April 23, 2026

नज़्म: हमनवां की नासमझी

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रचनाकार: डॉ. निवेदिता बांदिल
दिनांक: 11/04/2026

मैने अभी कुछ कहा भी नहीं था कि तुम समझ लेते हो,
मैने अभी समझा भी नहीं था कि वो भी समझ लेते हो,
क्यों इतने नासमझ हो मुझसे पहले ही समझ लेते हो,
ये नासमझी अच्छी है क्या जो ‘ना’ भी समझ लेते हो।

मिरी उलझनों की गिरह भी तुम अक्सर खोल देते हो,
बिन पूछे मेरे सवालों के जवाब भी बोल ही देते हो,
फुर्सत से की होगी ख़ालिक़-ए-दो जहाँ ने तराशगी तुम्हारी,
मेरे चेहरे की शिकन के पहले का समां समझ लेते हो।

कभी रूठ जाऊँ तुमसे दिल-ए-वफ़ा, मुझे मत मनाना तुम,
कहती हूँ ज़रा सा अजनबी बनकर, मुझे भी आज़माना तुम,
दलीलों का तूफ़ान-ए-समंदर खूब बहता है इस ज़माने में,
मगर तुम क्यों हो नासमझ कि ख़ामोशी भी समझ लेते हो।

मिरी मोहब्बत की किताब में बस इतना सा फ़साना लिखा है,
तुम्हें ही सुनना है दम भर और तुम्हीं को सुनाना लिखा है,
अभी लब खोलने की कोशिश की ही थी मैंने ‘ऐ मोहब्बत’!
उफ़! अधूरी बातों को भी कैसे मुकम्मल समझ लेते हो।

अजीब ये सादगी है और अजब नासमझी है ये तुम्हारी,
मिरे अश्क गिरते भी नहीं और आँखें भीग जाती हैं तुम्हारी,
दुआ है कि ये मासूमियत यूँ ही बनी रहे सदा-ए खु़ुदा,
कि कम्बख़्त दर्द को भी मिरे, हाल अपना समझ लेते हो।

ये क्या नज़र ए नूर गिरता है या तुम दिल की ज़मीन छूते हो,
तसव्वुर में भी तुम ही आकर, मिरी रूह-ए-मकीं हो लेते हो,
मैं अपने लफ़्ज़ ढूँढूँ भी तो बता कैसे ढूँढूँ दिल-ए-मुहब्बत,
जब मिरे दिल की धड़कन भी तुम पहले ही समझ लेते हो।

कभी ज़िद हो ये मिरी कि मैं तुम्हें कुछ ख़बर न होने दूँ,
हज़ारों दर्द रहें इस दिल में और तुम्हें रूबरू न होने दूँ,
मगर ये साफ़गोई है तुम्हारी या कमबख़्त हार है मिरी,
कि वो ज़ख़्म भी अक्सर तुम चुपके से समझ लेते हो।

चलो इक खेल खेलते हैं आज और ज़रा फ़ासला रखते हैं,
बिना बोले ही तसव्वुर में रहने का ज़रा हौसला रखते हैं,
मगर ये इश्क़ भी नासमझ तुम जैसा ही कहाँ सब्र मानता है,
कि मिरी शोख़ नादानियों को अक्सर हया समझ लेते हो।

तुम्हारी इस समझदारी से ‘ऐ सनम’ बड़ा ख़ौफ़ आता है,
कि आईना भी चेहरे का आजकल आधा सच बताता है,
गिला है बस यही तुमसे ‘ऐ मेरे हमनवां’ गौर फ़रमाइएगा,
कि मिरी शोख़ शरारत को भी तुम वफ़ा समझ लेते हो।

दुनिया लाख समझाए, मुझे कोई फ़िक्र नहीं है इसकी,
तुम्हारी एक नज़र काफ़ी जो हर वक़्त परवाह करे मेरी,
मैं खुद को भूल जाऊँ भी ‘ऐ ख़ुदाया’… तो ग़म न होगा,
कि तुम तो अक्स हो मेरे पहले ही मुझे समझ लेते हो।

दुआ है आख़िरी बस कि ये नादानियाँ यहीं ठहर जाएँ,
हमारे दरमियाँ ता-अदब ये कहानियाँ यूं ही ठहर जाएँ,
रहो तुम ‘नासमझ’ ऐसे कि मैं समझकर भी न समझ पाऊँ,
कि तुम मेरी हर इक ख़ता को कैसे दुआ समझ लेते हो।

(© डॉ निवेदिता बांदिल | all rights reserved)

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