुझे नहीं पता था कि उनसे कैसे बात करूँगा, क्या कहूँगा, क्या नहीं कहूँगा।
ड्राइवर के साथ टवेरा गाड़ी लेकर मैं एयरपोर्ट पहुँचा। एयरपोर्ट की औपचारिकताओं के बाद वे बाहर आईं—सादा, संयत, बिना किसी दिखावे के। उनके चेहरे पर हलकी थकान भी थी और एक स्थायी सावधानी भी, जैसे हर नई जगह उनके लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं होती। उनका छोटा सा ट्राली बेग रखा और गाड़ी चल पड़ी।
मैंने विनम्रता से उन्हें आगे बैठने का आग्रह किया, पर उन्होंने हल्की मुस्कान के साथ मना कर दिया और बीच कि सीट पर बैठ गईं। उस मुस्कान में दूरी भी थी और शिष्टता भी—जैसे वे किसी भी अनावश्यक निकटता से बचना चाहती हों।
अब हम दोनों एक ही गाड़ी में थे, पर दो अलग दुनियाओं में।
मैं चोरी-चोरी उन्हें देखता रहा- उनकी त्वचा, उनके बाल, उनके बालों में छुपे हुए कान, उनके हाथ, उनके कपडे, उनकी उम्र, उनका ईंट जैसे रंग का हेंड बैग। यह शायद बचकाना लगे, पर किसी प्रसिद्ध व्यक्ति को पहली बार इतने पास से देखना एक अनोखा अनुभव होता है; और हम व्यक्ति को नहीं, उसके आसपास बने मिथक को देखने लगते हैं।
गाड़ी के भीतर एक चुप्पी थी। बाहर दिल्ली का ट्रैफिक बह रहा था, भीतर समय ठहरा हुआ था। मैं सोच रहा था- क्या बात करूँ? कहां से शुरू करूँ कहीं नाराज़ न हो जाएँ? क्या पूछना उचित होगा?
आख़िर मैंने हिम्मत करके एक बचकाना सा सवाल पूछा-
“मैम, आप हिंदी बोल लेती हैं?”
उन्होंने हल्का-सा सिर हिलाया-“हाँ… लेकिन थोड़ा कम।”
बस इतना ही। फिर वही चुप्पी।
मैं अपने भीतर के डर और सम्मान के बीच झूल रहा था। तभी रेड सिग्नल पर गाड़ी रुकी। उन्होंने अचानक पूछा—
“तुम वाणी पब्लिकेशन में क्या करते हो?”
उनकी हिंदी में बांग्ला की मिठास और उच्चारण की अलग लय थी। प्रश्न साधारण था, पर उस चुप्पी को तोड़ने वाला पहला स्टेप भी था। मैंने अपने काम के बारे में बताया—संपादन, प्रूफ, समन्वय आदि। साथ साथ मैने बताया मैं कवितायें भी लिखता हूँ, वे ध्यान से सुनती रहीं, बीच-बीच में सिर हिलाती रहीं।
उनके सामने बैठा मैं केवल एक कर्मचारी नहीं था; मैं एक पाठक भी था, जिसने लज्जा पढ़ते समय अपने भीतर कई सवालों को जन्म लेते महसूस किया था। उस उपन्यास ने मुझे यह सोचना भी सिखाया था कि धर्म के नाम पर मनुष्य कितनी जल्दी क्रूर हो सकता है, और कैसे सामूहिक पहचान का भूत व्यक्तिगत नैतिकता को निगल जाती है।
उस समय मेरी समझ अपरिपक्व थी। मुझे लगता था कि कट्टरता कुछ विशेष धर्मों में अधिक होती है और कुछ में कम। मैं समझता था हिन्दू मुसलमानो से धर्म के नाम पर कम कट्टर होते हैं- पर समय के साथ, अनुभवों के साथ, यह भ्रम टूट गया। मैंने देखा कि जब धर्म पहचान बन जाता है और यह जब राजनीति जुड़ती है, तो कट्टरता का अनुपात सब जगह लगभग समान हो जाता है। उसमें न विवेक बचता है, न करुणा, न भविष्य की चिंता, न सोच न इंसानियत…केवल भय के पिलरों पर टिकी होती है प्रभुत्व की भूख।
