कारवाने शेरो अदब के तरही मिसरे पर आज एक ग़ज़ल
ग़ज़ल
बड़े बड़ों को ये शायद पता नहीं होता
किसी को मार के कोई बड़ा नहीं होता
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पुकारो दिल से तो आती है आसमां से मदद
ये मत कहो के कभी मोजज़ा नहीं होता
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न जाने कौन सा लम्हा हो आख़िरी लम्हा
किसी को मौत का अपनी पता नहीं होता
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हमारे बच्चों को संगत बिगाड़ देती है
कोई भी बच्चा मिज़ाजन बुरा नहीं होता
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जो बेवफ़ा हैं उन्हें आप बेवफ़ा कहिये
हरेक शख़्स मगर बेवफ़ा नहीं होता
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किसी मरे हुए इंसां को पहले ज़िंदा करो
फिर उसके बाद ये कहना ख़ुदा नहीं होता
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सुनहरे ख़्वाब सजाओ तो अपनी आंखों में
अगर हो अज़्मो इरादा तो क्या नहीं होता
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दुआ सलाम भी करते हैं अब ज़रूरत से
जिसे समझिए भला वो भला नहीं होता
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पता लगाएं तो हम ख़ुद ही अपने दुश्मन हैं
हमारे बीच कोई दूसरा नहीं होता
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लहुलुहान ज़मीनों से आ रही है सदा
“किसी का जंग से हरगिज़ भला नहीं होता”
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वो बेगुनाहों का क़ातिल है रहनुमा न कहो
जो रहनुमा हो तो वो सरफिरा नहीं होता
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तलाश करने चले हैं वो ऐब गै़रों के
घरों में जिनके कोई आईना नहीं होता
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शहादतों की बुलंदी समझ नहीं सकते
वो जिनके पेशे नज़र करबला नहीं होता
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लगाई मुंह से सुख़नवर न मय कभी हमने
सुना है शेख़ से इसमें मज़ा नहीं होता
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सुख़नवर हुसैन रायपुरी
150/5.4.2026