March 6, 2026

मेरे दूसरे कविता संग्रह सामने से मेरे पर श्याम अंकुरम की आलोचकीय टिप्पणी

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(वर्तमान के सच से मुखातिब कवि चंद्रेश्वर)

चन्द्रेश्वर का कविता संग्रह ‘सामने से मेरे’ हमारे समक्ष है। चंद्रेश्वर सरल-सीधे देखने में, और मिज़ाज से खरे व्यक्ति हैं। उनकी कविताएं भी सीधी-सरल और बेलाग-बेबाक हैं। कविताओं में आमजन जीवन की पीडा,संघर्ष और सपने हैं। उनकी कविताएँ जनसरोकारों के प्रति आग्रही हैं। इसीलिए उनकी कविताओं में शिल्प-चमत्कार पर ज़ोर नही है। उन्हें कविता में शिल्प-चमत्कार एवं उसकी जटिल बुनावट साहित्य विलास प्रतीत होती है। प्रसिद्ध आलोचक डॉ. मैनेजर पाण्डेय को समर्पित उनकी एक कविता, ‘कविता डकार नही’ की इन पंक्तियों में स्पष्टतः व्यक्त होता है –“आपको पढ़ते हुए /होता जाता रोशन दिमाग /आप बनाते एक संतुलन पोथी और जग के बीच /आपका मानना साफ़ की कविता नहीं डकार/अघाये आदमी की।” पोथी और जग के बीच संतुलन बनाने की कोशिश उनमें है; इसलिए उन्हें वाम जनकवि कहना पसंद करता हूँ। जहाँ जीवन का हर राग,हर मुश्किलें,हर वो घटना जिसे सामान्य आदमी प्यार करता है,जूझता है और झेलता है।

चंद्रेश्वर अपने विश्वास को लेकर सचेत हैं। ग़लतियों को सबक के तौर पर लेते हैं और आगे किसी प्रकार चूक होने की गुन्जाइश नहीं छोड़ना चाहते हैं। आत्मविश्वास और जिजीविषा को इन पंक्तियों में देखिए — “लगता है स्वभाविक /अशुद्धियों का बने रहना /उन पन्नों पर अब जब इतना आगे निकल आया है /जीवन/ कई मोड़ों को पार करता / चौराहों से /गुज़रता हुआ /चाहता हूँ जो लिखूँ / वर्तमान के पन्नों पर /गुंजाइश हो/कम से कम /प्रूफ़ रीडिंग की!”

चंद्रेश्वर देहाती आधुनिकता को चित्रित करते हैं। देहाती और आधुनिक? इसमें विरोधाभास दिख सकता है। लेकिन इस शब्द को उसी तरह ग्रहण करना चाहिए जैसे देहाती बुद्धिजीवी शब्द ग्रामीण समाज की वैचारिकी को वर्गीकृत करता है। इस कटु सत्य को स्वीकारते हुए कि भूमण्डलीकरण के प्रभाव से गाँव अब अछूते नहीं रहे। लेकिन गाँव के उत्पादन संबंध व स्रोत कृषिप्रधान होना अभी भी ग्रामीण मानस को प्रकृति से जोडे हुए है। फसलों ,पेड़ -पौधों को बोने -बैठाने ,गोडाई -निराई ,खाद -पानी करने के साथ-साथ रखवाली,मौसम के मिज़ाज को समझना और फसलों को मौसम के मार से महफूज रखने के लिए चिन्ताकुल रहना। गाय ,बैल ,भैंस और अन्य पालतू पशुओं पर उनकी निर्भरता ,उनकी देखभाल करना ,उनकी सेहत और ताक़त को लेकर चिन्ताएँं बतौर परिवार के ज़रूरी सदस्य जैसी होती है।
ग्रामीण जीवन स्थिति की प्रकृति के साथ यह संलग्नता ही उनमें सरलता,लगाव ,प्रेम,करूणा और दयालुता बनाए हुए है। संग्रह से बाहर कुछ एक साल पहले फ़ेसबुक पर डाली गयी कविता ‘पूरब के हैं हम ‘ की ये पंक्तियाँ गौरतलब हैं –“निर्गुण नस -नस में बहता है उनके /उसी मे समाया हुआ है / उनकी पीढियों का दुःख /उसी में समाया है उनका /कतरा भर सुख/उनकी मस्ती/कतरा भर!” यह कविता पूरब के लोगों (मूलतः पूर्वी उत्तर प्रदेश व बिहार) के जीवन-व्यवहार को इंगित करती हैं ,लेकिन भारत के अधिक या अधिकांश जीवन- व्यवहार को भी बखू़बी प्रतिबिम्बित करती है। महानगरीय जीवन को जीते हुए चन्द्रेश्वर की कविता को देहाती
आधुनिकता इसलिए कहा जा सकता है कि उनकी कविता में परिवर्तन कीप्रतिबद्धता,प्रगतिशीलता,नैसर्गिक प्रेम,जनवाद ,समानता,उदारता ,वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्रतिरोध की इच्छाशक्ति है, और यह सब आधुनिक जीवन मूल्य हैं जो औद्योगिक क्रान्ति के परिणाम से उपजे जीवन मूल्य हैं जो उनके नस -नस में बसे निर्गुण के साथ संयुक्त होकर जीवन को विकासमान ,सुसंस्कृत और रसमय बनाते हैं! देखिये इन पंक्तियों को –“उस रोज़ गुड़हल के /लाल-लाल खिले फूल /तोड़ते हुए /सूखी पत्तियाँ आकर /गिर गईं माथे पर /चाह कर भी हटा नही पाया उन्हें /सच तो यह है कि मैंने कभी इज़हार ही नहीं किया /अपने प्रेम का /संकोच आड़े आया हमेशा ही …”
नैसर्गिक प्रेम और स्पर्श में संकोच ? उदार आधुनिक जीवन मूल्य और देहाती शिष्टता में पला हुआ संकोची मानस! यही द्वंद्व है ,देहाती आधुनिकता बोध का चन्द्रेश्वर की कविता में।