तसलीमा नसरीन की लेखनी इसी भय के विरुद्ध खड़ी होती है। उन्होंने मुस्लिम समाज के भीतर मौजूद कट्टरपंथ की आलोचना की, पर उनकी मूल चिंता किसी एक धर्म से नहीं, बल्कि उस मानसिकता से थी जो मनुष्य को मनुष्य से अलग कर देती है। लज्जा में उन्होंने जिस तरह एक हिंदू परिवार पर हुए अत्याचारों को चित्रित किया, वह केवल एक घटना का वर्णन नहीं था; वह यह दिखाने का प्रयास था कि भीड़ जब धार्मिक जुलूस में बदल जाती है तो उसका चेहरा सभी समुदाय में एकसा हीं होता है।

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर पहुँचने तक हम कुछ औपचारिक बातें कर चुके थे, पर असली संवाद मौन में ही हुआ। मुझे पहली बार एहसास हुआ कि एक लेखक, जिसे हम विवादों में देखते हैं, दरअसल भीतर से अत्यंत अकेला भी हो सकता है। निर्वासन केवल भौगोलिक नहीं; वह भावनात्मक और सांस्कृतिक भी होता है। अपनी भाषा, अपना शहर, अपने लोग, अपना घर, सब पीछे छूट जाने पर व्यक्ति दुनिया में कहीं भी पूरी तरह अपना नहीं रह जाता।
इंडिया इंटरनेशनल सेंटर का परिसर हमेशा की तरह शांत, सुव्यवस्थित, सुसंस्कृत आवा-जाही से भरा…और कुछ हद तक आत्ममुग्ध-सा लगा जैसे यहाँ का समय और समाज भी धीमे कदमों से चलता है ।
मैंने रिसेप्शन पर जाकर पूछा, “वाणी का टेबल कहाँ लगा है?” वहाँ बैठे कर्मचारी ने विनम्रता से दिशा बताई—लॉन की ओर, दाईं तरफ, जहाँ एक पुस्तक प्रदर्शनी के स्पोस्टर लगे थे।
हम उस दिशा में चल पड़े। उनके कदम धीमे लेकिन स्थिर थे। वे चारों ओर देख रही थीं—जैसे हर नई जगह को पहले अपने भीतर दर्ज कर लेना चाहती हों। वहाँ पहुँचकर उन्होंने अपना ईंट-रंग का बैग टेबल पर रखा और मुझसे कुछ कहे बिना सांयत कदमो से फ्रेश होने के लिए अंदर चली गईं।
मैं वहीं कुर्सी पर बैठ गया। अचानक मुझे एहसास हुआ कि अब मेरे पास करने को कुछ नहीं है—सिवाय इंतज़ार के। मैंने तुरंत अरुण जी को फोन करके बताया कि हम आई.आई.सी. पहुँच चुके हैं। उधर से उनका संक्षिप्त निर्देश आया—“खाने-पीने का पूछ लेना।”
यह सुनकर मुझे लगा कि मेरी जिम्मेदारी अभी खत्म नहीं हुई है; बल्कि अब वह अधिक सूक्ष्म हो गई है। किसी अतिथि से पूछना कि “आप कुछ लेंगी?”- यह साधारण वाक्य है, पर सही लहजे में कहना एक कला है।
कुछ देर बाद वे वापस आईं। चेहरा धोकर आई थीं—ताजगी थी, पर ऐसा लगता था कि उनके चेहरे से कुछ भावों के टुकड़े कहीं खो गए है। उन्होंने बैग के पास बैठते हुए चारों ओर एक नज़र डाली, जैसे स्थान का आकलन कर रही हों।
मैंने हिम्मत जुटाकर पूछा—
“आप कुछ लेंगी?”
तभी एक वेटर वहाँ आ गया। शायद अरुण जी ने पहले से फ़ोन पर व्यवस्था कर दी थी कि उनका ध्यान रखा जाए। वेटर ने झुककर औपचारिक स्वर में पूछा—“मैम, क्या लेंगे आप?”
उन्होंने सीधे उससे पूछा—
“वाइन कौन-सा है?”
उनका प्रश्न बिल्कुल सहज था, बिना किसी दिखावे या संकोच के। जैसे यह उनके लिए सामान्य बात हो। वेटर ने सूची बताई—रेड, व्हाइट, फ्रेंच, इटैलियन… मुझे ठीक-ठीक याद नहीं, पर उसके स्वर में होटल-प्रशिक्षित विनम्रता थी।
उन्होंने थोड़ी देर सोचा, फिर एक वाइन का नाम लिया- संभवतः फ्रेंच रेड।
उन्होंने वेटर की ओर देखकर पूछा-
“नॉन-वेज में क्या है?”
