युद्ध और कविता
– चंद्रेश्वर
युद्ध के बारे में मेरा अभिमत एकदम स्पष्ट है। यह पूरे विश्व और विशेष रूप से भारत वर्ष में भी मानव सभ्यता के उत्थान-पतन के दीर्घकालिक दौर में हमेशा समस्याओं के समाधान के लिए अंतिम विकल्प के रूप में ही देखा जाता है। आप याद कीजिए वेद व्यास के ‘महाभारत’ के श्रीकृष्ण को जो कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध को टालने के लिए हस्तिनापुर में दुर्योधन के पास जाते हैं। वे युद्ध को टालने के लिए उससे बहुत अनुनय-विनय करते हैं। पर उनकी एक भी बात या प्रस्ताव को गंभीरता से नहीं लिया जाता है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपने खंड काव्य ‘रश्मिरथी’ में इस प्रसंग का बहुत दिलचस्प और सशक्त वर्णन किया है। वे पांडवों के लिए सिर्फ़ पांच गांव मांगते हैं -“दे दो केवल पांच ग्राम,रख लो अपनी धरती तमाम। दुर्योधन वह भी दे न सका,उल्टे हरि को बांधने चला। जो था असाध्य उसको साधने चला।” जब दुर्योधन अपनी ज़िद, कट्टरता और अहंकार के वशीभूत होकर विवेक शून्यता का परिचय प्रस्तुत करता है तो श्रीकृष्ण अंततः क्रोधित होकर कहते हैं – “याचना नहीं अब रण होगा, जीवन जय या कि मरण होगा।” फिर श्रीकृष्ण युद्ध का बहुत ही वीभत्स और भयावह चित्र प्रस्तुत करते हैं। दरअसल ‘महाभारत’ के श्रीकृष्ण की जो कूटनीति या नीति है युद्ध को लेकर वही हमारी परंपरा रही है। भारत के बारे में प्राचीन काल से ही यह देखने को मिलता है कि यहां के शासक आक्रांता नहीं रहे कभी। कभी किसी देश पर हमला नहीं किया। हमारी नीति कभी भी विस्तारवादी या साम्राज्यवादी नहीं रही है। ‘रामायण’ में भी राम रावण की लंका पर तब हमला करते हैं जब उनकी जीवन संगिनी सीता को रावण ‘पंचवटी’ से अपहरण कर लंका ले जाता है। इसी बहाने राम एक ऐसे अत्याचारी और अन्यायी का वध करते हैं जो पूरी पृथ्वी के लिए संकट बना हुआ था। इस तरह आप देख सकते हैं कि राम और कृष्ण युद्ध के लिए तब उद्यत होते हैं जब वह अवश्यंभावी हो जाता है। आप कह सकते हैं कि जब विनयशीलता बेअसर हो जाती है तब तब मर्यादा पुरुषोत्तम राम धनुष -बाण उठाते हैं। गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं कि ‘बिनु भय होहिं न प्रीति।’ हमारे पौराणिक आख्यानों में युद्ध जब-जब हुए धर्म की पुनर्स्थापना हुई। व्यापक लोक का मंगल हुआ। हिन्दी में जो हज़ार साल से भी ज़्यादा की काव्य लेखन की महिमामयी परंपरा रही है, उसमें युद्ध को लेकर हमेशा कवियों ने काव्य की रचना की है । ‘पृथ्वीराज रासो’,’परमाल रासो’ से लेकर आजतक की कविताओं में युद्ध को लेकर बहुत कुछ लिखा गया है। ‘पृथ्वीराज रासो’ के कवि चंदवरदाई के बारे में तो कहा जाता है कि वे अपने राजा पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध भूमि में भी जाते थे। सामंती समय में जब हर राजा के अपने-अपने दरबारी कवि हुआ करते थे। वे कवि राजाओं की वीरता और पराक्रम का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया करते थे। मध्यकाल तक यह परंपरा देखने को मिलती है। जब पूरी दुनिया में,हर भाषा में नवजागरण के प्रभाव से आधुनिक चेतना का प्रचार-प्रसार हुआ तो कवियों ने युद्ध विरोधी कविताएं ज़्यादा लिखीं। हिन्दी में निराला की एक लंबी कविता है -‘राम की शक्ति पूजा ‘। इस कविता में राम रावण से युद्ध को लेकर सशंकित हैं-“रह -रह उठता जग जीवन में रावण जय भय।” निराला के सशंकित राम को भल्लपति जाम्बवान परामर्श देते हुए कहते हैं -“छोड़ दो समर जबतक सिद्धि न हो रघुनंदन।”
