July 23, 2026

एक राजा जिसे पुलिस ने महल में घुसकर मारी गोली बस्तर के महाराजा प्रवीरचंद भंजदेव के एनकाउंटर की कहानी

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डकैतों और अपराधियों के एनकाउंटर की कहानियां तो आपने बहुत सुनी होंगी लेकिन क्या आपको पता है मध्यप्रदेश में एक बड़ी रियासत के राजा का भी एनकाउंटर हो गया था. इस राजा को उसके महल में घुसकर पुलिस ने गोली मार दी थी.. साथ में 12 अंगरक्षक भी मारे गए थे… ये राजा थे बस्तर रियासत के प्रवीरचंद भंजदेव जिनका एनकाउंटर 1966 में पुलिस ने किया था.. राजा पर स्वतंत्र भारत का अस्तित्व न मानने, सरकार से सीधी लड़ाई लड़ने के आरोप थे.. तो एक बड़ा वर्ग मानता है कि आदिवासियों के हक में जल, जन और जंगल की लड़ाई लड़ रहे थे.. बस्तर वन सम्पदा, खनिज संसाधन और आदिवासियों की जमीन पूँजीपतियों को देने का विरोध कर रहे थे इसलिए उमकी हत्या करा दी गई..
कहानी को ठीक से समझने के लिए हम थोड़ा पहले चलकर इस घटना की पृष्ठभूमि समझते हैं .
बस्तर भी देश की बाकी रियासतों के तरह अंग्रेजों के अधीन था लेकिन अंग्रेजों के लिए इसका अलग महत्व था.. वजह यहां से उन्हें बड़ी तादाद में लोहा, कोयला और लकड़ी मिल रहे थे.. 1921 में बस्तर के राजा रुद्र प्रताप की मृत्यु हो गई.अंग्रेजो को रियासत में सीधा नियंत्रण रखने का मौका मिला उन्होंने रूद्र प्रताप की बेटी प्रफुल्ल कुमारी को गद्दी पर बैठा दिया..17 साल की उम्र में उनकी शादी मयूरभंज के राजकुमार से करा दी.. अंग्रेजों को लग रहा था कि वो उनके कठपुतली की तरह काम करेंगी लेकिन ऐसा न हुआ.. इसके बाद अपेंडिक्स के ऑपरेशन के लिए उन्हें इंग्लैंड ले जाया गया जहां इलाज के दौरान संदिग्ध परिस्थितियों में उनकी मौत हो गई.. इसके बाद उनके 6 साल के बेटे प्रवीरचंद भंजदेव को गद्दी पर बैठाया गया.. रायपुर के राजकुमार कॉलेज में प्रारम्भिक पढ़ाई के बाद अंग्रेजों ने उन्हें भी आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड भेजा और फिर वहां से वापस आने के बाद राज्य सम्हालने का जिम्मा दे दिया गया..प्रवीरचंद को 1947 में गद्दी मिली और उसी साल देश आजाद हो गया
..
अंग्रेजों के जाने के बाद कोई राजा भारत में मिलने के लिए तैयार नही था.. प्रवीरचंद भी इन्हीं में एक थे…
हैदराबाद की सीमा बस्तर से लगती थी.. हैदराबाद के नवाब से प्रवीरचंद के अच्छे सम्बंध थे.. प्रवीरचंद ने नवाब को लौह खदान का ठेका भी दिया हुआ था..नवाब भारत में शामिल होने के लिए तैयार नहीं था..प्रवीरचंद को अपने साथ मिलने के लिए उकसा रहा था..