वेटर ने विनम्रता से कुछ नाम गिनाए—चिकन की अलग-अलग डिशें, मटन के विकल्प। उन्होंने बीच में ही रोककर कहा—
“मटन चाप ले आओ।”
यह आदेश भी नहीं था, आग्रह भी नहीं-बस एक सहज निर्णय।
कुछ ही देर में वाइन की बोतल और दो ग्लास आ गए – पतले, पारदर्शी, उन्होंने बोतल को हाथ में लिया, हल्का-सा घुमाया, एक क्षण देखा, फिर ग्लास में डाल लिया…वाइन डालते हीं जिसमें गहरा लाल रंग, वाइन के लाल रंग की हीं तरह चमक रहा था। मेरे से पूछा आप लेंगे? मैंने मुस्कुराते हुए मना किया.… लेकिन अनसुना सा करते हुए दूसरे ग्लास में मुझे वाइन डी…..गेस्चर ऐसा था जैसे किसी औपचारिक दूरी को वे खुद ही तोड़ देना चाहती हों। अब मना करना लगभग असंभव था। इसके बाद उन्होंनेर बहुत छोटे घूँट में चखा। उनके चेहरे पर कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं आई- जैसे स्वाद से अधिक यह एक आदत या एक रिलेक्स का क्षण हो।
उसके पीछे-पीछे मटन चाप की प्लेट भी आ गई- गर्म, मसालों की गंध से भरी, हल्की भाप उठती हुई। उस सुगंध में रेस्तराँ की औपचारिकता नहीं,भारी, ठोस खुशबू थी।
उन्होंने प्लेट की ओर देखा, फिर मेरी तरफ-
“लो, तुम ।”
मैंने संकोच सहित एक छोटी प्लेट में मटन चाप के दो टुकड़े उठा लिए- इतने कि न लेना भी न लगे और ज़्यादा लेना भी न लगे। उस क्षण मुझे अपनी ही झिझक पर हल्की हँसी आई- एक वयस्क व्यक्ति होकर भी मैं किसी स्कूल के बच्चे की तरह व्यवहार कर रहा था।
उन्होंने बहुत धीरे-धीरे खाना शुरू किया—छोटे कौर, बिना जल्दबाज़ी के। बीच-बीच में वाइन का घूँट। उनके खाने में भी वही संयम था जो उनके व्यवहार में था- न भूख का प्रदर्शन, न दिखावटी संकोच।
मैंने अपना ग्लास बहुत जल्दी हीं लगभग खाली कर दिया- शायद भीतर की घबराहट को ढकने के लिए। पर गले में एक भीनी सी महक उतर गई, जैसे मुझे याद दिला रही हो कि यह एक असाधारण दिन है।
जो आज भी कहीं भीतर सुरक्षित है।
उस समय मुझे पहली बार समझ आया कि सार्वजनिक जीवन जीने वाले लोग लगातार सतर्क रहते हैं। उनका हर हावभाव देखा जाता है, पर वे स्वयं अपने भीतर एक निजी जगह बनाए रखते हैं, जहाँ कोई और प्रवेश नहीं कर सकता। प्रवेश कर ले तो अनुशाषित होना जरूरी है….