आगे चलकर नयी कविता के एक प्रमुख कवि नरेश मेहता का खंडकाव्य सामने आता है -“संशय की एक रात”। नरेश मेहता के राम रावण से युद्ध ही नहीं करना चाहते हैं। वे कहते हैं कि इससे जन-धन की हानि होगी। नयी कविता के एक प्रतिनिधि कवि शमशेर बहादुर सिंह की लंबी कविता है -“अमन का राग”। हिन्दी में आधुनिक और समकालीन कवियों में ज़्यादातर ने जो कविताएं लिखी हैं,वे युद्ध के विरोध में ही रही हैं। हिन्दी में कविता लेखन की मुख्य रूप से दो धाराएं देखने को मिलती हैं। एक धारा है मंचीय कवियों की तो दूसरी धारा है साहित्यिक कवियों की। इनमें मंचीय कवियों के यहां युद्ध को लेकर ललकार की ओजस्वी कविताएं लिखी जाती रही हैं। ऐसी कविताएं वास्तविकता से दूर होती हैं। फिर भी आम जन ऐसी कविताएं सुनकर ही ताली बजाते हैं और उत्तेजना से भर जाते हैं। दूसरी ओर साहित्यिक धारा के कवियों की कविताओं में, उनकी युद्ध विरोधी कविताओं में एक बौद्धिक संश्लिष्टता होती है जिसे समझने के लिए आम पाठक को अपना दिमाग़ कुछ ज़्यादा लगाना पड़ता है। हिन्दी में इस धारा के कवि विश्व मानवता को ध्यान में रखते हैं। उनके यहां राष्ट्रवादी होना ही संकुचित होना है। नोबेल पुरस्कार विजेता कवि गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर ने भी संकीर्ण राष्ट्रवाद को विभाजनकारी माना है। वे भी विश्व मानवता के हित को लेकर ही आगे बढ़ते हैं। वे कहते हैं कि ‘मानवता के ऊपर मैं देशभक्ति की जीत नहीं होने दूंगा।’
बहरहाल, भारतीय सभ्यता और संस्कृति में भी प्रारंभ से ही युद्ध को अंतिम विकल्प के रूप में देखा जाता रहा है। अभी पूरी दुनिया में पूंजीवाद एक गहरे संकट के दौर से गुज़र रहा है। इन पूंजीवादी अगुआ देशों में जो सत्ताएं हैं वो पूरी दुनिया में ख़ुद को सुरक्षित रखते हुए तीसरी दुनिया के देशों को लड़ाना चाहती रही हैं; ताकि वे हथियार बेचकर मुनाफा कमा सकें। भारत की वर्तमान सरकार भी युद्ध नहीं चाहती है, मगर उसके सामने बार-बार मुश्किलें खड़ी की जाती हैं। पाकिस्तान अगर पश्चिमी देशों और अमेरिका – चीन की शह पर भारत में आतंकवादी हमले न कराए तो दोनों देशों के बीच युद्ध की संभावना अथवा विषम परिस्थितियां ही न पैदा हों।
इसी तरह वर्तमान में ईरान पर इज़राइल और अमेरिका ने युद्ध थोपकर पूरी दुनिया को संकट में डाल दिया है। ईरान अपने स्वाभिमान और अस्तित्व की रक्षा के लिए लड़ रहा है। अगर वह न लड़े तो नव साम्राज्यवादी शक्तियां उसे नख- दंत विहीन बनाकर गुलाम बना दें। आज की दुनिया को डोनाल्ड ट्रंप और नेतन्याहू जैसे शासकों ने एक अंधेरी सुरंग की तरफ़ ढकेल दिया है। मुझे हिन्दी कवि निराला की काव्य पंक्तियां याद आती हैं -” गहन है यह अंधकारा। स्वार्थ के अवगुंठनों से हुआ है लुंठन हमारा। घिरी है दीवार जड़ की घेरकर। बोलते हैं लोग ज्यों मुंह फेरकर। इस गगन में नहीं दिनकर दिनकर, नहीं शशधर, नहीं तारा।” आज की दुनिया के आसमान में न कोई सूर्य दिखाई देता है, न ही चांद,न ही कोई तारा। वैसे
पंजाबी कवि अवतार सिंह पाश अपनी एक स्वरचित कविता में लिखते हैं कि ‘युद्ध इश्क़ के शिखर का नाम है/युद्ध लहू से मोह का नाम है/युद्ध जीने की गर्मी का नाम है/युद्ध कोमल हसरतों के मालिक होने का नाम है/युद्ध शांति की शुरुआत का नाम है। युद्ध यारी के लिए बढ़ा हुआ हाथ है।’ पाश के ही समकालीन और उनके दोस्त एक हिन्दी कवि आलोक धन्वा अपनी कविता में लिखते हैं -जब भगतसिंह/फांसी के तख्ते की ओर बढ़े/तो अहिंसा ही थी /उनका सबसे मुश्किल सरोकार/अगर उन्हें कबूल होता/युद्ध सरदारों का न्याय/तो वे भी जीवित रह लेते/बर्दाश्त कर लेते/ धीरे-धीरे रोज़ उजड़ते और मरते हुए/ लाहौर की तरह।’
पाश और आलोक धन्वा पंजाबी और हिन्दी में समकालीन कविता के प्रतिनिधि स्वर हैं। इनकी कविताओं में युद्ध और शांति,हिंसा और अहिंसा के सम्बन्ध में एक सम्यक् भारतीयता के स्वर को साफ़-साफ़ सुना जा सकता है।
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