गृह मन्त्री सरदार पटेल ने प्रवीरचंद को चेतावनी दी कि अगर भारत विरोधी नवाब को दिया लौह खदान का ठेका निरस्त कर भारत में न मिले तो परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहें । इस धमकी के बाद प्रवीरचंद भंजदेव ने अपनी रियासत का भारत में विलय कर दिया..लेकिन विलय के बाद भी प्रवीरचंद भंजदेव की भारत सरकार से नहीं पटी.. वो सरकार से मिलने वाली प्रिवीपर्स और सुविधाओं से संतुष्ट नहीं थे.. बस्तर से निकलने वाले लौह अयस्क में अपनी हिस्सेदारी चाहते थे..आदिवासियों को आगे कर उन्होंने विरोध शुरू कर दिया.. सरकार ने इसे बगावत करार देकर
1953 में कोर्ट में हलफनामा पेश कर उनकी सारी संपत्ति सीज कर दी.. आरोप लगाया गया कि राजा की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। वह अपनी संपत्ति की देखभाल ठीक से नहीं कर सकता..सरकार का मकसद प्रवीर को अपने नियंत्रण में रखना था
इसी दौरान 1955 को बस्तर में भंयकर अकाल पड़ा..
बस्तर के आदिवासियों में अफवाह फैली कि राजा की सम्पत्ति पर सरकार ने कब्जा कर लिया हैं इससे देवता नाराज हो गए हैं. आदिवासी राजा के पक्ष में लामबंद हुए.ये वही दौर था ज़ब बैलाडीला की लौह खदानें खनन के लिए जापान को दे गई….बड़ी तादाद में बस्तर में बाहरी लोगों का आना शुरू हुआ.. पाकिस्तान से विस्थापित हिन्दू भी बसाए जाने लगे एक कानून मालिक मकबूजा से आदिवासियों की जमीन गैर आदिवासियों को बेचने पर लगी रोक हटा दी. गई.. बाहरी लोग एक बोतल शराब में उनकी जमीनें अपने नाम कराने लगे.. खदान, रेल लाइन और प्लांट के लिए आदिवासियों का विस्थापन शुरू हुआ.. राजा प्रवीरचंद ने आदिवासियों के आक्रोश को भुनाने के लिए.
955 में आदिवासी किसान मजदूर संगठन (AKMS) बनाया.संगठन सदस्यों के लिए नियम बना कि कोई जंगल की जमीन को नहीं छोड़ेगा, राजा की सम्पति राजा को देने के लिए लड़ेगा.. गांव-गांव में किसान मजदूर संगठन की इकाईयां गठित की गई..महिला-पुरुष सदस्यों को संगठन की वर्दी बांटी गई. मांझियों, चालाकियों, कोटवारों की नियुक्तियां कर राजा ने सरकार के समानांतर अपना राजतंत्र खड़ा करना शुरू कर दिया.. राजा ने अपने सैनिक भी नियुक्त किए.. इन्हें माझी कहा जाता था। इनको नीले रंग की वर्दी और .महिलाओं को लाल साड़ी दी जाती थी। संगठन के सदस्य राजा के विचारों का प्रचार साप्ताहिक हाट बाजारों में करते. एक पूरी ट्रेन बूक़ कर प्रवीरचंद आदिवासियों की रैली लेकर दिल्ली पहुंच गए.. प्रगति मैदान में सभा कर सरकार को आदिवासी विरोधी करार दिया… प्रवीरचंद के जनता के बीच इस प्रभाव को देखने के बाद सरकार को झुकना पड़ा.. उन्हें साधने के लिए कांग्रेस का जिलाध्य्क्ष बनाने के साथ 1957 में विधानसभा का टिकट दिया गया..वो चुनाव भी लड़े और भारी वोटों से जीतकर विधायक बने..लेकिन जब्त सम्पत्ति वापस न मिलने पर दो साल के अंदर ही 1959 में उन्होंने विधायकी से इस्तीफ़ा दे दिया..उन्होंने अपनी पार्टी आदिवासी सेवा दल का गठन किया.उनका ये संगठन सीधी कार्रवाई करने लगा.1960 में बस्तर कांग्रेस के जिलाध्यक्ष सूर्यपाल तिवारी के खिलाफ आन्दोलन कर उनके स्वामित्व वाले तालाब पर कब्जा कर लिया गया.. आरोप लगे कि सरकारी तालाब पर मछली पालन कर वो पैसा कमा रहे.. तालाब की सारी मछलियां लूट ली गईं..प्रवीरचंद भंजदेव के संगठन आदिवासी सेवा दल ने
जंगल काटकर जमीनों को आदिवासियों में बांटना, सरकारी और साहूकारों, जमींदारों की जमीनों पर कब्जा करना शुरू कर दिया..संगठन के सशस्त्र सदस्य पुलिस -प्रशासन के लिए चुनौती बन रहे थे. मौके का फायदा काम्युनिष्ट,प्रजा सोशलिस्ट और रामराज्य दल जैसी पार्टियां उठाने लगी .ये भी राजा के पक्ष में खड़ी हो गई.
