आग
बताते थे बुजुर्ग कुछ ऐसे-ऐसे
आग नहीं बुझती थी चूल्हे में
पकती थी रसोई
एक ही चिंगारी से सुलगी
आग से
होलिका दहन के बाद लायी गयी आग
बुझती नहीं थी घरों में
महीनों-महीनों और कतिपय वर्षों तक
दोपहर का भोजन बन जाता था
पूर्वाह्न या मध्याह्न तक
फिर दबा दी जाती थी राख में
गोबर के उपलों के संग
यूँ राख भी आग का जीवन जीती
सर्दियों में उबलता रहता चूल्हों पर पानी
रंगरेज उबालते थे कड़ाहों में रंग
हलवाई औंटाते मावा, बतासे का घोल
लोहार की धौंकनी चलती रहती अहर्निश
आग ठंडी नहीं होती किसी भी स्थिति में
गर हो भी जाए किसी घर में तो
बड़े मनुहार से माँगी और दी जाती सम्मान से
सुलगती लकड़ी की कोर पर, छिलपे पर रख
अंगार का टुकड़ा जतन से धर कर दीये में
कथा-भागवत हवन के मौकों पर
जब पात्र मे रख लाती कन्याएँ आग
तब जजमान दक्षिणा दे चरण स्पर्श अवश्य करता
आग इन छोटे-छोटे जतनों से चल
जीवन में आ कुछ यूँ समा जाती
कि आंधी-अंधड़ सर्दी-बरसात
ठंडा नहीं कर पाती समयचक्र
आग को जीवन की तरह
अब याद करते हैं बुजुर्ग
और एक ठंडी आह लेकर चुप रह जाते हैं
कि गाँव में नहीं रहा पहले जैसा जीवन
नहीं सहेजी जाती अब चूल्हों में आग
जीवन और प्रतिरोध के लिए
अब कहाँ बची है सीने में भी पहले जैसी वह!
– शुचि मिश्रा