इज़हार…
बंधे हुए जिंदगी के
वो किरदार हो तुम,
जो मेरे भावी भाग्य में
समा न सके ।
उलझे हुए आशिक़ी का
वो इज़हार हो तुम,
जो मेरे मन मंदिर से
कभी मिटा न सके ।।
मैं हमराही नहीं,
तुम्हारी मंजिल की राह हूं
मुझे कहीं नहीं पहुंचना है ।
मैं यात्री भी नहीं,
जो तुम्हारे यात्रा में साथ रहूं
रास्ता हूं जो मुझे यही रहना है ।।
चलती का नाम
राहों के राही का
भूले बिसरे राजदार हो तुम,
तुम्हारे कदमों के
निशां कभी मिटा न सके ।
चारों ओर से खुला हूं
तारकोल से लदा हूं
उम्र से भी लंबा
अनंत लंबा हूं
मैं भी ओत चाहता हूं
कोई मुझे आसरा नहीं देता
मुझे इसके लिए दुख भी नहीं है
जिस तरह एक
विशाल ह्रदय वाले
वृक्ष को धूप हो बारिश हो
छतरी की जरूरत नहीं पड़ती
उसी तरह…,
बेजान सा अनजान सा
बेरंग तुम्हारा ही थकान सा
मुझे किसी के सहारे की
जरूरत नहीं पड़ती ।।
पल दो पल
थकान मिटाने वाले
उस वृक्ष के राहगीर हो तुम ।
या फिर…,
चलते रहना
चलते ही रहना
उस लंबी सड़क का
मुसाफिर हो तुम…….।।
इन्हीं क्षणों में
बिताए हुए खामोशी के
वो अनजान प्यार हो तुम,
जिन्हें चाह कर भी
अपना बना ना सके ।।
मेरा भी इच्छार्थ है,चाहत है
एक छोटा सा दिल है
एक करुणामय मन है
मन में दुख सुख है ।
तुम्हारे पास ही नजर है
लेकिन…,
दुनिया जैसी ही नजर है
आते जाते जैसा
दुनिया का एक हिस्सा
और…,
उसी हिस्से का
संसार हो तुम,
जिन्हें कभी
हम रोक न सके ।।
स्वरचित एवं मौलिक
मनोज शाह ‘मानस’
सुदर्शन पार्क,
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