पाउलो
कुछ स्त्रियाँ
तुम्हारी किताबों से इतर हैं
तुमारी क़लम उनको रच नही पाई
कुछ स्त्रियाँ सिमोन की लेखनी से
भी बच गयीं और अम्रता भी उनको
स्याही से उकेर नही पाई
कुछ स्त्रियाँ जिनके बारे में
अरस्तू नही जान पाया
जबकि वो आधा ब्रम्हांड
जान चुका था
वो कुछ स्त्रियाँ जिनको पिकासो
रंग नही पाया अपनी कूची से
और न ही लियोनार्डो
उनकी मुस्कान को
मोनालिसा बना पाया
वो कुछ साधारण सी
स्त्रियाँ जिनको
प्रेमचंद देख नही पाये
और जो महादेवी की
लेखनी से भी चूक गयीं
वो अलबेली गुलाबी स्त्रियाँ
रेगस्तानी , झुरमुटी बालों वाले
रेतीले से लड़कों के माथे चूमती
उन पर बिखर बिखर जाती हैं
वो कुछ अनगढ़ सी सुरीली स्त्रियाँ
अपने होने का शगुन
जिंदगी को देती हैं
खुद अपनी बलाएं उतार कर
पेड़ पर खोंस आती हैं
उन्होंने उतार दिए
तुम्हारी आदर्शवादिता भरे बंधन
जो उनको पाली हुई ,रखी हुई
ब्याही हुई जैसे उपमा देते थे
वो कुछ विद्रोही सी
नाराज़ स्त्रियाँ
जिन्होंने पहन लिए
बदचलन, चरितहीन
आवारा, बेसहूर
जैसे सारे शब्द
और सरस राग सी हो गयीं
वो कुछ मीठी पाग सी स्त्रियाँ
जो बच गयी तुम्हारी कथा का
आदर्श पात्र होने से
वो कुछ स्त्रियाँ
जो मनमानी कर गयीं
रहस्यमयी हो गयी…
वही तो थीं जो
सच में जी गयीं
— निधि नित्या