सरकार प्रवीरचंद की ताकत से डर गई .. सरकार में हड़कंप मच गया। सरकार को डर लगने लगा कि प्रवीरचंद भंजदेव का आंदोलन अलग बस्तर राज्य की मांग में बदल सकता हैं.. हिंसक रूप अख्तियार कर सकता हैं सरकार ने बस्तर के कई हिस्सों समेत जगदलपुर में विशेष सशस्त्र बल तैनात कर दिया.. संसद का विशेष सत्र बुलाकर प्रवीर चन्द्र का दो लाख भत्ता रद्द कर दिया.राजा की उपाधि भी छीन ली। जनता में इसके खिलाफ आक्रोश फैलने लगा.. प्रवीरचंद के भाई विजय चन्द्र को सरकार ने राजा घोषित कर उन्हें दो लाख भत्ता देना शुरू कर दिया।
प्रवीरचंद के भाई विजय चन्द्र तो सरकार के पाले में आ गए लेकिन जनता अभी भी उन्ही के साथ थी..प्रवीरचंद की बहाली के लिए आंदोलन शुरू हो गया…गांव-गांव में सभाएं, रैलियां होने लगीं.जनता ने सरकार को टैक्स देना बंद कर दिया.. पटवारी मार कर भगाये जाने लगे…बाहरी व्यापारियों के हाट बाजार में आने पर रोक लगा दी गई…कांग्रेस के जिलाध्य्क्ष सूर्यपाल तिवारी का सफाया करने की धमकी दी गई. सरकारी शराब की दुकानें स्कूल भवन, सरकारी इमारतें जलाई जाने लगीं… 1910 के भूमकाल विद्रोह जैसा माहौल बन गया। इस डर से सारे बाहरी व्यक्ति डर कर भागने लगे.28 मार्च 1961 को जगदलपुर में आदिवासियों की बड़ी रैली थी.. एक दिन पहले उसमें शामिल होने भोपाल से जगदलपुर जा रहे प्रवीरचंद भंजदेव को नरसिंहगढ़ में गिरफ्तार कर लिया गया . हजारों की संख्या में लोग जगदलपुर के पशु मण्डी में जमा हो गए. पुलिस और आदिवासियों के बीच झड़प हुई..पुलिस ने करीब 500 लोगों को हिरासत में ले लिया. 31 मार्च को इसके विरोध में लोहंडीगुड़ा में 10 हजार से अधिक लोग जमा हो गए..पुलिस और पब्लिक़ के बीच हिंसक संघर्ष हुआ
, पुलिस ने पहले आसू गैस के गोले दागे और फिर गोलियां चलाई 13 आदिवासी मारे गए.सैकड़ों घायल हुए.इससे माहौल और तनावपूर्ण हो गया.गांव -गांव में पुलिस और पब्लिक के बीच संघर्ष की स्थिति निर्मित हो गई..
पुलिस ने 11 अप्रैल तक जगदलपुर में धारा 144 लगा दी. प्रजा सोशलिस्ट पार्टी सीपीआई, जनसंघ लोहंडीगुड़ा फायरिंग की न्यायिक जांच करने की मांग करने लगे. सरकार ने फायरिंग में मेरे लोगों के परिजनों का 10-10 हजार रुपये देने की घोषणा की। लेकिन पीड़ित परिवारों ने पैसे लेने से मना कर दिया.
