सच,आसान नहीं होता एक शादीशुदा आदमी से इश्क़ करना
सच,आसान नहीं होता है
एक शादीशुदा आदमी से इश्क़ करना।
क्योंकि इश्क़ सिर्फ़ उस आदमी से नहीं होगा,
तुम्हें प्यार करना होगा उसकी बीवी से ,
उसके बच्चों से भी।
तुम्हें सहना होगा हर करवाचौथ,
हर एनिवर्सरी,
और
जब वो पत्नी की तस्वीर फ़ेसबुक पर लगाएगा,
लिखेगा— “माय लाइफ़, माय लव ”
और तुम्हारा दिल एक कोने में चुपचाप पिघलने लगेगा।
तुम चाहोगी कि वो कभी तुम्हारी तस्वीर को भी डीपी बनाए,
पर वो कभी नहीं करेगा।
क्योंकि तुम उसकी ज़िंदगी का वो हिस्सा हो,
जिसे दुनिया से छुपाकर रखा जाता है।
हर शनिवार-रविवार उसका पारिवारिक समय,
तुम्हारा अकेलापन।
हर त्योहार उसकी हँसी,
तुम्हारा खाली कमरा।
हर नववर्ष उसकी पत्नी के साथ तस्वीरें,
तुम्हारी रात भर जागी पलकों का बोझ।
तुम्हें आदत डालनी होगी उसकी मिस्ड कॉल मोहब्बत की,
उसकी ‘बिजी कहानियों की,
उसके ‘घर में लोग हैं’ वाली खामोशियों की।
वो हर बार कहेगा—
“काश हम पहले मिलते…”
और तुम्हारा दिल फट जाएगा,
क्योंकि ‘काश’ कभी पूरा नहीं होता।
तुम इंतज़ार करोगी उस एक कॉल का
जिसमें वो कहे—
“मैं सब छोड़ आया, तुम्हारे पास आ रहा हूँ…”
पर यकीन मानना,
वो कॉल कभी नहीं आएगा।
कभी वो समझाएगा—
“समाज क्या सोचेगा?”
“बच्चों का क्या होगा?”
“घरवाले क्या कहेंगे?”
और तुम्हें हर बार चुप रह जाना होगा।
तुम उस अदालत में दोषी नहीं,
पर सज़ा तुम्हें मिलेगी।
उसकी हर मजबूरी, हर झूठ की चोट तुम्हारे हिस्से आएगी।
कभी वो तुम्हारे बालों में उंगलियाँ फिराएगा,
कहेगा— “तुम मेरी जिंदगी हो,
मेरी आत्मा हो,
तुम्हारे बिना मेरा वज़ूद कुछ नहीं है।
पर अगले ही दिन वो
किसी फ़ैमिली फ़ंक्शन की तस्वीर पोस्ट करेगा।
बीवी की बाहों में बाहें डाले खिलखिलाता नज़र आयेगा।
और यह सब देखकर
तुम चुप रहोगी।
आदत सी हो जाएगी तुम्हें
उसकी आधी मोहब्बत की।
उसकी चुराई हुई फुर्सत की।
सच,आसान नहीं होता…
एक शादीशुदा आदमी से इश्क़ करना।
एक बात और
आख़िर तुम करोगी भी क्या ?
इश्क़ से बाहर निकलना
आसान कब रहा है?
इस गली में घुसना आसान है
पर बाहर जाना मुश्किल है,
रुकना और भी मुश्किल ।
तुमने सोचा था ये मोहब्बत तुम्हें आसमान देगी,
पर इसने तुम्हें अंधा कुआँ दिया—
जहाँ ऊपर एक धुँधला सा रोशनी का गोला दिखता है—
टूटती उम्मीद का।
सच,आसान नहीं होता…
एक शादीशुदा आदमी से इश्क़ करना।
तुम हर बार सोचती हो—
“बस आख़िरी बार मिलती हूँ…”
“इसके बाद सब ख़त्म…”
पर वो आख़िरी बार कभी नहीं आता।
क्योंकि जब भी तुम दिल की बात जुबान पर लाती हो
वो मुस्कुराता है,
कहता है—ऐसा सोचना भी मत, वरना जान दे दूंगा।
“तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं जी सकता…”
और तुम फिर से पिघल जाओगी।
सच,आसान नहीं होता…
एक शादीशुदा आदमी से इश्क़ करना।
ये अधूरी कहानी है—
ना सुखांत, ना दुखांत।
बस इंतज़ार का एक लंबा अंधा रास्ता—
जहाँ कोई दरवाज़ा खुलता नहीं,
कोई खिड़की रोशनी नहीं देती।
फिर भी तुम चलती रहोगी—
उसी अंधेरे इंतज़ार में।
शायद अगले जन्म में
मिलने की उम्मीद लिए।
आसान नहीं होता…
एक शादीशुदा आदमी से इश्क़ करना।
सच बताना होता है क्या ?
रचना : पंकज प्रसून, लखनऊ