सिंहाधुर्वा पहाड़ी की रोमांचक यात्रा : चाँदादाई गोंड गुफा तक
महासमुंद जिले के सिरपुर से लगभग पंद्रह किलोमीटर आगे घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच सिंहाधुर्वा पहाड़ी स्थित है। इस पहाड़ी के ऊपर एक ऐतिहासिक गुफा है जिसे ग्रामीण अलग-अलग नामों से जानते हैं। चाँदादाई गोंड गुफा, कटंगा खोल, सिंघनगढ़ पहाड़ी पाड़ादाह।
रविवार को दो मित्रों के साथ मुझे इस गुफा तक जाने का अवसर मिला। यह यात्रा बेहद कठिन, जोखिम भरी लेकिन उतनी ही रोमांचक भी रही। सच कहूं तो यदि आपकी उम्र चालीस के पार है, तो वहां जाने से पहले दो बार सोच लीजिये। यह मेरी व्यक्तिगत सलाह है।
इतिहास और मान्यताओं का संगम
इतिहासकार इस गुफा को नागार्जुन गुफा के रूप में भी बताते हैं। उनका मानना है कि यह एक प्राचीन बौद्ध स्थल है और यहां बौद्ध आचार्य नागार्जुन ने साधना की थी। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि चीनी यात्री व्हेनसांग के यात्रा-वृत्तांतों में भी इसका उल्लेख मिलता है।
सन 2015 में जब इस स्थल की जानकारी दलाई लामा तक पहुंची तो वे भी यहां आने के लिए तैयार हो गये थे। उस समय प्रशासन का पूरा अमला इस व्यवस्था में लग गया था।
वहीं दूसरी ओर गोंडवाना समाज के लोग इस दावे को खारिज करते हुए कहते हैं कि यह स्थान सदियों से उनका देवस्थल रहा है।
लेकिन मैं इन ऐतिहासिक विवादों में नहीं पड़ना चाहता। मैं केवल अपनी उस कठिन और रोमांचक यात्रा का अनुभव साझा करना चाहता हूं
सिरपुर से जंगल की ओर
हम तीनों मित्र कार से सिरपुर पहुंचे और रात वहीं बिताई। अगली सुबह गुफा तक जाने के लिए निकल पड़े। रास्ते में लोगों ने बताया कि वहां तक कोई चार पहिया वाहन नहीं जा सकता।
फिर भी जिज्ञासा हमें आगे खींचती रही। जैसे ही हम सिरपुर-कसडोल मुख्य मार्ग से बाईं ओर जंगल की तरफ मुड़े, फॉरेस्ट विभाग के बैरियर पर हमें रोक लिया गया। चौकीदार ने साफ कह दिया—यहां बाहरी लोगों का प्रवेश वर्जित है।
हमारे एक मित्र थोड़े होशियार निकले। उन्होंने तुरंत कहा—
“हमें जंगल नहीं जाना है, हम तो बोरिद गांव में ध्रुव जी के यहां लड़की देखने जा रहे हैं।”
हमारी यह बात सुनकर चौकीदार मुस्कुराया और बैरियर खोल दिया। इस तरह हमारी यात्रा का पहला अवरोध पार हुआ
मोटरसाइकिल से शुरू हुआ असली सफर
गांव पहुंचने पर पता चला कि वहां से आगे कोई रास्ता ही नहीं है। तब हमने गांव के दो युवकों से हमें गुफा तक पहुंचाने का आग्रह किया। उनकी मोटरसाइकिल में पास की किराना दुकान से पेट्रोल डलवाया और हम उनके साथ निकल पड़े।
रास्ते में सात छोटे-छोटे नाले पड़े। गर्मी के कारण उनमें पानी तो नहीं था, लेकिन रेत इतनी थी कि कई बार हमें उतरकर मोटरसाइकिल को पीछे से धक्का लगाना पड़ा।
इस दौरान रास्ते में पेड़ों से गिरे पके तेंदू फल खाने का आनंद भी मिला। ऊपर से महुए का मौसम था, इसलिए पूरे जंगल में फैली महुए की मादक सुगंध मन को प्रफुल्लित कर रही थी।
