April 23, 2026

नक्सलवाद का खात्मा अंत नहीं, असली चुनौती की शुरुआत

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नक्सलमुक्त छत्तीसगढ़: सरेंडर, सियासत और विकास की असली परीक्षा अब शुरू
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– सरेंडर के बाद भी माओवादी विचारधारा जिंदा रहने के दावों ने बढ़ाई चिंता
– बड़े पैमाने पर आत्मसमर्पण के पीछे रणनीति की आशंका, एजेंसियां सतर्क
– नक्सलियों के सरेंडर के बाद बस्तर की राजनीतिक शून्यता को भरने की जरूरत

राजेश जोशी
रायपुर। छत्तीसगढ़ के लिए 31 मार्च का दिन एक ऐतिहासिक मोड़ के तौर पर दर्ज किया जा रहा है। एक ऐसे बड़े भूभाग को नक्सलवाद से मुक्त घोषित किया गया, जिसने वर्षों तक खून, भय और हिंसा का लंबा दौर देखा। हजारों लोग मारे गए, अनगिनत अपाहिज हुए और सुरक्षा बलों के सैकड़ों जवानों ने शहादत दी। पिछले दो वर्षों में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व में जिस आक्रामक रणनीति के तहत सुरक्षा बलों ने नक्सलियों की कमर तोड़ी, वह एक बड़ा और चौंकाने वाला घटनाक्रम है। लेकिन असली सवाल अब सामने है- क्या नक्सलवाद के कमजोर पड़ते ही बस्तर और अन्य प्रभावित इलाकों की चुनौतियां खत्म हो जाएंगी? विशेषज्ञों की मानें, तो नहीं, असल परीक्षा अब शुरू हो रही है।
बस्तर और आसपास के इलाकों में अब अगले पांच से छह वर्षों तक निरंतर, ईमानदार और संवेदनशील विकास की सबसे बड़ी परीक्षा सामने है। यह केवल सड़कों, स्कूलों और अस्पतालों का सवाल नहीं है, बल्कि उस भरोसे को फिर से बनाने का भी है, जो वर्षों की हिंसा और उपेक्षा में टूट चुका है। करीब सवा साल पहले एक उच्चस्तरीय बैठक में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने साफ कहा था कि यदि बस्तर में एक साल तक भ्रष्टाचार पर लगाम लग जाए, तो फंड की कोई कमी नहीं होगी। यह बयान अपने आप में उस सबसे बड़ी चुनौती की ओर इशारा करता है, साफ-सुथरा और जवाबदेह, ईमानदार प्रशासन। जो मानवीय चेहरे के साथ काम करता हो।
बीते वर्षों में बस्तर में भ्रष्टाचार के जैसे मामले सामने आए हैं, उसे देखते हुए यह लक्ष्य आसान नहीं है।

‘क्लीयर, होल्ड और डेवलपमेंट’ का अधूरा सफर
उग्रवाद प्रभावित इलाकों के लिए अपनाई जाने वाली रणनीति के तीन अहम चरण होते हैं—क्लीयर, होल्ड और डेवलपमेंट। पहला चरण—क्लीयर—यानी इलाके को उग्रवाद से मुक्त करना, काफी हद तक पूरा हो चुका है।
लेकिन अब असली चुनौती है— होल्ड और डेवलपमेंट। अब तक विकास की धीमी रफ्तार के पीछे नक्सलवाद को एक बड़ी वजह बताया जाता रहा। लेकिन आने वाले एक-दो वर्षों में यही इलाका सवाल करेगा- स्कूल कहां हैं? अस्पताल क्यों नहीं पहुंचे? राशन और सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था कब सुधरेगी? अगर इन सवालों के जवाब समय पर नहीं मिले, तो नाराजगी का स्वरूप भी बदलेगा—और कहीं ज्यादा तीखा होगा।