मैं बीच-बीच में उनकी ओर देख लेता, फिर नजरें हटा लेता। अब झिझक कम हो गई थी, पर संवाद अभी भी सीमित था। मैंने महसूस किया कि उन्हें अनावश्यक बातचीत पसंद नहीं; वे शांत रहकर आसपास को देखना अधिक पसंद करती हैं।
वाइन का ग्लास धीरे-धीरे खाली हो रहा था। वे उसे जल्दी खत्म करने की कोशिश नहीं कर रही थीं—हर घूँट के बीच लंबा अंतराल था, जैसे वे समय को थोड़ा खींच लेना चाहती हों।
तभी फोन बजा—अरुण जी का कॉल।
“सुनो, 10-12 कुर्सियाँ लगवा लो,” उन्होंने कहा, “विष्णु नगर, राजेंद्र यादव, मंगलेश डबराल, अरुण प्रकाश, उदय , मंडलोई आ रहे हैं।”
मैंने “जी” कहा और तुरंत उठ खड़ा हुआ। अब दृश्य बदलने वाला था- एक निजी-सा क्षण अचानक सार्वजनिक होने जा रहा था।
मैंने स्टाफ से कुर्सियाँ लगवानी शुरू कीं। टेबल के आसपास उस हिस्से में गोल घेरा बनाया गया—जैसे किसी अनौपचारिक गोष्ठी का मंच तैयार हो रहा हो। कुर्सियाँ लगते-लगते मुझे एहसास हुआ कि अभी-अभी मैं जिस शांत, लगभग निजी वातावरण में बैठा था, वह अब हिंदी साहित्य के एक छोटे से इतिहास में बदलने वाला है।
कुछ देर बाद अरुण जी भी आ गए। उन्होंने आते ही धीरे से पूछा- “सब ठीक रहा?” मैंने सिर हिलाया।
कुछ ही देर में लोग आने लगे– एक-एक करके, फिर लगभग एक साथ। किसी के हाथ में किताब, किसी के कंधे पर झोला, किसी के चेहरे पर हल्की मुस्कान, किसी पर गंभीरता की स्थायी छाया।
नाम मैं सुनता गया—विष्णु नगर, राजेंद्र यादव, मंगलेश डबराल, अरुण प्रकाश, उदय जी… और भी लोग। उस समय मैं उन्हें पहचानने की कोशिश कर रहा था, पर सच यह है कि चेहरों से अधिक वातावरण याद रहा। जैसे अलग-अलग दिशाओं से आए शब्द एक जगह जमा हो रहे हों।
वे सब उनके आसपास बैठ गए। बातचीत शुरू हुई- पहलेसामान्य , फिर धीरे-धीरे खुलती हुई। साहित्य, राजनीति, निर्वासन, भाषा, प्रकाशन- विषय बदलते रहे। बीच-बीच में हल्की हँसी भी, कुछ गंभीर विराम भी।
राजेंद्र यादव जी ने लगभग अगुआई करते हुए अरुण जी से कहा – अरुण बियर मांगवाओ….
अरुण जी ने मुस्कुरा कर कहा- आ रहा है…
उनके कहते ही बियर के ग्लास और बोतलों के साथ दो बैटर आ चुके थे…
मैं थोड़ी दूरी पर खड़ा रहा, न पूरी तरह शामिल, न पूरी तरह बाहर। मेरी भूमिका आयोजकीय थी, पर अब मैंने अपनी स्थिति एक श्रोता की बना ली थी। उस दिन मुझे पहली बार महसूस हुआ कि लेखक जब एक साथ बैठते हैं तो वे केवल व्यक्ति नहीं रहते, वे अपने-अपने विचारो का एक झुण्ड या कहूं शहर साथ लाते हैं।
तसलीमा जी अब पहले से अधिक सहज दिख रही थीं। शायद कुछ परिचित चेहरे, शायद समान वैचारिक जमीन या शायद वाइन का असर। वे बोलते समय हाथों से बहुत कम इशारे करती थीं, पर आँखों में तीखापन था। जब कोई गंभीर बात कहतीं तो हल्का सा आगे झुकतीं, जैसे शब्दों को अधिक स्पष्ट बनाना चाहती हों।
कुछ लोग अत्यधिक उत्साहित थे, कुछ औपचारिक, कुछ जिज्ञासु। वे सबको एक संयमित मुस्कान से उत्तर देतीं- ँ ँ न अधिक गर्मजोशी, न दूरी।
मैं बीच-बीच में चेहरों को याद रखने की कोशिश करता, पर इतने नामों को एक साथ पहली बार देखना जैसे किसी छात्र के लिए विश्वविद्यालय के पहले दिन जैसा होता है—उत्साह भी, संकोच भी, और हल्की-सी अस्थिरता भी।
सच कहूँ तो आज सब चेहरे याद नहीं हैं। कुछ नाम स्मृति में टिके हुए हैं, कुछ धुँधले हो गए, और कुछ बिल्कुल गायब। जैसे समय ने उस दृश्य को धीरे-धीरे मिटा दिया हो, पर उसकी भावनात्मक लकीरें बची रहने दी होँ ।
मुझे बस इतना याद है कि वहाँ शब्दों और लेखकों का एक घेरा बना था—और उसके केंद्र में बैठी एक निर्वासित लेखिका, जिसे सुनने या बातचीत करने के लिए हिंदी के महत्वपूर्ण लेखक इकट्ठा हुए थे। यह दृश्य अपने आप में प्रतीकात्मक था—भाषाएँ अलग, देश अलग, पर चिंता एक ही: मनुष्य और उसकी स्वतंत्रता।