सरकार को हार कर राजा प्रवीरचंद को रिहा करना पड़ा.राजा के आने से जनता में और जोश बढ़ गया। चुनावी फायदे के लिए विपक्षी पार्टियां राजा के आसपास मंडरानें लगी लेकिन अपने प्रति जनता की सहानुभूति को भुनाते हुए राजा प्रवीरचंद भंजदेव ने नई पार्टी अखिल भारतीय महाराजा पार्टी का गठन कर लिया. मकसद देशी रियासतों में राजाओं का अधिपत्य फिर से कायम करना था.. प्रवीरचंद भंजदेव ने 1962 के विधानसभा चुनाव में बस्तर की सभी 10 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे जिसमे 8 जीतकर आए .. इसके बाद प्रवीरचंद भंजदेव का प्रभाव और बढ़ गया.
राजा की सम्पत्ति वापसी लोहंडीगुड़ा फायरिंग के दोषी अफसरों पर कार्रवाई की मांग को लेकर फिर उग्र आंदोलन शुरू हो गया.. तिरंगा तक जलाया जाने लगा.. राजमहल में सरकार के लगाए गए तालों को तोड़ कर पब्लिक ने कब्जा कर लिया। पुलिस महल को मुक्त कराने गई तो प्रवीरचंद के समर्थकों ने तीरों से हमला कर दिया. पुलिस ने इस जुर्म में 61 लोगों को गिरफ्तार किया जिनमें नौ लोगों को कोर्ट में 5-5 साल कि सजा सुनाई गई..
स्थितियाँ विकराल हो रही थी.. लोकतंत्र बनाम राजतंत्र की लड़ाई शुरू हो गई थी.. पुलिस का भय खत्म हो रहा था और इसके चलते एक बड़ी घटना घट गई.. बेजिरपदर गांव के एक अपराधी हिड़मा को जब पुलिस पकड़ने गई तो दो पुलिस वालों को लोगों ने मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद पुलिस और कर्मचारियों में खौफ फैल गया. अब पुलिस बर्दाश्त करने वाली नहीं थी.. पुलिसकर्मियों की हत्या के आरोपियों की तलाश में पुलिस ने भी हांका खेल दिया . पुलिस आरोपियों को तलाश कर रही थी. इसी बीच 25 मार्च 1966 को प्रवीरचंद भंजदेव के राजमहल में हजारों सशस्त्र आदिवासी जमा थे.. कहते हैं कि अपनी परम्परा के अनुसार राजा से आखेट की अनुमति लेने आए थे ..पुलिस को पता चला कि पुलिसकर्मियों की हत्या करने वाले ग्रामीण प्रवीरचंद भंजदेव के राजमहल में मौजूद हैं.. इस सूचना के बाद राजमहल के आसपास भारी संख्या में पुलिस बल तैनात कर दिया गया…उधर राजमहाल के सामने जमा राजा के समर्थक आदिवासी भी मरने -मिटने को तैयार थे., उनके हाथ में भी तीर -धनुष थे…पुलिस और प्रवीरचंद भंजदेव के समर्थकों के बीच देखते ही देखते मुठभेड़ शुरू हो गई…इसमें कई पुलिस वाले घायल हुये…इसके बाद पुलिस राजमहल में घुस गई.. राजमहल गोलियों की गड़गड़ाहट से गूँजने लगा..फायरिंग तब खत्म हुई ज़ब राजा प्रवीरचंद भंजदेव को उनके 11 अंगरक्षकों के साथ मार दिया गया..कहा जाता है कि ये पूरा ऑपरेशन मुख्यमंत्री डीपी मिश्रा के निर्देश पर चला.. इस दौरान विजयाराजें सिंधिया समेत तमाम राजाओं ने उनसे इस ऑपरेशन को रोकने के लिए कहा लेकिन उन्होंने किसी की नहीं सुनी.. डीपी मिश्रा को सीएम की कुर्सी से हटाने की एक बड़ी वजह भी राजा प्रवीरचंद भंजदेव का एनकाउंटर ही था..प्रवीरचंद भंजदेव कोबस्तर के आदिवासी भगवान के रूप में पूजते थे उनकी हत्या के बाद बस्तर के आदिवासियों की नाराजगी को माओवादियों ने नक्सलवाद के रूप में भुनाया… आज कहानी में कुछ गलत हो या छूट रहा हो तो जरूर बताएं. पढना चाहेंगे तो आगे बतायेंगे.राजसथान में सरकार से पंगा लेने वाले एक और lराजा के एनकाउंटर की कहानी..

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