प्रतिरूप
खेत के ठीक बीचों-बीच,
बिजूका खामोश खड़ा है,
और दूर मेड़ पर मौन है किसान।
बिजूके ने ओढ़ी है,
किसान की वह पुरानी, बदरंग कमीज़।
पुआल का धड़, मिट्टी के घड़े का सिर,
काली स्याही से खिंची आँखें, नाक और नुकीली मूँछें।
अपनी बाँहें फैलाए वह,
हवा में उड़ जाने को आतुर है।
पर फिर भी, वह निस्पंद और शांत है,
ताकि मवेशी सहमे रहें उससे।
बिजूका कुछ कहता नहीं,
न वह खदेड़ सकता है आवारा पशुओं को,
न उठा सकता है डराने को कोई पत्थर,
न दौड़ सकता है उनके पीछे।
हैरानी तो यह है,
कि मेड़ पर खड़ा वह जीता-जागता किसान,
अक्सर उसी निर्जीव बिजूके की नकल करता है।
चालाक पंछी जानते हैं इस छलावे को।
वे पहचानते हैं,
कि कहाँ काठ का बिजूका है और कहाँ हाड़-मांस का किसान!
वे बेखौफ चुग जाते हैं,
सुनहरी फसल का एक बड़ा हिस्सा।
किसान की देह पर कौवे चोंच मारते हैं,
और बिजूके के सिर पर ‘बीट’ कर जाते हैं।
मवेशी आज भी सच नहीं जानते,
वे उसे देख बस चौंक जाते हैं।
पर बिजूका, अपनी नियति सा,
शांत ही रहता है।
शुचि मिश्रा