महसूस किया कि साहित्य केवल किताबों में नहीं होता; वह ऐसे ही अनौपचारिक मिलन में भी जीवित रहता है, जहाँ विचार चाय, वाइन और खुली हवा में धीरे-धीरे आकार लेते हैं।
कुछ देर बाद मैं लगभग पृष्ठभूमि का हिस्सा बन गया- कुर्सियाँ ठीक करना, पानी का इंतज़ाम, किसी को उसकी पसंद खा खाना मंगवाना….किसी को दिशा बताना। लेकिन भीतर एक शांत गर्व भी था कि मैं उस दोपहर का साक्षी हूँ।
अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है—वह दृश्य किसी फ़ोटो की तरह नहीं, बल्कि किसी पुरानौ फिल्म की रील की तरह याद है: थोड़ी धुँधली, थोड़ी काँपती हुई, पर अर्थ से भरी।
शायद स्मृति का यही स्वभाव है—वह चेहरों को जल्दी मिटा देती है, पर अनुभव को लम्बे समय तक रखती है । उस दिन के शब्द, आवाज़ें, वातावरण और वह अनकहा भाव आज मेरे भीतर फिर वही पुराना विचार कौंधा—लज्जा का लेखक होना क्या होता है? एक ऐसी किताब लिखना, जिसके कारण आपको अपना देश छोड़ना पड़े, लगातार सुरक्षा के बीच रहना पड़े, और हर नई जगह पर अपने अस्तित्व की वैधता साबित करनी पड़े।
फिर भी, उनके चेहरे पर कोई शिकायत नहीं थी। केवल एक शांत दृढ़ता—जैसे उन्होंने अपने इस निर्णय को चुन लिया हो।
उनके चेहरे पर एक अजीब-सी द्वैत भावना थी—जैसे वे भीड़ में उपस्थित हैं, पर पूरी तरह उसमें शामिल नहीं हैं। निर्वासन शायद यही करता है—आप जहाँ भी हों, थोड़ा बाहर ही रहते हैं।
मुझे याद है, उस दोपहर आई.आई.सी. के लॉन में हल्की हवा चल रही थी। पेड़ों की छाया जमीन पर हिल रही थी। कुछ दूर भारी सफ़ेद चाय के कपों की खनक, धीमी बातचीत, और बीच-बीच में कैमरे की क्लिक की आवाज़ें और उस सबके बीच बैठी एक निर्वासित लेखिका- जिसने शब्दों के कारण अपना घर खोया, अपने लोग, अपना शहर, लेकिन आज शब्द ही उसका घर बन गए।
उस दिन मैंने समझा कि साहस कभी शोर नहीं करता। कभी-कभी वह एक शांत स्त्री के रूप में सामने बैठा होता है, जो भीड़ के बीच भी अपने भीतर अकेली रहती है, और फिर भी दुनिया से संवाद करना बंद नहीं करती।
मैं बाद में वहाँ से निकला, तो लगा कि यह केवल एक ड्यूटी नहीं थी; यह एक अनुभव था- एक ऐसी मुलाक़ात, जिसने मेरे भीतर लेखक, मनुष्य और समाज के रिश्तों को नए ढंग से देखने की दृष्टि दी। मेरी भूमिका वहीं समाप्त हो गई, पर अनुभव और विचार भी शुरू हुआ।और शायद यही किसी बडे व्यक्तित्व से मिलने का असली अर्थ होता है आप उसके बारे में कम, अपने बारे में अधिक जानकर लौटते हैं।
तसलीमा नसरीन का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि उन्होंने कट्टरपंथ की आलोचना की; बल्कि इस बात में है कि उन्होंने यह जोखिम उठाया कि सच बोलने की कीमत निर्वासन, धमकी और अकेलापन भी हो सकती है। वे जानती थीं कि उनके शब्दों से बहुत लोग असहमत होंगे, कुछ नफ़रत भी करेंगे, पर उन्होंने चुप रहने का विकल्प नहीं चुना।
उनकी आलोचना को अक्सर “मुस्लिम विरोध” कहकर सीमित कर दिया जाता है, जबकि उनकी चिंता व्यापक है, धर्म जब सत्ता का औज़ार बन जाता है, तब वह मानवता को बहुत तेजी से क्षति पहुंचना शुरू करता है। चाहे वह किसी भी धर्म के नाम पर हो। हिन्दू ईसाई य इस्लाम…
धर्म अपने मूल में करुणा, अनुशासन और नियम का मार्ग हो सकता है, पर जब वह धार्मिक पहचान का मोटी दीवारों वाला किला बन जाता है तो करुणा, विवेक, समझ, दूरदृष्टि, नवाचार, भाईचारे जैसे मूल्यों को संकीर्णता के पत्थरों में कुचल देता है। तसलीमा बार-बार इसी बात पर ज़ोर देती हैं कि मनुष्य पहले मनुष्य है, बाद में कुछ और। यदि धर्म मनुष्य को बाँटता है, तो उसकी समीक्षा आवश्यक है। वे हिंदी लेखकों से क़ह रहीं थी हमें अपने धर्म की समीक्षा करना होगी..