आठ किलोमीटर की पगडंडी और थकान
काफी संघर्ष के बाद हम उस गांव से लगभग आठ किलोमीटर पगडंडी रास्ता पार करते हुए एक पहाड़ी के नीचे पहुंचे।
यहीं मोटरसाइकिल छोड़कर हमें पैदल चढ़ाई शुरू करनी पड़ी। सामने जो पहाड़ी थी, वह लगभग सीधी चढ़ाई वाली थी। न कोई सीढ़ी, न कोई रास्ता सिर्फ पथरीली ढलान।
हर थोड़ी दूर पर बैठकर सांस लेना पड़ रहा था। लगभग डेढ़ किलोमीटर की चढ़ाई चढ़ने में हमें पांच-सात बार रुकना पड़ा। दोपहर हो चुकी थी। शरीर जवाब देने लगा था। घुटनों ने मानो काम करना बंद कर दिया था। एक समय तो मैंने तय कर लिया कि अब आगे नहीं जाऊंगा। लेकिन साथ के लड़कों के उत्साह ने हिम्मत बंधाई और मैं फिर चढ़ने लगा
जंगल का स्वाद : तेंदू और ठंडा पानी
हम दो बोतल पानी साथ ले गये थे, लेकिन वह गर्म हो चुका था। गांव के लड़के समझदार निकले। उन्होंने एक प्लास्टिक कैन को कपड़े में लपेटकर उसे लगातार पानी से भिगोकर रखा था, जिससे उनका पानी ठंडा बना हुआ था। उसी से हम थोड़ी-थोड़ी राहत पा रहे थे।
रास्ते में कई तेंदू के पेड़ दिखे। हमने अपने पुराने तरीके से तेंदू गिराने का जुगाड़ भी किया—एक बड़ा पत्थर लाकर पेड़ के तने पर जोर से पटका। कंपन से ऊपर की डालियों से पके तेंदू नीचे गिरने लगे। जंगल के बीच यह छोटा-सा आनंद भी किसी दावत से कम नहीं था।
आखिरकार गुफा तक पहुंच गये
कई मुश्किलों के बाद हम आखिरकार गुफा तक पहुंच ही गये। अंदर घुप्प अंधेरा था। मोबाइल की रोशनी के सहारे धीरे-धीरे भीतर गए। मन में थोड़ा डर भी था कहीं सांप, बिच्छू या कोई जंगली जानवर न हो।
लेकिन हाल ही में नवरात्रि के दौरान यहां ज्योति कलश स्थापित किया गया था, इसलिए गुफा अपेक्षाकृत साफ थी। मैंने भी वहां कुछ देर ध्यान लगाने की कोशिश की, लेकिन मेरा चंचल मन ध्यान से ज्यादा अच्छी तस्वीरें खींचने में लगा हुआ था
दलाई लामा और सांप की कहानी
इसी दौरान गांव के कुछ और युवक वहां आ पहुंचे। उन्होंने गुफा से जुड़ी कई रोचक कहानियां सुनाईं। उनका कहना था कि जब दलाई लामा यहां ध्यान लगाने बैठे थे, तभी अचानक ऊपर से एक सांप उनके पास आकर गिर पड़ा। किसी अनहोनी की आशंका से तुरंत उनका ध्यान समाप्त कर उन्हें बाहर ले जाया गया। लड़कों ने यह भी बताया कि कभी-कभी इस गुफा में मादा भालू अपने बच्चों के साथ रहती है। गांव वालों ने उसे कई बार देखा है। इतनी कहानियां सुनकर हमारा साहस थोड़ा डगमगाने लगा।
डर और रोमांच के बीच वापसी
इतनी बातें सुनने के बाद हमने तय किया कि अब ज्यादा देर यहां रुकना ठीक नहीं। इसलिए कुछ तस्वीरें लेकर हम वापस लौटने लगे। इस तरह हमारी यह जोखिम भरी लेकिन यादगार यात्रा पूरी हुई।
सच कहूं तो यह सफर थकान से ज्यादा अनुभवों से भरा था। जंगल की खुशबू, पहाड़ की चुनौती, तेंदू का स्वाद और गुफा का रहस्य, सब कुछ आज भी मन में ताजा है। गोकुल सोनी, वरिष्ठ छायाचित्रकार, रायपुर छत्तीसगढ़