बड़ी-सी कविता : छोटी-सी कथा
कवि के भीतर एकाएक कुछ सुगबुगाया। वह कविता जैसा कुछ-कुछ था, जो अभी पूरी तरह आकार नहीं ले पाया था।
तभी कवि के भीतर बैठे पाँचों मन सक्रिय हो उठे। वे किसी चतुर दरबारी की तरह उसे उकसाने लगे :
“देरी किस बात की? तुम तो शब्दों के जादूगर हो। कथन का चमत्कारी ढंग तुम्हें सिद्ध है। वर्ण-विन्यास में तुमसे माहिर भला कौन? तुम्हारी सूझ-बूझ और वाक-चातुरी की धाक दूर-दूर तक है। कविता के जितने भी शिल्प और साधन होते हैं, उन सबकी ‘पतासाज़ी’ में तुम उस्ताद हो… बस, उठाओ क़लम और रच डालो एक कालजयी कृति!”
कवि सम्मोहित सा होकर कागज़-कलम लेकर बैठ ही गया था कि ऐन उसी वक़्त बुद्धि सामने आ खड़ी हुई। उसने किसी कठोर शिक्षक की तरह फटकारा :
“ख़बरदार! जिस संवेदना पर तुम शब्द ख़र्च करने जा रहे हो, क्या उसका कोई रत्ती भर भी अनुभव है तुम्हें? या महज़ शिल्प की जुगाली करना चाहते हो?”
कवि ठिठक गया। क़लम और कागज़ के बीच एक गहरी खाई खिंच गई।
तभी विवेक ने आगे बढ़कर कवि के माथे पर अपनी शीतल हथेलियाँ रखीं। उसने बड़े लाड़ से पुचकारते हुए कहा :
“बच्चा, मैं जानता हूँ तुम्हारे पास कविता के सारे साज़ो-सामान मौजूद हैं। लेकिन याद रखना, साधन का काम भाव को कविता में ढालना होता है। तुम तो उलटा कर रहे हो—तुम भाव को ही साधनों की भट्टी में झोंकने चले हो। अगर ऐसा किया, तो भाव तो जलेंगे ही, कविता भी खाक हो जाएगी।”
कवि चुप रहा…..
बड़ी-सी कविता की इस नन्ही-सी कथा का अंत शायद यहीं हो जाता है।
आगे का पन्ना कोरा था, क्योंकि विवेक ने सिखा दिया था कि जहाँ अनुभव का स्पर्श न हो, वहाँ मौन रहना ही सबसे बड़ी कविता है।
••• जयप्रकाश मानस