सरेंडर के बाद भी जिंदा विचारधारा
पिछले दो वर्षों में छत्तीसगढ़ के साथ महाराष्ट्र, ओडिशा और तेलंगाना में जिस तेजी से नक्सलियों के सरेंडर हुए हैं, उसने एक नई बहस और कुछ हद तक चिंता को जन्म दिया है। सरेंडर करने वाले लगभग सभी नक्सली नेता- चाहे बड़े हों या छोटे- रटी-रटायी सी, एक ही बात दोहरा रहे हैं: “हथियार छोड़े हैं, विचारधारा नहीं।” वे अब जल, जंगल और जमीन के अपने मुद्दों पर लोकतांत्रिक तरीके से लड़ाई की बात कर रहे हैं। यही बात सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों के लिए चिंता का विषय है। नक्सली विचारधारा को लेकर खुद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह संसद में चिंता जता चुके हैं। तेलंगाना में ऐसे कई पूर्व नक्सली राजनीति में सक्रिय हो चुके हैं। नक्सली कमांडर रही सीताक्का तो मंत्री भी बन चुकी हैं। ऐसे संकेत भी हैं कि बस्तर में भी पूर्व नक्सली किसी नए राजनीतिक स्वरूप में सामने आ सकते हैं। अगर ऐसा हुआ, तो यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि विचारधारा और राजनीति का नया संघर्ष होगा, जिसे कई विशेषज्ञ ‘अर्बन नक्सल’ शैली की चुनौती मानते हैं।

क्या सरेंडर एक रणनीति है?
खुफिया एजेंसियों की सबसे बड़ी चिंता यही है कि इतने बड़े पैमाने पर हो रहे सरेंडर कहीं किसी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा तो नहीं। गुरिल्ला युद्ध का मूल सिद्धांत है- जब दुश्मन मजबूत हो, तो पीछे हटो, खुद को पुनर्गठित करो और सही समय पर पलटवार करो। नक्सली भी संघर्ष विराम, वार्ता के प्रस्तावों का झांसा देकर ऐसा पहले कर चुके हैं। सुरक्षा बलों की बढ़ती मौजूदगी, लगातार हो रही मुठभेड़ों में बड़े नेताओं-साथियों की मौत, सुरक्षा कैंपों का विस्तार और सप्लाई लाइनों पर दबाव- इन सबने नक्सलियों पर भारी दबाव बना दिया था। एजेंसियां इस बात की गहराई से जांच कर रही हैं कि कहीं यह सामूहिक सरेंडर किसी बड़े खेल की भूमिका तो नहीं। नक्सल संगठनों का इतिहास बताता है कि उनकी रणनीतियां अक्सर 15 से 20 साल के लंबे समय को ध्यान में रखकर बनाई जाती रही हैं। इतनी लंबी दृष्टि राजनीतिक दलों की यदाकदा ही देखने मिलती है।

जमीन की सच्चाई: बस्तर क्या सोचता है?
हालांकि, बस्तर के अंदरूनी इलाकों में रहने वाले लोगों की सोच कुछ अलग भी है। सुकमा, बीजापुर और अबूझमाड़ के गांवों में रहने वाले लोग नक्सलियों के उस चेहरे को करीब से देख चुके हैं, जिसमें हिंसा, दबाव और निर्दयता शामिल रही है। दुर्दांत नक्सली कमांडर पापाराव के सरेंडर को लेकर सुकमा, बीजापुर इलाके के लोगों में जबर्दस्त नाराजगी है। पापाराव ने कई लोगों की बड़ी निर्ममता से हत्याएं की हैं। यही वजह है कि कई स्थानीय लोग मानते हैं कि तेलंगाना की तरह यहां नक्सलियों को राजनीतिक स्वीकार्यता मिलना आसान नहीं होगा।

जीत के बाद की सबसे कठिन लड़ाई
नक्सलवाद के कमजोर पड़ने के साथ छत्तीसगढ़ एक नए मोड़ पर खड़ा है। यह मोड़ केवल सुरक्षा से विकास की ओर बढ़ने का नहीं, बल्कि भरोसा, पारदर्शिता और संवेदनशील शासन स्थापित करने का है। बस्तर की राजनीतिक शून्यता को भी तेजी से भरने की जरूरत है, ताकि लोगों को अपना एक नेता मिल सके। अगर चूक हुई, तो यह खालीपन एक नई असंतोष की जमीन भी तैयार कर सकता है। यानी असली लड़ाई अब शुरू हुई है- बंदूक की नहीं, भरोसे और विकास की। जिस दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति के साथ दो सालों में नक्सलियों का सफाया हुआ, उसी अंदाज में अब बस्तर समेत अन्य नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास करने की जरूरत है।

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