April 23, 2026

छत्तीसगढ़ी हास्य के भूले बिसरे बादशाह-” उधोराम झखमार”

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साहिर लुधियानवी की एक प्रसिद्ध रचना है कि मैं पल दो पल का शायर हूँ, पल दो पल मेरी कहानी है, पल दो पल मेरी हस्ती है, पल दो पल मेरी जवानी है। शायद शायर यही कहना चाहता है कि हस्ती कितनी भी बड़ी हो एक न एक दिन मिट ही जाएगी। व्यक्ति कितना भी बड़ा हो, चाहे राजा हो या रंक सबको कभी न कभी मिटना ही है। फिर जब मिटना ही है तो बचा क्या? यादें और क्या? ” आदमी मुसाफिर है आता है जाता है, आते – जाते रस्ते में यादें छोड़ जाता है। ” यह सुमधुर फिल्मी गीत केवल गीत नहीं बल्कि जीवन का सत्य है।
तो चलिए आज 19 मार्च पुण्य तिथि पर याद करते हैं छत्तीसगढ़ी हास्य के एक ऐसे बादशाह को जो आज भी अपने चाहने वालों की दिलों में राज करते हैं, अपने समकालीनों के दिलों में बसते हैं पर दुर्भाग्य से नई पीढ़ी जिनका नाम तक नहीं जानती।
जीं हाँ। मैं बात कर रहा हूँ उधोराम झखमार जी की। श्रोतागण उनकी कविता तो छोड़ो पहले उनका नाम सुनकर ही ठहाके लगाते थे। वैसे तो झखमार शब्द का आशय व्यर्थ समय नष्ट करने वालों से है पर जिस झखमार की चर्चा मैं कर रहा हूँ वह व्यर्थ में समय नष्ट करने वाले नहीं बल्कि समय का सदुपयोग कर छत्तीसगढ़ के लोक जीवन से चुन चुनकर हास्य निकालकर श्रोताओं को खूब हँसाते थे। मंच पर उनकी उपस्थिति ही कवि सम्मेलन के सफलता की गारंटी होती थी।
उधोराम झखमार जी का जन्म पैरी नदी के पावन तट पर अवस्थित चतुर्भुज सिरकट्टी धाम के पूर्व दिशा में स्थित ग्राम पांडुका में 12 नवम्बर 1935 को हुआ था। पांडुका को महेश योगी जी की जन्मस्थली होने का और छत्तीसगढ़ के प्रयाग राजिम को देवभोग से जोड़ने का भी गौरव प्राप्त है। झखमार जी पांडुका में जन्मे, पले-बढ़े और मिडिल स्कूल तक शिक्षा प्राप्त कर स्कूल मास्टर हो गए मगर उन्हें टेलर मास्टर का काम इतना पसंद आया कि उन्होंने स्कूल की मास्टरी छोड़ दी और छोड़े भी क्यों नहीं उन्हें स्कूल शिक्षक बनने के बजाय लोकशिक्षक जो बनना था।
एक ओर वे अपनी कविता की माध्यम से राजनीति, प्रशासन और समाज की नग्नता को उघाड़ते थे तो दूसरी ओर कपड़े सिलकर तन की नग्नता को ढांपते भी थे। वे अपने समय के लोकप्रिय मंचीय कवि थे। उन्होंने अपनी नैसर्गिक प्रतिभा को नारायण लाल परमार जी जैसे ख्यातिलब्ध साहित्यकार के सानिध्य में और परिष्कृत और परिमार्जित किया।
अपने समकालीन सभी कवियों के साथ मंच पर अपनी दमदार उपस्थिति से अपना सिक्का जमाकर मंच लूटने वाले जनप्रिय कवि झखमार जी हर दिल अजीज थे और लोकप्रियता के शिखर पर थे।
गंवइहा हीरो, मोर रेडियो बइहा होगे, बनवास झन जाबे, कौमी एकता, भगवान अउ चोर, जेठ के ठड़ीयाय घाम, पाप के कांवर, छत्तीसगढ़ी कुण्डलिया, किसबीन मंहगाई , बेंदरा बांट, का जानन, कांटा, झींको-पुदगो, गीत पैरोडी, अंधरा हे दरपन, गुरु दक्षिणा, गणपति वंदना, भूत पुराण जैसी उनकी कविताएं श्रोताओं का केवल मनोरंजन नहीं करती थी बल्कि विसंगतियों और विद्रूपताओं पर गहरी चोंट भी करती थी। हास्य व्यंग्य का यह चितेरा कवि 19 मार्च 1993 को इस दुनिया को यह गाते हुए छोड़ गया कि एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल, जग में रह जाएंगे प्यारे तेरे बोल और सचमुच आज तक उनके बोल छत्तीसगढ़ी साहित्य की दुनिया में गूंज रहे हैं।
उनके जीवनकाल में तो उनकी कोई कविता संग्रह प्रकाशित नहीं हो पाई थी मगर उनके देहावसान के बाद परमार जी के सहयोग से प्रांतीय छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति के माध्यम से सुशील यदु जी के सम्पादन में 2001 में ररूहा सपनाय दार भात शीर्षक से काव्य संग्रह का प्रकाशन हुआ है।
आज 19 मार्च को उनकी पुण्य तिथि के अवसर पर उन्हें सादर नमन। विनम्र श्रद्धांजलि।
वीरेन्द्र सरल
बोड़रा ( मगरलोड )
जिला-धमतरीं ( छत्तीसगढ़ )

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