देहाती सोच-समझ वाले मन में मिथ औरआस्था ,संस्कृति व प्रतीक को लेकर उठ रहे सवाल और चिन्ताएँ दो टूक ढंग से उद्घाटित हुई हैं, उनकी कविता में –“राम की प्रतिमा की लंबाई चौडाई और ऊँचाई की बात से /पता चलता था कि वह जन -जन का ह्रदय सम्राट /जन-जन के ह्रदय से विस्थापित होकर सिमट गया है /केवल प्रतिमा तक ……..हम ऐसे दौर में थे जीने को लाचार जब /संस्कृति का मतलब रह गया था /विचार का बदलते जाना पाषाण में …।”
चंद्रेश्वर विशेषतः अपने को परिवर्तनकामी कवि के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे वर्तमान के सच से मुखातिब रहते हैं –पैनी नजर रखते हुए आक्रमकता के साथ — “राजा अगर करता है मन की बात कपट भाव से /सीधी- सरल प्रजा से तो/बात ये गंदी है/राजा अगर बदलता है दिन भर में दस पोशाक /आकाल में भूखी प्रजा के सामने तो/बात ये गंदी है …प्रजा अगर सहती रहती है ऐसे राजा को एक समय बाद तो /बात ये गंदी /कविता पढ़ कर या सुन कर आप भी बने रहे खामोश तो /बात ये गंदी है …। ”
इसलिए वे आम और प्रबुद्ध जनों से प्रतिवाद की अपेक्षा रखते हैं। आज के शासक वर्ग की बढ़ती असहनशीलता पर साहित्यकारों,कलाकारों और बुद्धिजीवियों द्वारा उठाये प्रतिवाद के क़दम का उन्होंने स्वागत किया और उत्साही खुशी को सायास प्रकट करते हुए लिखा –“आजादी के बाद ज़्यादातर लोग /आम से लेकर ख़ास तक मुब्तिला होते गये थे /उत्तरोत्तर जुगाड़ में ख़ुद के लिए ………ऐसे में सहसा लौटाना क्रिया का /लौट आना /किसी क़ातिल निजाम के खिलाफ़ /रखता था ख़ास मायने /पाने के बरक्स लौटाना मानो /लौट आना था आत्मसम्मान का …।”
चंद्रेश्वर की कविता में प्रबुद्ध जनों का प्रतिरोध – स्वर तो ध्वनित होता ही है ,आम जन का जीवन संघर्ष बहुत ही मुखरित हुआ है। वह आम जन जो अपनी साझा रीति -रिवाज की संस्कृति और भाईचारा की भावना को जीते हुए हर दिन मेहनत और जद्दोजहद करते हुए ज़िन्दगी का सफ़र तय करता है और अपनी बदतरी के खिलाफ़ बेहतरी की उम्मीद में बदलाव की लडाई एकजुट होकर लड़ता है हर दिन।
वह बाज़ारवाद की चकाचौंध और हमलावर चेहरे से न तो बहकता है और न ही घबडाता है। चंद्रेश्वर की कविता में बिना किसी भटकाव के ,समझौता किए बगैर संघर्षरत कामरेड ज़मा खान जैसे नायक हैं ,जो आमजन की एकजुटता और मजबूत इरादों को दर्शाते हैं — “पूरे नगर में दो जन बचे हैं / जो बोलते ही रहते हैं लगातार /एक तो वो पागल है /पहने बोरे की कमीज /…दूसरे अपने ज़मा खान /पागल सूरज की ओर मुँह बाये बड़बडाता रहता है /कामरेड ज़मा खान पूँजीपतियों के खिलाफ़ बोलते हैं /”….होलटाइमर हैं पार्टी के /उनके साथ के कई लोगो ने पार्टी छोड़ दी /कुछ तो विधायक और मंत्री भी बने /पर कामरेड ज़मा खान /अपनी सियासी ज़मीन पर खडे रहे /वे बोलते हैं तो गर्वीले लगते हैं/गोया कबीर हों ; जो जस की तस चदरिया रख चल देंगे।”
चंद्रेश्वर ने भी कबीर के लहजे से प्रेरित हो आमजन के सुख – दु:ख ,आफत बीपत हार -जीत ,आशा -निराशा को आमजन की बोली – भाखा में जस की तस रख दिया जतन से!

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