उनकी लेखनी में आक्रोश भी है, पीड़ा भी, और एक जिद्दी उम्मीद भी कि दुनिया अधिक मानवीय हो सकती है। वे हिंसा का प्रतिशोध हिंसा से नहीं, बल्कि विचार से करती हैं। वे कहती हैं कि नफ़रत का उत्तर साहसिक सत्य और मानवीय संवेदना है।
बियर पीते अधिकांश लेखकों के बीच उनकी बातें सुन रहा था….
उस दिन की मुलाक़ात ने मुझे यह भी सिखाया कि प्रसिद्धि के पीछे एक साधारण मनुष्य होता है- लड़ता हुआ, सतर्क, कभी-कभी असुरक्षित, पर भीतर से दृढ़। उनकी शांत उपस्थिति में कोई नाटकीयता नहीं थी; वे चिल्लाकर नहीं लड़ती हैं।
बहुत बाद में समय के साथ मुझे समझ आया कि कट्टरता का असली विरोध किसी एक धर्म की आलोचना नहीं, बल्कि उस समाज में फैली सोच का प्रतिरोध है जो हर धर्म में है और प्रश्न पूछने से डरती है। प्रश्न ही स्वतंत्रता का पहला कदम है। तसलीमा ने वही प्रश्न पूछा था । इस प्रश्न के साथ वे हिंदी लेखकों के सामने थीं… और शायद यही उनका सबसे बड़ा “अपराध” भी माना गया।
आज दुनिया पहचान की राजनीति, धार्मिक ध्रुवीकरण और वैचारिक शोर से भरी हुई है, तब वे याद दिलाती हैं कि मानवता किसी एक समुदाय की संपत्ति नहीं; वह साझा विरासत है। यदि हम उसे खो देंगे, तो जीत किसी की नहीं होगी।
आई.आई.सी. के उस दोपहर से लेकर आज तक, जब भी मैं लज्जा या उनकी अन्य रचनाओं के बारे में सोचता हूँ, मुझे वह शांत गाड़ी टवेरा की -यात्रा याद आती है, दो लोग, एक शहर, और बीच में एक अदृश्य संवाद। वह संवाद शब्दों में कम, अनुभव में अधिक था।
तसलीमा नसरीन ने केवल मुस्लिम कट्टरपंथ की निंदा नहीं की; उन्होंने हर प्रकार की असहिष्णुता को चुनौती दी। उनका संदेश सरल पर कठिन है- मनुष्य को धर्म से ऊपर रखो, सत्ता से ऊपर रखो, डर और भय से ऊपर रखो। प्रेम, शांति और सहअस्तित्व कोई आदर्शवादी कल्पना नहीं, बल्कि इस धरती की जरूरत है।
शायद इसी कारण वे विवादों के बावजूद पढ़ी जाती हैं, सराही जाती हैं, और नफ़रत भी झेलती हैं। क्योंकि सच को कुछ हिस्सा असुविधाजनक भी होता है, और असुविधाजनक सच ही परिवर्तन का बीज है।
उस दिन मैं केवल उन्हें एयरपोर्ट से लेने गया था, पर लौटते समय मेरे भीतर कई पुराने विचार उतर चुके थे और कई नए प्रश्न जन्म ले चुके थे। यही किसी बड़े लेखक की असली शक्ति होती है—वह हमें उत्तर नहीं, प्रश्न देकर जाता है।
और शायद मानवता की यात्रा भी इन्हीं प्रश्नों से आगे बढ़ती है।

रविन्द्र स्वप्निल प्रजापति

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